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सपनों के बारे में मनोविज्ञान क्या कहता है?

लेख
मुग्धा
जाह्नवी जून 2026 अंक


—पर्यावरण विशेषांक—

गहरी या कम गहरी नींद में कोई एक या दो सपने देखना या स्वप्न में कोई संकेत पा लेना, यह तो शायद अधिकतर लोगों के साथ होता ही है।

सपने अक्सर चाैंका देते हैं। एक अविश्वसनीय सी दुनिया देखकर हम पसीने-पसीने होकर जाग जाते हैं। तब हमारी सांस में सांस आती है कि ओह, यह तो सपना था। ये सपने भी अपने आप में किसी अजूबे से कम नहीं होते। सपने देख पाना उनको याद करके महसूस भी करना यह एक कुदरती उपहार के समान ही तो है। अक्सर सपना याद नहीं रहता है। रहता भी है तो बस टुकड़े-टुकड़े में ही।
कितने ही लोग तो अपना सपना पूरा का पूरा याद रखते हैं और उसे अपनी बातचीत के दौरान हूबहू साझा भी कर लेते हैं। ऐसा लगता है कि सपने किसी भी इनसान के लिए उसके जीवित होने का संकेत होता है। सपने की अनुभूति इस जीवित होने में रंग भरने का काम करती है। कितने ही लोग कहते हैं कि उनको सपने में जीवन की कोई दिशा भी मिल गई। कोई कहता है कि जीवन की किसी जटिल समस्या का हल मिल गया आदि, इत्यादि। गहरी या कम गहरी नींद में कोई एक या दो सपने देखना या स्वप्न में कोई संकेत पा लेना, यह तो शायद अधिकतर लोगों के साथ होता ही है। काफी समय से मनोवैज्ञानिक भी इस बात को मानने लगे हैं कि सपने अगर याद रखे जायें, सिलसिलेवार इनकी भाषा को समझा जाये तो इनमें कुछ न कुछ उपयोगी और गहरा संदेश तो विद्यमान होता है।
सपनों की बात चलती है तो सिगमंड फ्रायड का नाम जुबान पर आ ही जाता है। जाने-माने मनोवैज्ञानिक और दार्शनिक सिगमंड फ्रायड ने उन्नीसवीं सदी में सपनों पर एक रोचक पुस्तक लिखी। जिसका शीर्षक है ‘द इंटरप्रिटेशन ऑफ ड्रीम्स’ यह पुस्तक बहुत चर्चित हुई थी। इस पुस्तक में पहली बार सपनों को मनोविज्ञान से जोड़कर देखा गया था। इससे पहले यूनान में भी सपनों को लेकर काफी शोध हुए हैं। ऐसे अनगिनत संदर्भ मिलते हैं कि यूनान में सदियों पहले से बीमार लोगों को मंदिर में लाकर गहरी नींद में सुलाया जाता था। ऐसा विश्वास था कि मंदिर में सोने से रोगी को ऐसा सपना जरूर ही आयेगा कि उसके संकेत से अपनी जीवनशैली को बदलकर वह रोगमुक्त हो जायेगा।
जाने-माने गणितज्ञ व आस्तिक रामानुजन गणित के किसी मुश्किल सवाल को हल करने पर कहते थे कि रात में कुलदेवी उनके सपने में आती है और जवाब बताती है। ऐसा भी नहीं कि वे यह बात मजाक के तौर पर कहते थे। गणित संबंधी अपने सपने को लेकर वह बेहद गंभीर थे। एक बार उन्होंने इंटरव्यू में कहा था कि कम उम्र में सपने में प्रेरणा पाकर ही मैंने जानें कितने ही जटिल प्रमेयों की रचना की। गणित के नए सूत्र दिए। मेरे साथ एक खास बात होती थी। कई बार गणित की किसी प्रमेय या सवाल पर मेरा दिमाग और मैं जब उलझ जाते थे, खाना-पीना तक भूल जाते। कई बार हल निकल आता था, कई बार नहीं। तब वह हल हमेशा नींद में सपने में मिलता था।
सपने केवल आने वाले कल की भविष्यवाणी नहीं होते। उनमें हमारे उन कामकाज और कार्यकलाप की समस्याएं भी निहित रहती हैं जो हम दिन की रोशनी में करते हैं। संसार की कई वैज्ञानिक उपलब्धियां तो सपनों की ही उपज रही है। मिसाइल मैन कलाम भी यही कहते थे कि ‘‘मेरा एक सपना था, अपने गांव से निकल कर कुछ कर दिखाना। और आगे चलकर वह सपना सच हुआ।’’
सपनों को याद करना और उनका विश्लेषण करना हमें अपने बारे में बताता है, उन चीजों के बारे में जो कहीं दबा छिपा है। ऐसे में जब हम अपने अवचेतन के बारे में बहुत सचेत नहीं रहते। सपनों का विश्लेषण हमें उसके बारे में बहुत कुछ बता सकता है। अगर हम यह समझ लें कि सपने बनते कैसे हैं, तो हम अपने मन के उन कोनों के बारे में भी बखूबी जान सकते हैं जिन्हें हम अब तक ठीक से नहीं जानते थे। सपने कभी बेमतलब नहीं होते। उनका एक अर्थ होता है। हम में से हर कोई अपने प्रतीक चुनता है और उन्हें छिपाकर सपनों में उसके अर्थ खोजता है।
हरेक के सपने का अपना एक खास प्रतीक होता है। सपनों के अर्थ छिपे होते हैं, क्योंकि सपनों का सच बहुत बार बहुत आश्चर्यजनक और अप्रत्याशित होता है।
एक बार राजा जनक राज महल में सो रहे थे। उन्होंने स्वप्न देखा कि राज्य में भारी अकाल पड़ा। भूख और अभाव से जनता परेशान है। शासन व्यवस्था भी चरमरा गई है। प्रजा ने राजा को देश से निकाल दिया है। वह भूखे प्यासे दर-दर भटक रहे हैं। भूख और प्यास से व्याकुल हाकर वह एक श्रेष्ठि के द्वार पर पहुंचे। वहां सदाप्रत चल रहा था। श्रेष्ठि ने मिट्टी के बर्तन में जनक को खिचड़ी परोसी। जैसे ही वह खाने बैठे दो सांड लड़ते हुए वहां आए, अफरा-तफरी मची और जनक को परोसी खिचड़ी का बर्तन टूट गया। खिचड़ी धूल में मिल गई। इसी समय जनक की नींद खुली। वह व्याकुल हो गए। उनकी आंखों से आंसू की धारा फूट पड़ी। क्या सारा राज्य नष्ट हो गया, क्या मैं दर-दर का भिखारी बन गया हूं? राजा को कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था। उसी समय प्रातः कालीन शहनाई बजी और संगीत की स्वर लहरियां झनझनाने लगी। अब भाटगण महाराजा के जयकारें लगा रहे थे। वह सोचने लगे, खिचड़ी की बात सत्य है या यह जय-जयकार सत्य है?
राजा जनक राज्यसभा में पहुंचे। उन्होंने सभासदों से पूछा-यह सत्य है या वह सत्य है? राजा के प्रश्न का उत्तर कोई भी न दे सका। अंत में उन्होंने अष्टावक्र ट्टषि के सामने यह प्रश्न रखा। अष्ठावक्र ने कहा, राजन! तुमने जो स्वप्न में देखा है वह भी मिथ्या है और जो तुम जागृत अवस्था में देख रहे हो, वह भी मिथ्या है। न यह सत्य है, न वह सत्य है। जैसे स्वप्न भ्रमजाल है वैसे संसार भी भ्रमजाल है। जिस संसार वैभव को मोहमाया में उलझा व्यक्ति शाश्वत समझता है, वह शाश्वत नहीं है। अशाश्वत की भूल-भुलैया में न फंसो। पर जो शाश्वत आत्मा है, उस पर ध्यान केन्द्रित करो।
आज भी हमको अपने आस-पास ऐसे बहुत से लोग मिल जायेंगे जो यह कहते हैं कि उनके द्वारा उनकी जिंदगी में जो सपने देखे गये, वह पूरे तो हुए ही साथ ही जीवन भी पूरी खूबसूरती से आगे को बढ़ता रहा। कुछ लोगों ने सपने देखे और अपनी कला को अनने हुनर को पराकाष्ठा पर पहुंचा दिया।
मगर, बुरे सपने याद न रहें ठीक है। मगर बुरे सपने भी सकारात्मक होते हैं। हमारी भारतीय संस्कृति में तो मान्यता है कि अगर स्वप्न में किसी मृत देखते वह भी अच्छा संकेत है। कहते हैं कि इससे उस व्यक्ति की आयु और बढ़ जाती है। सुनने में यह अजीब बात लगती है। मगर यूनान, मिस्र आदि में भी यही विश्वास है कि जो सपने में मृत होेेेेता है वह अपने वास्तविक जीवन में उतना ही अधिक सेहतमंद रहता है।
हम जो सपने खुली आंखों से देखते हैं उन सपनों को पूरा करने की कोशिश में हम अपना पूरा जीवन लगाते हैं। उन सपनों को साकार करने के लिए हम क्या कुछ नहीं करते। चाहे वह हमारी हद में हो या उससे बाहर, उसे पूरा करने की कोशिश जरूर करते हैं। वह कोशिश करना हमारा अपना अधिकार और कर्तव्य दोनों ही है। खुली आंखों से देखे सपने या नींद में आने वाले सपने सब एक दूजे का साकार स्वरूप क्योंकि उसमें हमारी योजना जुड़ती है, पूरा करने की चाह जुड़ती है। बड़ी तसल्ली और योजनाबद्ध तरीके से हम सपने के पीछे लगे होते हैं। उस एक सपने को पूरा होता देख, एक और सपने की भूमिका तैयार होने लगती है। उससे और आगे का सफर……………….इस लेख को पूरा पढ़ने के लिए जाह्नवी का जून 2026 अंक देखें

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