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स्कूलों की जिम्मेदारी बच्चों के जीवन में खोया हुआ बचपन और उत्सव लौटाना

जब त्यौहार थे बचपन की पहचान

— लेख —
— विभा कनन —

जाह्नवी जून 2026 अंक
पर्यावरण विशेषांक

स्कूलों का उद्देश्य केवल अच्छे विद्यार्थी बनाना नहीं, बल्कि अच्छे इंसान तैयार करना है। जब शिक्षा में त्यौहारों की खुशियां, संवेदनाओं की रोशनी और संस्कारों की मिठास होगी, तभी बच्चों का सर्वांगीण विकास संभव होगा।

एक समय था जब स्कूलों में त्योहारों का मौसम बच्चों के लिए खुशियों का मौसम होता था। दीपावली पर रंगोली प्रतियोगिताएं, राखी बनाने की कक्षा, स्वतंत्रता दिवस पर झंडा फहराने के बाद मिठाई बांटने का उत्साह-सब कुछ स्कूल की दीवारों से झलकता था।
बच्चे उत्सवों के जरिए न केवल परंपराएं सीखते थे, बल्कि साझा आनंद और मिल-जुलकर जीने की भावना भी विकसित करते थे।
पर आज वही स्कूल, वही क्लासरूम और वही बच्चे———–कहीं न कहीं त्यौहारों और बचपन की खुशियों से दूर होते जा रहे हैं। त्यौहार अब छुट्टी के कैलन्ेडर तक सीमित हैं और बचपन अब परीक्षा और प्रोजेक्ट के बीच फंसा हुआ है। ऐसे में सवाल उठता है-
क्या स्कूलों की जिम्मेदारी केवल अंक देना है या बच्चों को जीवन का आनंद सिखाना भी?
त्यौहार और शिक्षा परंपरा का संगम
भारतीय संस्कृति में शिक्षा केवल पुस्तक ज्ञान नहीं रही, बल्कि संस्कार और जीवन मूल्यों का माध्यम रही है। त्यौहार, संस्कार और परंपराएं बच्चों को जीवन के रंगों से परिचित कराती है। होली सिखाती है, आनन्द और एकता का संदेश, दीपावली अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ने का प्रतीक है, रक्षाबंधन विश्वास और प्रेम का पर्व है और ईद, क्रिसमस हमें मिलजुल कर जीने की सीख देते हैं।
यदि स्कूल इन त्यौहारों को शैक्षिक गतिविधियों में शामिल करें, तो बच्चे केवल तिथि या रीति नहीं, बल्कि उनके पीछे छिपे मानवीय मूल्य भी समझ सकते हैं। स्कूलों की भूमिका केवल आयोजक की नहीं, बल्कि संस्कृति के संवाहक की बन जाती है।
त्यौहारों से दूर होता विद्यालय
आधुनिकता की विडंबना

आज के अधिकतर निजी स्कूलों में त्यौहारों का स्वरूप औपचारिक और सीमित हो गया है। कहीं केवल ‘ड्रेस कोड’ और ‘फोटो सेशन’ रह गया है, तो कहीं एक छोटा सा ‘सांस्कृतिक कार्यक्रम’ मात्र। बच्चों को त्यौहार का असली अर्थ-साझेदारी, अपनापन और आनंद-अब कम महसूस होता है।
कुछ स्कूलों में तो यह धारणा बन गई है कि ‘त्यौहारों को समय देना पढ़ाई का नुकसान है।’ पर क्या वास्तव में यह समय का नुकसान है या यह संवेदनाओं का निवेश है? क्योंकि वही त्यौहार बच्चे को सिखाते हैं कि जीवन केवल रेस नहीं, उत्सव भी है।
छुट्टियां घटतीं, भावनाएं मिटतीं
पिछले कुछ वर्षों में यह देखा गया है कि स्कूलों ने त्यौहारों की छुट्टियां घटा दी हैं। जहां पहले दीपावली या दशहरा की छुट्टियां बच्चों को परिवार के साथ समय बिताने का अवसर देती थीं, पर अब ऐसा नहीं रहा।
बच्चों को पढ़ाई का दबाव तो झेलना पड़ता है, पर उन्हें जीवन के रंगों का अनुभव नहीं हो पाता। जब घर और स्कूल दोनों से त्यौहार का माहौल घटता है, तो बचपन की उत्सुकता और सामाजिक संवेदना भी धीरे-धीरे खो जाती है।
विद्यालय-केवल शिक्षा केन्द्र नहीं, जीवन केन्द्र भी
स्कूल केवल वह स्थान नहीं जहां बच्चे पढ़ना लिखना-सीखते हैं, बल्कि वह स्थान है जहां वे जीना सीखते हैं।
त्यौहारों के आयोजन, सामाजिक गतिविधियां, नाटक, गीत, नृत्य, कला-ये सब अकादमिक विषय नहीं हैं, बल्कि जीवन के पाठ हैं।
यदि स्कूल बच्चे के मन में जिज्ञासा, संवेदना और सौहार्द के बीज नहीं बो पाए, तो उसकी शिक्षा अधूरी रह जाएगी। स्कूल को यह समझना होगा कि पुस्तकीय ज्ञान और जीवन ज्ञान में संतुलन ही सच्ची शिक्षा है।
त्यौहारों के माध्यम से मूल्यों की शिक्षा
हर त्यौहार में एक शिक्षाप्रद संदेश छिपा है- होली-भेदभाव मिटाकर एकता का रंग।
दीपावली-आत्मविजय और स्वच्छता का संदेश।
ईद-सबके प्रति दया और साझा भोजन का महत्व।
क्रिसमस-प्रेम, दान और करुणा की भावना।
गणेशोत्सव-ज्ञान और विनम्रता का मेल।
अगर स्कूल इन त्यौहारों को केवल एक दिन की गतिविधि नहीं बल्कि मूल्यों की शिक्षा के अवसर के रूप में लें, तो बच्चों में सामाजिक, सांस्कृतिक और नैतिक विकास स्वाभाविक रूप से होगा।
बचपन का आनंद लौटाने की जिम्मेदारी
आज के बच्चे अत्यधिक प्रतिस्पर्धी माहौल में बडे़ हो रहे हैं। स्कूलों का फोकस ‘रैंक’, ‘ग्रेड’, ‘ओलंपियाड’, ‘कोडिंग’ जैसे शब्दों पर है, परन्तु कहीं न कहीं बचपन की खिलखिलाहट और सहजता गायब हो गई है।
स्कूलों को चाहिए कि वे बच्चों के लिए कुछ पल निष्कपट खुशी के भी बनाएं-जहां न कोई रिपोर्ट कार्ड हो, न कोई परिणाम। सिर्फ खेल, संवाद, रचनात्मकता और दोस्ती हो। वही क्षण जो जीवन का असली अर्थ सिखाते हैं।
स्कूलों की कुछ जिम्मेदारियां
1- त्यौहारों को शिक्षा से जोड़ना- प्रत्येक प्रमुख त्यौहार पर सांस्कृतिक व सामाजिक संदेश आधारित गतिविधियां आयोजित करना।
2- संवेदना आधारित पाठ्यक्रम- पाठ्यक्रम में मानवीय मूल्यों पर आधारित कहानियां, लोककथाएं और जीवन प्रसंग जोड़ना।
3- बच्चों को सहभागिता का अवसर देना-केवल देखने नहीं बल्कि करने और सोचने का मौका देना।
4- पारिवारिक सहयोग को प्रोत्साहन-अभिभावकों को भी त्यौहारों के आयोजन में शामिल करना, ताकि घर विद्यालय का संबंध मजबूत बने।
5- स्थानीय परंपराओं को पहचान देना-हर क्षेत्र की संस्कृति, लोक उत्सवों को स्कूल के स्तर पर मनाना, जिससे बच्चों में अपनापन और गर्व की भावना जगे।
शिक्षकों की भूमिका-प्रेरणा के दीप जलाना
शिक्षक केवल ज्ञानदाता नहीं, बल्कि संवेदनाओं के मार्गदर्शक होते हैं। यदि शिक्षक अपने आचरण से बच्चों को यह अनुभव कराएं कि सीखना और जीना दो अलग बातें नहीं है तो बच्चे हर अनुभव से कुछ नया सीखेंगे। एक शिक्षक जो बच्चों को बोलने, हंसने और जिज्ञासु बने रहने की आजादी देता है, वही बच्चे के भीतर आत्मविश्वास और आत्मीयता का दीपक जलाता है।
विद्यालय का वातावरण-जहां जीवन मुस्कुराए
स्कूल का वातावरण केवल इमारतों और क्लासरूम से नहीं बनता, बल्कि वहां की संवेदनाओं, परंपराओं और मानवीय रिश्तों से बनता है। यदि विद्यालय हर त्यौहार को पूरे मन से मनाए, बच्चों को उसकी तैयारी में भागीदार बनाएं तो बच्चों के लिए स्कूल केवल पढ़ाई का नहीं, जीवन का उत्सव स्थल बन जाएगा।
त्यौहार और बचपन-पुनः जोड़ने का आह्वान
त्यौहारों के बिना बचपन अधूरा है, और बचपन के बिना त्यौहार बेरंग। जब स्कूल बच्चों को……………….इस लेख को पूरा पढ़ने के लिए जाह्नवी का जून 2026 अंक देखें


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