जाह्नवी जून 2026 अंक
पर्यावरण विशेषांक
सम्पादकीय
भारत भूषण चड्ढा
पिछले कुछ वर्षों से समाज में पर्यावरण के प्रति जागरूकता बढ़ी है। यह एक शुभ-संकेत है। प्रकृति पांच तत्वोें से बनी है धरती, जल, अग्नि, वायु और आकाश। ईश्वर तो हमारी आस्था से जुड़ा है। इसलिए उसके अस्तित्व के बारे में दार्शनिकों में मतभेद हो सकते हैं परन्तु प्रकृति के इन तत्त्वों का अनुभव तो हम प्रत्यक्ष देख रहे हैं कि सृष्टि कैसे इन पांच तत्वों के संतुलन से अस्तित्व में है। मनुष्य ने जब-जब इस के संतुलन को बिगाड़ा है सृष्टि में उसकी प्रतिक्रिया हुई है और एक बवंडर खड़ा हो गया है।
इसके अतिरिक्त मनुष्य भी इन्हीं पांच तत्वों का बना हुआ है। अतः उसके जीवन और स्वास्थ्य पर भी इन्हीं तत्वों का सीधा प्रभाव पड़ता है। पहले हम ब्रह्माण्ड की बात करें। सूर्य, चन्द्र, नक्षत्र, तारे सभी प्रकृति के अंग हैं। वर्षा, धूप, हिम, वायु, नदियां, वन, पर्वत, रात-दिन ऋतुएं, जंगल, जीव-जन्तु प्रकृति का एक संतुलित चक्र है। हर तत्त्व का प्रकृति के चक्र को संतुलित बनाए रखने में अपना योगदान है। इस कारण ही ब्रह्माण्ड युगों से गतिमान है।
अब इस प्रकृति के चक्र में मनुष्य को यह शक्ति प्राप्त है कि वह प्रकृति की स्वस्थ सम्पदा से अपने जीवन का विकास कर सके। उसका शरीर भी इन्हीं पांच तत्वों से बना है। केवल मन, बुद्धि और चेतना अतिरिक्त है, जिसके कारण वह कार्य करने में स्वतंत्र है। हम इसके दार्शनिक पहलुओं में न जाकर केवल यही मानकर चलें कि इसके शरीर के पांच तत्त्वों और ब्रह्माण्ड के पांच तत्त्वों में तालमेल बना रहेगा तभी यह शरीर अस्तित्व में रहेगा। इसलिए पांच तत्त्वों के संतुलन का प्रश्न व्यक्ति के जीवन से गहरा जुड़ा है।
इसके अतिरिक्त सभी प्राणियों में मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है जिसे कर्म करने की स्वतंत्रता है। शेष सभी जीवों के लिए यह भोग भूमि है। बैल को जहां जन्म मिला है उसे भोगना है परन्तु मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है जो अपने कर्म से अपने भाग्य को संवार सकता है। यह सारी पृष्ठभूमि बताने से तात्पर्य यही है कि पर्यावरण हमारे जीवन को सर्वाधिक प्रभावित करता है।
आज इसके प्रति जागरूकता बढ़ी है। मनुष्य सोचने लगा है कि हमें प्रकृति का दोहन करने का अधिकार तो है परन्तु इसके शोषण करने से प्रतिफल भी हमें ही भुगतना पडे़गा।
प्रकृति के इन तत्त्वों में मानव की सहायता करने की कितनी शक्ति है, इसका आकलन करें। गेहूं का एक दाना धरती में बोया जाता है। धरती उसका सौ गुना बनाकर वापस करती है। परन्तु हम उसमें कृत्रिम रसायन यूरिया आदि डालकर उससे अधिक उपज लेने का उपक्रम करते हैं तो धीरे-धीरे उसकी उर्वरता ही नष्ट हो जाती है। हम पेड़ को काटकर अपने उपयोग में लाते हैं पर नए पेड़ नहीं लगाते तो प्रकृति में वायु तत्व प्रदूषित हो जाता है और उससे वर्षा का प्राकृतिक चक्र बिगड़ जाता है। कभी अनावृष्टि कभी अतिवृष्टि होती है। भूस्खलन और भूकम्प जैसी आपदाएं आती है।
नदियों के रूप में जल प्रकृति ने हमारे लिए उपलब्ध किया है परन्तु हम उसे प्रदूषित कर विषैला बना रहे है।
हमारा तो मानना है कि प्रकृति के सभी तत्त्वों में असीम शक्ति है जिसकी हम सामान्य बुद्धि से कल्पना भी नहीं कर सकते। आज से पचास वर्ष पहले कोई कल्पना कर सकता था कि आकाश में इतनी शक्ति है कि अमेरिका में हो रही घटना का सीधा चित्र अपने हाथ के मोबाइल में तत्काल देखा जा सके, लेकिन आज तो बातचीत के साथ आप परस्पर एक दूसरे का चित्र भी देख लेते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि हमारी सीमित बुद्धि है हम अपने जीवन को सुखी सफल और आनन्दमय बनाना है तो प्रकृति को प्रदूषित न करें उसका सहयोग लें, उसका उचित दोहन करें, परन्तु उसका शोषण न करें।
प्रकृति के साथ अनाचार का सबसे पहले प्रभाव आपके स्वास्थ्य पर पड़ता है। आप वायु को जहरीला बना रहें हैं तो उस प्रदूषित वायु से सबसे पहले आप के फेफड़े अस्वस्थ होंगे। जल प्रदूषित होगा तो आपको पेट के अनेक रोग घेर लेंगे।
आज लोगों का स्वास्थ्य बिगड़ रहा है। पचास वर्ष पार करते-करते रोग आक्रमण करने लगते हैं। यह ठीक है कि एलोपैथी के बड़े-बड़े अस्पताल आप को जल्दी मरने नहीं देते परन्तु दवाइयों के बल पर जीवन में जीने का आनन्द नहीं रहता। एक दवाई होने से पड़ने वाला दुष्प्रभावों से आप रोगों के मकड़जाल में फंस जाते हैं और जीना बोझ हो जाता है।
इस सबके लिए हमारी जीवन-शैली उत्तरदायी हो रही है। हमने अपनी पुरानी जीवनशैली को त्याग दिया है। पाश्चात्य जीवनशैली देर से सोना, देर से खाना, प्रातः देर से उठना, व्यायाम आदि में भी रूचि न होना। आपके स्वास्थ्य को बिगाड़ रहे हैं। एक मनोवैज्ञानिक प्रभाव हमारे मन पर है कि सुविधा पूर्वक जीओ, क्यों शरीर को अनुशासन में रखो? बीमार हो गए तो इतने बड़े-2 अस्पताल हैं, दवाई लेकर ठीक हो जाएंगे।
नियमित रूप से अपने आपको स्वस्थ रखने के लिए लोग सकारात्मक प्रयासों में रूचि ही नहीं लेते। बड़े निराशाजनक ढंग से कहते हैं कि जल में प्रदूषण है, वायु में प्रदूषण है, खाने-पीने में मिलावट है। हम कहां तक अपने आपको बचा सकते हैं। यह नकारात्मक सोच है। व्यक्ति अपने स्तर पर पर्यावरण शुद्ध रखे।
लेकिन इसके लिए कोई प्रयास नहीं करता। वह सोचता है कि यह सब सरकार की जिम्मेदारी है। इस बात में कोई शक नहीं कि पर्यावरण को शुद्ध रखना एक सामूहिक जिम्मेदारी है। वह सरकार कानून के डंडे से करवाए या समाज सुधारक, सन्त पुरुष अपने प्रवचनों द्वारा समाज को प्रेरित करें कि वह पर्यावरण को शुद्ध रखे। लेकिन यह योजना तो सामूहिक दृष्टि से ही बनाई जाएगी। जैसे स्वच्छता अभियान सरकार द्वारा लिया गया। इसमें यदि सामाजिक संगठन आदि सहयोग करेंगे तभी सफल होगा।
नदियों को स्वच्छ रखने के लिए सरकार ने कड़ाई से काम लेना शुरू किया है ताकि फैक्ट्रियों से निकलने वाला प्रदूषित जल, मल नदी में न उड़ेला जा सके। इसी प्रकार जहां प्रदूषण है उसमें सरकार की कड़ाई होगी तथा समाज का सक्रिय सहयोग मिलेगा तभी यह संभव हो सकेगा।
यह सौभाग्य का विषय है कि केन्द्र में ऐसी सरकार है जो समाज को साथ लेकर चलने का प्रयास कर रही है। योग, व्यायाम, प्राणायाम, पर्यावरण के दूषित प्रभाव से बचाने का मुख्य उपाय है। इसके लिए सरकार ने अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर राज्य को योग दिवस घोषित करवाने में सफलता पाई है। यदि समाज भी उसी स्तर पर अपनाएं, स्कूलों आदि में योग को पाठ्यक्रम में लाया जाय तो स्वास्थ्य की दृष्टि से समाज में अच्छा सुधार हो सकता है।
एक अन्य उपाय भी हमारी दृष्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण है। हमारे प्राचीन शास्त्रें में यज्ञ को अत्यन्त महत्व दिया गया है। कोई भी शुभ कार्य करना हो, यज्ञ के द्वारा ही उसकी परिणति होती है। विवाह बंधन में बंधना है तो वर-वधू को यज्ञ कुण्ड के चारों ओर फेरे लगवाए जाते हैं। गृहप्रवेश हो या जन्मदिवस सब में पवित्र विधान है कि यज्ञ किया जाय। हर दिन प्रातःकाल हर घर में यज्ञ करने के लिए प्रेरित किया जाता है। यह यज्ञ मात्र एक धार्मिक कृत्य (पूजा पद्धति) नहीं है। वायुमण्डल को शुद्ध बनाए रखने का प्रयास है।
अग्नि में पदार्थों की शक्ति को बढ़ाने की अद्भुत शक्ति है। आप एक मिर्च को अग्नि में डाल दीजिए, देखिए पूरा मुहल्ला खांसने लगेगा। जब आप यज्ञ कुण्ड की अग्नि में सुगंधित सामग्री औषधियां डालते है तो वह कई गुना उत्सर्जित होकर वायुमण्डल को शुद्ध करती हैं। वायु को शुद्ध करने का यह एक वैज्ञानिक प्रयास था।
वायु में ही उष्णता आदि का प्रभाव बढ़ने-घटने से कभी ओले पड़ते हैं और कभी अतिवृष्टि या अनावृष्टि होती है। इसे अनुकूल रखने का यज्ञ एक अमोघ प्रयास था। वेदों में यज्ञ की बड़ी महिमा गाई गई है। परन्तु विडम्बना यह है कि हमने इसे मात्र एक धार्मिक कृत्य मान लिया है अर्थात् पूजा पद्धति के अन्तर्गत समाहित कर लिया है। इस दृष्टि से भी वैज्ञानिकों द्वारा शोध होने चाहिए और पुनः यज्ञ को लोगों के दैनिक जीवन में समावेश होने के लिए प्रयास किया जाना चाहिए। जब आज के डॉक्टर मानते हैं कि एक व्यक्ति सिगरेट पीता है तो उसके फेफड़े ही नहीं प्रभावित होते बल्कि उसके साथ बैठे हुए परिवार के लोग भी प्रदूषण के शिकार होते हैं तो यज्ञ करने से सुगंधित वायु से क्या पूरा वातावरण शुद्ध और स्वच्छ नहीं बनेगा।
पर्यावरण की दृष्टि से इस उपाय को भी सार्वजनिक दृष्टि से स्वीकृति दिलाई जा सकती है। सरकार इस पर शोध और अनुसंधान करवाकर इसके बडे़ स्तर पर प्रचारित करे। शुद्ध एवं सुगंधित वायु से बुद्धि के तन्तु खिलेंगे और वह अधिक बलशाली होंगे।
बुद्धि ही प्रत्येक क्रिया का संचालन करती है यदि बुद्धि शुद्ध वायु में सांस लेगी तो उसकी शक्ति कई गुना बढ़ जाएगी।
5 जून को पर्यावरण दिवस है। यदि हम अर्थात् समाज और सरकार दोनों मिलकर इस दृष्टि से जागरूकता पैदा करें और सकारात्मक दृष्टि से प्रयास करें तो समाज केवल रोगमुक्त ही नहीं होगा बल्कि उसकी शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक शक्ति कई गुना बढ़ जाएगी।

