कहानी
डा. प्रेमलता यदु
नवम्बर, 2025 अंक
आज एक बार फिर अपने फ्रलैट के दरवाजे पर ताला लगाते हुए अपराजिता के दिल में एक हूक सी उठी और उसकी आंखें डबडबा गई। पिछले पांच सालों से वह हर रोज इसी वक्त दफ्रतर के लिए निकलती है। किन्तु इस तरह कभी भी उसे अपने घर के दरवाजे पर ताला लगाने, किचन समेटने, घर को चैक करने और घर से निकलने से पहले सारे लाइट ऑफ करने, जैसे झंझटों से होकर नहीं गुजरना पड़ता था, वह हर रोज बेफिक्री से अपनी कार उठाती और आफिस के लिए निकल जाती लेकिन जब से वह अपने आलिशान पेंट हाऊस से शिफ्रट हुई है, उसकी परेशानियां बहुत अधिक बढ़ गई हैं, जबकि उसने इसी तरह की छोटी-छोटी परेशानियों से ही छुटकारा पाने के लिए अपना पुश्तैनी मकान छोड़ा था।
अपने संयुक्त परिवार को छोड़ते समय अपराजिता ने सोचा था कि वह अपने पेंट हाऊस में आकर अपने मन मुताबिक आराम से अपने पति सचिन और तीन साल की बेटी पंखुड़ी के साथ तनावमुक्त रहेगी, लेकिन यह तो उल्टा ही हो गया है, जब से वह इस फ्रलैट पर आई है तभी से काम खर्च और परेशानियां और अधिक बढ़ गई है।
अभी अपराजिता पार्किंंग से अपनी कार निकाल ही रही थी कि बेटी पंखुड़ी के स्कूल से फोन आ गया कि अचानक उसकी तबियत बिगड़ गई है, आप उसे स्कूल से ले जाइए। वह आफिस के लिए पहले ही लेट हो चुकी थी क्योंकि आज उसकी गृह सहायिका नहीं आई थी। आज आफिस समय से पहुंचना बहुत जरूरी था क्योंकि आज उसके आफिस में जोन मीटिंग थी, जिसकी अगुवाई वह स्वयं करने वाली थी। ऐसे समय में आफिस लेट जाना उसके प्रोफेशनल इमेज को धूमिल कर सकता थी। साथ ही यह मीटिंग उसके कैरियर ग्राफ को बढ़ाने के लिए भी बहुत जरूरी था। इस मीटिंग की सफलता अपराजिता के प्रमोशन और इमेज दोनों से जुड़ा हुआ था, इसलिए वह दफ्रतर से छुट्टी भी नहीं ले सकती थी। पति सचिन भी शहर से बाहर थे। उसे समझ ही नहीं आ रहा था कि वह क्या करे।
अपने संयुक्त परिवार से अलग होते हुए उसने कभी यह सोचा नहीं था कि उसे इस तरह की परेशानियों से भी दो चार होना पड़ सकता है। अपनी इस परेशानी की घड़ी में अपराजिता को अपनी सासू मां रमणी देवी स्मरण हो आई, जिन्हें घर पर सभी जादू की छड़ी कहा करते थे क्योंकि वह हर समस्या का समाधान चुटकियों में हल कर दिया करती थी। सासू मां का ख्याल आते ही अपराजिता ने फौरन उन्हें फोन पर अपनी दुविधा व परेशानी से अवगत कराया। पंखुड़ी की तबियत बिगड़ गई है और अपराजिता को आफिस जाना जरूरी है यह जानते ही रमणी देवी बोली, ‘‘बेटा तुम सीधे दफ्रतर के लिए निकलो। तुम्हें पंखुड़ी की चिंता करने की जरूरत नहीं है। तुम अपनी मीटिंग खत्म करके आराम से घर लौटो, मैं सब संभाल लूंगी।’’ पंखुड़ी के प्रति अपराजिता की ममता उसे आफिस जाने की इजाजत नहीं दे रही थी। किन्तु रमणी देवी का दुलार, संबल और आश्वासन की ‘मैं सब संभाल लूंगी, तुम केवल अपने काम पर ध्यान दो’ ने अपराजिता को ढांढस बंधाया और वह आफिस जाने के लिए हिम्मत जुटा पाई।
जब अपराजिता सफलता पूर्वक मीटिंग समाप्त कर ससुराल पहुंची तो उसने देखा पंखुड़ी मुस्कुराती हुई पलंग पर बैठी हुई है। उसकी जेठानी के दोनों बच्चे उसके साथ हैं। सासू मां पंखुड़ी को दूध पीने के लिए मनुहार कर रही है। यह दृश्य बहुत ही भावुक था, जिसे देख अपराजिता की आंखें नम हो गई। पंखुड़ी अपनी मां को देखते ही दौड़ कर उसके पास आ गई और उससे लिपट गई। अपराजिता ने भी पंखुड़ी को अपने गले से लगा लिया फिर कृतज्ञता भरी नजरों से अपनी सासू मां की ओर देखने लगी। वह आभार प्रकट करती इससे पहले ही अपराजिता की जेठानी सरोजिनी वहां आई और बोली,‘‘छोटी लो चाय पी लो, थक गई होगी। तुम्हारी मीटिंग कैसी रही—?’’
‘‘मीटिंग तो अच्छा रही—–’’ कहते हुए अपराजिता ने चाय की प्याली ले ली और सरोजिनी की ओर देखने लगी। जिस आत्मीयता से सरोजिनी ने उसे चाय ला कर दी, अपराजिता को यह देख कर इस बात का एहसास हुआ कि पिछले छः महीनों में जब से वह अपने नए फ्रलैट में गई है, दफ्रतर से लौटने के बाद चाय तो दूर पानी भी उसे स्वयं ही लेकर पीना पड़ता है। अपराजिता को आज सरोजिनी में अपनी जेठानी नहीं बड़ी बहन का स्वरूप नजर आ रहा था। उसे अकारण अपना घर और परिवार को छोड़ने का दुख व पछतावा था, जो उसके चेहरे पर साफ झलक रहा था।
अपराजिता ने घर केवल इसलिए छोड़ा था क्योंकि वह संयुक्त परिवार में नहीं रहना चाहती थी। उसे लगता था संयुक्त परिवार व्यक्ति की सफलता में बाधक होता है। संयुक्त परिवार में कई तरह के समझौते व स्वयं को समायोजित करना मुश्किल होता है और परेशानियां अधिक होती है। …………………………
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