कहानी
निखिल पाण्डेय
जाह्नवी जून 2026 अंक
पर्यावरण विशेषांक
एक हृदय को छू लेने वाली कहानी
कुसमी जंगल का नाम लेते ही लोगों की आँखों में हरियाली उतर आती थी। दूर-दूर तक फैले साल, सखुआ, महुआ और बरगद के पेड़ों के बीच बसा वह छोटा-सा गांव किसी लोककथा जैसा लगता था। गांव के बीचों-बीच एक पुराना सरोवर था, जिसके पानी में सुबह का सूरज चाँदी की तरह चमकता और शाम को डूबता आकाश सिंदूर की तरह घुल जाता। सरोवर के किनारे बैठों तो लगता मानो समय धीरे-धीरे बह रहा हो। हवा पेड़ों की शाखों से टकराकर ऐसी ध्वनि पैदा करती कि लगता कोई बूढ़ा लोकगायक जंगल की आत्मा को आवाज दे रहा हो।
कुसमी के लोगों का जीवन उसी सरोवर और जंगल के इर्द-गिर्द घूमता था। वे जंगल को केवल लकड़ी या ईंधन नहीं मानते थे। उनके लिए जंगल मां था, साथी था और आने वाली पीढ़ियों की सांस था। गांव के बुजुर्ग कहा करते-‘जिस गांव का जंगल जीवित है, उस गांव की आत्मा भी जीवित है।’
इसी गांव में रहता था निपुण। उम्र मुश्किल से बारह वर्ष, दुबला-पतला शरीर, बड़ी-बड़ी उत्सुक आंखें और मन में हमेशा कोई न कोई सवाल। वह गांव के बाकी बच्चों जैसा नहीं था। जब दूसरे बच्चे पेड़ों पर चढ़कर आम तोड़ने या सरोवर में कूदने में मस्त रहते, तब निपुण घंटों किसी पेड़ के नीचे बैठकर उसकी छाल को छूता रहता। कभी पत्तियों को कान से लगाकर सुनता कि उनमें ंकैसी आवाज छिपी है। कभी पानी में झुककर अपनी परछाई को देखता और सोचता कि क्या सरोवर भी इंसानों को पहचानता होगा।
निपुण की दादी गांव की सबसे बुजुर्ग स्त्रियों में थी। उनके सफेद बाल, झुर्रियों भरा चेहरा और धीमी आवाज में ऐसा अपनापन था कि गांव के बच्चे भी उन्हें घेर कर बैठ जाते। दादी को जंगल की हर पगडंडी याद थी। कौन सा पेड़ किसने लगाया, किस वर्ष सरोवर सूखा, किस बरगद के नीचे पहला पंचायत फैसला हुआ, सब कुछ उनकी स्मृतियों में दर्ज था। एक शाम निपुण दादी के साथ सरोवर किनारे बैठा था। हवा में महुए की मीठी गंध तैर रही थी। दूर कुछ औरतें पानी भरते हुए लोकगीत गा रही थीं-‘रोपे पीपल, रोपे नीम, धरती मां के जागे भाग, हरियर रहे गांव हमारा, भरल रहै सबके सुहाग।
निपुण गीत सुनते-सुनते अचानक बोला-‘‘दादी, लोग पेड़ों को इतना प्यार क्यों करते हैं?’’ दादी मुस्कुराई। उन्होंने सरोवर की ओर देखते हुए कहा।
क्योंकि पेड़ बिना कुछ मांगे देते रहते हैं। देख, सूरज की धूप सबको जलाती है, पर पेड़ छांव बन जाते हैं। बारिश रुक जाए तो यही बादलों को बुलाते हैं। भूख लगे तो फल देते हैं, थक जाओ तो सहारा देते हैं। जो बिना बोले साथ निभाए, वही अपना होता है। ‘‘—लेकिन दादी’’, निपुण फिर पूछ बैठा, ‘‘लोग पेड़ों का विवाह क्यों करते हैं?’’ दादी की आंखों में चमक उतर आई। उन्होंने धीरे से कहा ताकि इंसान उन्हें काटने से पहले सौ बार सोचे। जब किसी चीज से रिश्ता जुड़ जाता है न तब वह सिर्फ चीज नहीं रहती। वह परिवार बन जाती है।’’
निपुण चुप हो गया। उसने सामने खड़े पीपल को ध्यान से देखा। हवा चली तो उसकी पत्तियां कांपीं। उसे लगा मानो पेड़ सचमुच उसकी बात सुन रहा हो।
कुसमी गांव की सबसे बड़ी पहचान उसकी एक अनोखी परंपरा थी। गांव में जब भी किसी नवदंपत्ति का विवाह होता, वे मंडप से उठने के बाद सबसे पहले सरोवर किनारे जाकर एक पौधा लगाते। लोग कहते-‘‘जिस घर का पौधा हरा रहे, उस घर का प्रेम कभी नहीं सूखता।’’
उस दिन भी गांव में विवाह था। सुबह से ढोल-मांदर बज रहे थे। औरतें रंग-बिरंगी साड़ियों में नाच रही थीं। बच्चे इधर-उधर भाग रहे थे। हवा में महुए की दारू और ताजी मिट्टी की मिली-जुली गंध थी। शाम होतेे-होते पूरा गांव सरोवर किनारे जमा हो गया। दूल्हा-दुल्हन हाथों में आम का छोटा पौधा लिए खड़े थे। गांव की बूढ़ी स्त्रियां मंगल गीत गा रही थी-‘‘धरती अंचरा बीज सम्हारे, नव जीवन के सपने प्यारे, जितना गाढ़ा होए नेह उतना गाढ़ा होए छांव—’’
दुल्हन ने अपने हाथों से मिट्टी खोदी। दुल्हे ने उसमें पौधा रखा। दोनों ने मिलकर उसे पानी दिया। उसी समय दादी ने निपुण के कान में कहा-‘‘देख रे, शादी सिर्फ दो लोगों का मेल नहीं होता। इसमें धरती भी शामिल होती है।’’ यह बात निपुण के मन में कहीं गहराई तक उतर गई।
दिन बीतते गए। निपुण का जंगल से लगाव और गहरा होता गया। वह सुबह उठते ही सरोवर किनारे चला जाता। कभी पेड़ों की जड़ों के पास बैठकर चींटियों को देखता, कभी पक्षियों के घोंसले गिनता। उसे हर पेड़ किसी इंसान की तरह अलग लगता। बरगद गंभीर बूढ़े की तरह, आम उदार मां की तरह और बांस का झुरमुट शरारती बच्चों जैसा।
एक दिन स्कूल में पर्यावरण संरक्षण पर निबंध प्रतियोगिता की घोषणा हुई। गांव के बच्चे किताबों से पंक्तियां याद कर रहे थे-‘पेड़ हमारे मित्र हैं’ ‘पेड़ ऑक्सीजन देते हैं लेकिन निपुण के मन में तो पूरा कुसमी जंगल धड़क रहा था। उस रात वह देर तक लालटेन की रोशनी में बैठा लिखता रहा। उसने लिखा ‘‘हमारे गांव में पेड़ लगाए नहीं जाते, उन्हें परिवार में शामिल किया जाता है। जब दुल्हा-दुल्हन पौधा लगाते हैं, तब धरती उनके रिश्ते की गवाह बनती है। पेड़ केवल ऑक्सीजन नहीं देते, वे आने वाली पीढ़ियों के लिए छाँव बचाते हैं।’’ अगले दिन जब शिक्षक ने उसका निबंध पढ़ा तो कुछ देर चुप रहे। उनकी आंखों में हल्की नमी उतर आई। उन्होंने पूरी कक्षा के सामने कहा-‘‘निपुण ने निबंध नहीं लिखा, उसने अपने गांव की आत्मा लिख दी है।’’
उसे प्रथम पुरस्कार मिला। पुरस्कार में उसे एक छोटा सा बरगद का पौधा दिया गया। निपुण ने उसे दोनों हाथों से ऐसे पकड़ा, जैसे कोई बच्चा अपने छोटे भाई को गोद में उठाए। घर लौटते समय उसने दादी से पूछा-‘‘दादी अगर लोग सारे पेड़ काट दें तो?’’ दादी कुछ पल चुप रही। फिर बोलीं ‘‘पेड़ पहले जंगल से नहीं, इंसान के मन से कटते हैं। जब मन सूख जाता है, तब धरती भी सूखने लगती है।’’ उनकी आवाज में ऐसी उदासी थी कि निपुण देर तक कुछ बोल नहीं पाया।
समय धीरे-धीरे बदल रहा था। अब कुसमी के पास की सड़क पक्की हो चुकी थी। शहर से व्यापारी आने लगे थे। कुछ लोग जंगल की लकड़ी खरीदने की बातें करते। गांव के कई युवा रोजगार की तलाश में शहर जाने लगे थे। उनके साथ नई आदतें और नए सपने भी आ रहे थे।
एक शाम गांव की चौपाल में चर्चा हो रही थी। कुछ लोग कह रहे थे कि जंगल का एक हिस्सा काटकर वहां बड़ा गोदाम बना दिया जाए। बदले में अच्छी रकम मिलेगी। निपुण चुपचाप यह सब सुन रहा था। उसके भीतर बेचैनी बढ़ती जा रही थी। उसने पहली बार महसूस किया कि जंगल सिर्फ कुल्हाड़ी से नहीं कटता, लालच से भी कटता है।
उस रात वह देर तक सो नहीं पाया। बाहर हवा चल रही थी। पेड़ों की पत्तियां सरसरातीं तो उसे लगता जैसे जंगल कोई चेतावनी दे रहा हो। आधी रात के करीब अचानक कुत्तों के भौंकने की आवाज गूंजी। फिर किसी ने दूर से चिल्लाकर कहा-‘‘उठो! सरोवर किनारे वाले पेड़ काटे जा रहे हैं।’’ निपुण हड़बड़ाकर उठ बैठा। दादी भी बाहर आ गई। दूर जंगल की तरफ लालटेनें टिमटिमा रही थीं। कुल्हाड़ियों की आवाज हवा में गूंज रही थी-ठक! ठक! ‘‘दादी ये कौन लोग हैं?’’ निपुण घबराकर बोला। दादी का चेहरा कठोर हो गया।
‘‘लकड़ी वाले—— कई दिनों से नजर गड़ाए बैठे थे।’’ निपुण बिना कुछ सोचे बाहर दौड़ पड़ा। बारिश शुरू हो चुकी थी। रास्ता कीचड़ से भर गया था। उसके पैर फिसल रहे थे, लेकिन वह रुका नहीं। जब वह सरोवर के पास पहुंचा तो उसका दिल जैसे थम गया। एक विशाल बरगद आधा काट दिया गया था। वही बरगद जिसके नीचे गांव के बुजुर्ग बैठते थे। जिसकी जड़ों में बच्चे खेलते थे। जिसकी शाखाओं पर हर साल सारस घोंसला बनाते थे। कुछ आदमी कुल्हाड़ियां लिए पेड़ पर वार कर रहे थे। एक आदमी बोला, ‘‘जल्दी करो। सुबह होने से पहले काम खत्म होना चाहिए।’’ निपुण का खून खौल उठा। वह अचानक दौड़कर पेड़ के सामने खड़ा हो गया। ‘‘रुको!’’ उसकी आवाज बारिश और हवा के बीच गूंज उठी। कुल्हाड़ी उठाए आदमी ठिठक गए। ‘‘हटो लड़के।’’ एक ने गुर्राकर कहा। लेकिन निपुण नहीं हटा। उसने बरगद के तने को दोनों हाथों से पकड़ लिया। ‘‘पहले मुझे काटो।’’
कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया। केवल बारिश की आवाज सुनाई दे रही थी। तभी पीछे से ढोल की धीमी थाप सुनाई दी। निपुण ने मुड़कर देखा-गांव के लोग लालटेनें लिए चले आ रहे थे। सबसे आगे उसकी दादी थीं। उनके पीछे औरतें, बच्चे और बूढ़े। एक बूढ़ी औरत ने ऊंची आवाज में लोकगीत छेड़ दिया ‘‘जंगल जिनगी, जंगल साँस, जंगल धरती के विश्वास——-पेड़ कटे तो सूखै भाग, रोवै धरती, रोवै आकाश—-’’
गीत धीरे-धीरे सबकी आवाज बन गया। खड़ताल बजने लगा। बारिश और तेज हो गई। बिजली चमकी। उसी क्षण आधा कटा बरगद जोर से चरमराया। लकड़ी काटने वाले डरकर पीछे हट गए। विशाल शाखा टूटकर जमीन पर गिरी। मिट्टी उछल गई। ‘‘भागो!’’ किसी ने चिल्लाया। लकड़ी वाले अंधेरे में भाग खड़े हुए।
निपुण अब भी बरगद से लिपटा खड़ा था। उसकी हथेलियाें में मिट्टी थी, आंखों में आंसू और चेहरे पर बारिश की धार। दादी धीरे-धीरे उसके पास आई। उन्होंने कांपते हाथों से उसका सिर सहलाया। ‘‘आज तूने सिर्फ पेड़ नहीं बचाया रे,’’ उन्होंने भर्राई आवाज में कहा-‘‘तूने कुसमी की आत्मा बचा ली।’’ उस रात गांव में कोई नहीं सोया। लोग सरोवर किनारे आग जलाकर बैठे रहे। कुछ औरतें कटे हुए हिस्से पर हल्दी और मिट्टी लगा रही थी, जैसे किसी घायल इंसान का उपचार कर रही हों। बच्चे पेड़ों के चारों ओर घेरा बनाकर बैठे थे। पहली बार निपुण ने महसूस किया कि जंगल सचमुच जीवित होता है।
अगली सुबह सूरज निकला तो सरोवर के पानी में सुनहरी चमक उतर आई। बरगद घायल था, लेकिन खड़ा था। उसकी शाखाओं पर बैठे पक्षी फिर चहचहा रहे थे। गांव के लोग उसे देखकर मुस्कुरा रहे थे। उस दिन पंचायत बुलाई गई। लंबे समय तक चर्चा हुई। आखिर निर्णय लिया गया कि कुसमी के जंगल को सामुदायिक धरोहर किया जाएगा। बिना पूरे गांव की अनुमति कोई भी पेड़ नहीं काट सकेगा। हर विवाह में दो पौधे लगाए जाएंगे-एक दूल्हा लगाएगा और एक दुल्हन। स्कूल के बच्चों के लिए ‘एक बच्चा, एक पेड़ अभियान’ शुरु किया जाएगा। पंचायत के अंत में गांव के मुखिया ने निपुण को आगे बुलाया। ‘‘आज से यह लड़का सिर्फ अपने घर का नहीं,’’ उन्होंने कहा, ‘‘पूरे कुसमी का बेटा है।’’ लोगों ने तालियां बजाई। लेकिन निपुण चुप रहा। उसकी आंखें सरोवर किनारे खड़े उस बरगद पर टिकी थीं। हवा चली तो उसकी पत्तियां फिर कांपी। इस बार निपुण को लगा जैसे पेड़ उसे आशीर्वाद दे रहा हो।
समय बीतता गया। निपुण बड़ा हुआ। पढ़ाई के लिए शहर गया। उसने वहां ऊंची इमारतें देखीं, शीशे की दीवारें देखीं, ऐसे पार्क देखे जहां पेड़ों की जड़ों तक सीमेंट भरा था। लोगों के पास समय नहीं था। बच्चे मोबाइल में जंगल देखते थे, असली जंगल नहीं।
लेकिन हर छुट्टी में निपुण कुसमी लौट आता। सरोवर किनारे बैठता। बरगद को छूता। दादी अब बहुत बूढ़ी हो चुकी थीं। उनकी चाल धीमी पड़ गई थी, लेकिन जब भी निपुण लौटता, वे मुस्कुराकर कहतीं-‘‘देखा, पेड़ ने तुझे बुला ही लिया।’’ एक दिन दादी ने उसे अपने पास बुलाया, उनकी आवाज बहुत धीमी थी। ‘‘निपुण’’, उन्होंने कहा, ‘‘संस्कार किताबों से नहीं बचते। उन्हें जीना पड़ता है।’’ निपुण की आंखें भर आई। उसने दादी का हाथ पकड़ लिया।
कुछ महीनों बाद दादी इस दुनिया से चली गई। पूरे गांव ने सरोवर किनारे उनके नाम पर एक पीपल का पौधा लगाया। पौधा लगाते समय निपुण की आंखों के सामने बचपन की सारी बातें घूम रही थी-लोकगीत, बरगद, बारिश वाली रात और दादी की आवाज। उसने मिट्टी में हाथ दबाते हुए मन ही मन कहा-‘‘दादी, मैं कुसमी को कभी सूखने नहीं दूंगा।’’
सालों बाद कुसमी बदल चुका था। अब वहां स्कूल की दीवारों पर पेड़ों की चित्रकारी थी। हर बच्चे का एक अपना पौधा था। विवाहों में पौधा लगाने की परंपरा और भी बड़े उत्सव में बदल चुकी थी। दूर-दूर से लोग इस परंपरा को देखने आते।
सरोवर किनारे वही पुराना बरगद अब और विशाल हो चुका था। उसकी शाखाएं दूर तक फैल गई थीं। बच्चे उसकी जड़ों पर झूलते, बूढ़े उसकी छांव में बैठकर हुक्का पीते और औरतें वहीं बैठकर गीत गाती।
एक शाम निपुण अकेला बरगद के नीचे बैठा था। हवा में फिर वही पुराना लोकगीत तैर रहा था। सूरज धीरे-धीरेे सरोवर में उतर रहा था। उसने ऊपर देखा-बरगद की पत्तियां हवा में कांप रही……………………………………………
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