कहानी
सुश्री सुशीला साहू
जाह्नवी जून 2026 अंक
पर्यावरण विशेषांक
गरीबी में पढ़े बच्चे के मन में संकल्प था कि वह बड़ा होकर अध्यापक बनूंगा
और गांव के हर गरीब के पढ़ने के लिए प्रेरित करूंगा। असंभव दिखने वाले कार्य को उस
अध्यापक ने कैसे कर दिखाया, एक प्रेरक कहानी।
भोलानाथ मास्टर जी को अचानक अपना अतीत याद आ गया था। जब छात्र दीपक ने अपने मन की बात उनके सामने कह दी। उस दिन स्कूल में बाल दिवस के अवसर पर प्रतियोगिता थी। बच्चों को उस ड्रेस में आने को कहा गया था, जो वे अपने जीवन में बनना चाहते हैं। जैसे इंजीनियर, वैज्ञानिक, अधिकारी, वकील, डॉक्टर, शिक्षक, सैनिक, राजनेता आदि। प्रतियोगिता कुछ इस तरह थी कि उनके डेªस को देखकर उन्हें कुछ अंक दिए जायेंगे और शेष अंक उनसे पूछे गये प्रश्नोत्तर के अनुसार दिए जायेंगे। अंत में उन्हें अंकों के आधार पर ही पुरस्कार दिया जायेगा। प्रश्नोत्तर के समय जब छात्र दीपक ने उत्तर दिया, ‘‘सर, मैं आपकी तरह एक शिक्षक बनना चाहता हूं।’’ तो मास्टर भोलानाथ जी को अचानक अपना अतीत दिखाई पड़ गया। हां, बचपन में यही उत्तर तो उन्होंने भी अपने शिक्षक को दिया था। जब उनसे पूछा गया, ‘‘भलकू, तुम बड़े होकर क्या बनना चाहते हो?’’ अब भोलानाथ को अपने बचपन के छोटे से भलकू का पूरा जीवन चलचित्र की भांति क्रमवार दिखने लगा।
छोटे से गांव कोटवारी में एक लड़का रहता था भलकू। रंग सांवला, कद नाटा, कपड़े साधारण, पर आंखों में चमक जैसे आसमान भर के तारे समा गए हों। गांव में लोग उसे अक्सर हल्के में लेते ‘‘अरे भलकू से क्या होगा, पढ़ाई तो उसके बस की बात ही नहीं।’’ पर भलकू के मन में एक सपना था। यह सपना इतना निर्मल था कि किसी भी बच्चे की आंखों में चमक ला दे। भलकू चाहता था कि वह पढ़-लिखकर एक कुशल शिक्षक बने। परन्तु घर की हालत कमजोर थी। पिता खेत में मजदूरी करते और मांँ दूसरों के घर चूल्हा-चौका करती। कई बार तो कॉपी-किताब भी खरीदना मुश्किल हो जाता। लेकिन भलकू की सोच बड़ी थी। वह कहता, ‘‘अगर कुछ सीखना है, जीवन में कुछ बनना है, तो गरीबी कोई भी रास्ता नहीं रोक सकती।’’ स्कूल में जब बच्चे महंगी कॉपियां और रंग-बिरंगी पेंसिलें लाते, भलकू पुरानी कापी के पीछे वाले खाली पन्नों पर लिखता। कई बार स्कूल में मास्टर जी रफ पेपर बांट देते, तो वह इतना खुश होता जैसे कोई अनमोल खजाना मिल गया हो। शाम को खेलते समय भी वह मिट्टी पर लकीरें खींच-खींचकर पहाड़ा रटता। यही उसका खेल था। खेल-खेल में पढ़ना और समय का सदुपयोग करना।
माँ उसे समझाती, ‘‘बेटा दिन भर किताबों में लगा रहता है। थोड़ा आराम कर लिया कर। वैसे भी कल छुट्टी है, सुबह खेत में भी जाना है।’’ भलकू मुस्कुरा देता, ‘‘मईया, एक दिन मैं टीचर बनूंगा। तब आप सबको मुझ पर गर्व होगा।’’
स्कूल के मास्टर, रमाकांत सर अंदर से कोमल और बच्चों के लिए बहुत संवेदनशील थे। उन्होंने देखा कि जब पूरा पीरियड खत्म हो जाता है, तब भी भलकू सवाल पूछने से पीछे नहीं हटता। एक दिन सर ने प्यार से पूछा था, ‘‘बेटा, तुम इतना मन से पढ़ते हो, मुझे बहुत अच्छा लगता है। अच्छा ये बताओ तुम पढ़-लिखकर क्या बनना चाहते हो?’’ भलकू ने धीरे से कहा ‘‘सर—–मैं भी आप जैसा शिक्षक बनना चाहता हूं। मैं ये भी चाहता हूं कि मेरे गांव में कोई बच्चा पढ़ाई को लेकर इसलिए न रुके कि उसके पास कॉपी-पुस्तक नहीं है। नौकरी करते समय मैं सबकी मदद भी करूंगा।’’ रमाकांत सर की आंखें भर आई। उन्होंने तय किया भलकू की सोच और मेहनत को व्यर्थ नहीं जाने देंगे। वे भी उसकी हर समय सहायता करने लगे। भलकू आठवीं में प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुआ।
उसे आगे की पढ़ाई के लिए शहर जाना पड़ा। वह अपने साथी के साईकिल से जाता, कभी उसका साथी साईकिल चलाता तो कभी वह खुद। अब तक वह प्रथम श्रेणी में दसवीं भी पास हो चुका था। अब उसने पैसे वाले लोगों के बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू कर दिया। वह खुद को समझाता ‘‘बस थोड़ा और—एक दिन यही संघर्ष मुझे सफलता की मंजिल तक पहुंचायेगा।’’
उसने अच्छे अंकों से उच्च शिक्षा प्राप्त की। शिक्षक बनने हेतु आवश्यक परीक्षा की तैयारी भी की। भलकू ने दिन-रात पढ़कर पहली ही बार में परीक्षा पास कर लिया। इंटरव्यू में उससे पूछा गया, ‘‘तुम टीचर क्यों बनना चाहते हो?’’ उसने बिना सोचे जवाब दिया ‘‘क्योंकि मैं चाहता हूं कि हमारे गांव का हर बच्चा पढ़े। मैं जानता हूं कि शिक्षा गरीबी को तोड़ती है और सपनों को जोड़ती है। सपने पूरे करने हेतु सर्वप्रथम शिक्षा सबसे जरूरी है।’’ भलकू का चयन हो गया। वह खुशी से फूला नहीं समा रहा था।
अब भलकू गांव लौटा मास्टर भोलानाथ बनकर। सुखद संयोग ही है, उसकी नियुक्ति अपने ही गांव के माध्यमिक स्कूल में हो गई थी। पहले दिन जब वह स्कूल पहुंचा, बच्चे उसे आश्चर्य से देख रहे थे। ‘‘अरे—-ये तो भलकू भैया हैं।’’
भोलानाथ मुस्कराए, ‘‘हां अब मैं तुम लोगों को पढ़ाऊंगा। लेकिन तुम लोगों के लिए वही भलकू भैया हूं। खूब मन लगाकर पढ़ना, घबराना नहीं, तुम सबको अच्छे नंबरों से पास होना है। फिर पढ़-लिखकर सबको बड़ा साहब भी तो बनना है न।’’ बच्चों ने तेज स्वर में कहा, ‘‘जी सर’’ तो उसी आवेग में कुछ बच्चे बोले, ‘‘जी भैया।’’
धीरे-धीरे नव नियुक्त शिक्षक भोलानाथ स्कूल की विभिन्न गतिविधियों से परिचित होते गये। बच्चों के अभिभावकों से परिचय, विभिन्न राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय दिवस पर आयोजित होने वाले कार्यक्रम, स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस जैसे राष्ट्रीय पर्वो पर भोलानाथ की विशेष सहभागिता रहती थी। भोलानाथ प्रत्येक कार्य को बहुत व्यवस्थित ढंग से करते थे, जिससे अन्य सभी शिक्षक बहुत प्रभावित होते थे।
समय का चक्र कभी नहीं रुकता, वर्तमान अतीत में समाता जाता है और प्रतीक्षा करता भविष्य प्रत्यक्ष दिखता है। इस स्कूल में अध्यापन करते भोलानाथ को कई वर्ष हो गये। प्रधान शिक्षक सेवानिवृत हो गये थे। नये प्रधान शिक्षक तो भोलानाथ से बहुत प्रसन्न रहते। यदि उन्हें अवकाश लेना होता तो विद्यालय की तमाम जिम्मेदारी वे भोलानाथ को ही सौंप कर जाते थे। जिसे भोलानाथ सहर्ष स्वीकार करते और निभाते थे। अब उनका स्कूल एक आदर्श स्कूल के रूप में स्थापित होने लगा था। शिक्षा ही नहीं खेल में भी यहां के बच्चे नाम रोशन करते थे।
शिक्षा के महत्व को लेकर भोलानाथ जी जितना छात्रें को बताते, उससे अधिक अभिभावकों को भी प्रेरित करते। उन्होंने अभिभावकों को शिक्षा का महत्व समझाया। गरीब बच्चों को अपने पैसे से कॉपी-पेंसिल दिलाई। सबसे बड़ी बात बच्चों में सपने बो दिए। उस दिन तो एक मार्मिक पल था, जब एक बच्ची रोते हुए बोली, ‘‘सर, मेरे पास कॉपी नहीं है———मैं होमवर्क कैसे करूं?’’ भलकू की आंखें भर आई। उसे अपने बचपन का हर संघर्ष याद आ गया। लड़की के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, ‘‘बेटी, चिंता मत कर——-तुम्हें जिन्दगी में कभी कॉपी की कमी नहीं होने दूंगा।’’ वह लड़की खुश होकर चली गई।
मास्टर भलकू ने आसमान की ओर देखा। ‘‘मैंने वादा निभा दिया, मईया—’’ अब वे भलकू नहीं रहे। उनकी पहचान मास्टर भोलानाथ के रूप में हो चुकी थी। और उनका स्कूल कुछ समय में पूरे ब्लॉक का सबसे अनुशसित और बेहतर स्कूल बन गया। लोग कहते ‘‘अरे, भोलानाथ जी ने तो सच में गांव का भाग्य बदल दिया।’’ अधिकतर लोग उन्हें मास्टर जी कहते थे। हमेशा विनम्र रहने वाले मास्टर जी गांव की तमाम गतिविधियाें में भी सहयोग करते थे। लोग कहते, ‘‘आप बच्चों की बहुत मदद करते हैं।’’ तो मास्टर जी कहते ‘‘मैं तो सिर्फ वही दे रहा हूं जो कभी मुझे नहीं मिला।’’ उनकी कहानी सिखाती है, गरीबी कभी प्रतिभा का रास्ता नहीं रोक सकती। शिक्षा केवल किताबों का नहीं, दिल का प्रकाश है।
एक अच्छा शिक्षक सिर्फ पढ़ाता नहीं, जीवन संवारता है। सपने छोटे नहीं होते, उन्हें पूरा करने का साहस बड़ा होता है। स्कूल के वार्षिकोत्सव में ही उन्हें ‘सर्वश्रेष्ठ शिक्षक’ का पुरस्कार मिला। तो राज्यपाल पुरस्कार के लिए भी वे चयनित हुए।
अब मास्टर जी ने पूरे गांव का माहौल ही बदल दिया था। उनके काम ऐसे थे कि हर कोई कहने लगा, ‘‘अरे, भलकू तो सच्चा दिल वाला मास्टर है, गुरु नहीं फरिश्ता है।’’ सबसे पहला काम जो उन्होंने किया, वह था बच्चों को स्कूल से जोड़ना। और अभिभावकों को शिक्षा का महत्व समझाना। गांव में कई बच्चे ऐसे थे, जो खेत में काम करने जाते, या छोटे मोटे धंधे में हाथ बंटाते। मास्टर जी एक-एक घर जाकर बोलते ‘‘भइया, बच्चे के हाथ में कुदाल दे दोे, तो वह खेत में ही रह जाएगा। लेकिन हाथ में कलम दे दोगे न, तो भगवान कसम उसकी ही नहीं आपकी भी किस्मत ——————————–
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