पर्यावरण लेख
दिनेश प्रताप सिंह ‘चित्रेश’
जाह्नवी जून 2026 अंक
पर्यावरण विशेषांक
प्लास्टिक के नकारात्मक प्रभाव की भयावहता से बड़ी जल्दी दुनिया कराह उठी। जल, थल और वायु के बीच प्लास्टिक के अपघटन की प्रक्रिया सौ साल तक जारी रहता है। अपघटन की क्रिया में यह सीधे वायु, जल और भूमि को प्रदूषित करते हैं।
जुलाई की 3 तारीख ‘अंतर्राष्ट्रीय प्लास्टिक बैग निषेध’ दिवस के रूप में मान्य है। इसका उद्देश्य प्लास्टिक के प्रदूषण से जन-जन को अवगत कराना और प्लास्टिक बैग के विरुद्ध लोगों में जागरूकता पैदा करना है। मजे की बात यह है कि शुरू में प्लास्टिक को पर्यावरण हितैषी माना गया था।
इंग्लैंड के धातु विज्ञानी अलेक्जेंडर पार्क्स ने सन् 1862 की लंदन की महान अंतर्राष्ट्रीय प्रदर्शनी में इसका प्रदर्शन किया था। अलेक्जेंडर पार्क्स के संदेश के अनुसार उनका यह आविष्कार भविष्य में मनुष्य और पर्यावरण के लिए बहुत उपयोगी होने की संभावना से भरा था। यह एक कार्बनिक पदार्थ सेल्यूलोस था। इससे विभिन्न आकार के हल्के, मजबूत और रंग बिरंगे आकर्षक कंटेनर बन सकते थे। किन्तु यह मंहगा था, इसलिए प्रचलन में न आ पाया।
मगर अलेक्जेंडर के संदेश से लोगों के मन में यह बात तो बैठ ही गई कि अगर इस किस्म का कोई सस्ता उत्पाद सामने आ जाये, तो वह दुनिया के लिए वरदान हो सकता है। वास्तव में उन दिनों कीमती सामानों की पैकेजिंग के लिए मोटे गत्तों का उपयोग होता था। सस्ती वस्तुओं और फल-सब्जियों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने के लिए लकड़ी के डिब्बों के लिए बहुतायत पेड़ों को काटना पड़ता था। लकड़ी के लट्ठों से लुगदी और लुगदी से गत्ता बनाने की रासायनिक प्रक्रिया खर्चीली थी, लिहाजा गत्ते महंगे पड़ते थे। लकड़ी की पेटियां और डिब्बे वजनदार होते थे। अंधाधुंध पेड़ों का कटना पर्यावरण की दृष्टि से गलत था इसलिए उत्पादक इकाइयों, व्यवसाइयों और ट्रांसपोर्टरों को सस्ते और हल्के विकल्प की तलाश थी।
सन् 1907 में लिओ बैकमैन ने पूरी तरह सिंथेटिक प्लास्टिक बना डाला। शुरू में इसे आविष्कारक बेकमैन के नाम पर बेकेलाइट कहा गया। इसी के आधार पर लिओ हेंडिक बैकलित ने सस्ता पालिमर प्लास्टिक बनाया था। यह सीलनरोधी, हल्का और विद्युतरोधी तो था ही, कुछ हद तक कंपन और गर्मी का भी अवरोधक कहा गया था। इस पालिमर के डिब्बे और गत्ते उत्पादक, आपूर्तिकर्ता और व्यवसायियों ने हाथों हाथ लिये। इन डिब्बों के प्रयोग से धरती के वृक्ष कटने से बचने लगे थे इसलिए पर्यावरणविदों ने इसे ‘ईको फ्रेंडली’ यानि पर्यावरण-मित्र माना था।
शीघ्र ही सिंगल यूज प्लास्टिक के चलन का दौर शुरू हो गया। उसके नकारात्मक प्रभाव की भयावहता से बड़ी जल्दी दुनिया कराह उठी। आज गृह उपयोगी वस्तुओं, रंग-बिरंगे कैरी बैग, कृषि, वाहन, परिवहन जैसे तमाम क्षेत्रें में प्लास्टिक का वर्चस्व है। दैनिक उपयोग के बर्तन, जल परिचालन, दवा की सीसी, दवा के पत्ते, फर्नीचर, पानी की टंकी, बिस्कुट, टॉफी के रैपर, नमकीन के पैकेट और गुटखे के पाउच, स्टिकर, होर्डिग्ज़ यानि जमीन से आसमान तक प्लास्टिक ही प्लास्टिक। यहां तक कि मनुष्य का जो कृत्रिम हृदय वैज्ञानिकों ने बनाया है, वह भी प्लास्टिक का है।
हमारी जल संचयन की संरचनाएं, तालाब, नाला और नदियां प्लास्टिक कचरे से भरी पड़ी हैं। सीवरेज लाइन से भी ढेरों प्लास्टिक कचरा नदियों में मिलता है और फिर उसके माध्यम से समुद्र में पहुंच जाता है। एक आकलन के अनुसार, प्रतिवर्ष करीब 12-7 मिलियन टन प्लास्टिक कचरा समुद्र में पहुंच रहा है और छोटे समुद्री जीवों के लिए खतरा बन रहा है। जलीय जीव नासमझी में प्लास्टिक की पत्तियों या पैकेजिंग मटेरियल को खाकर या इसमें फंसकर मर जाते हैं। प्रवाल भित्तियों और सबसे छोटे जीव प्लवक प्लास्टिक कचरे के कारण समाप्त हो रहे हैं।
प्लास्टिक आज मानवता के लिए बड़ा भस्मासुर बन चुका है। उपयोग के बाद या टूटने-फूटने पर इसे फैंक दिया जाता है, तो पर्यावरण के लिए इसकी विनाशलीला शुरू हो जाती है। जल, थल और वायु के बीच प्लास्टिक के अपघटन की प्रक्रिया अत्यंत धीमी होती है। पांच से दस साल बाद ही इसका अपक्षयन शुरू होता है और सौ साल तक जारी रहता है। इसमें क्लोरीन, कार्बन, हाइड्रोजन, नाइट्रोजन, सल्फर वगैरह के अणु होते हैं। अपघटन की क्रिया में यह सीधे वायु, जल और भूमि को प्रदूषित करते हैं। इसे जलाकर नष्ट करना तो और भी घातक है। इसमें मौजूद फास्जीन और फार्मेल्डीहाइड जैसे रसायन जलने की क्रिया में वायु मण्डल में एकीकृत होकर हमारे श्वसन तंत्र और त्वचा के लिए घातक बनते हैं। दहन की क्रिया में पॉलीमर से क्लोरो-फ्रलोरो कार्बन का उत्सर्जन होता है, जो वायु मण्डल की ओजोन परत को क्षतिग्रस्त करती है।
धरती पर पड़ी हुई प्लास्टिक की पन्नियां पानी के साथ बहकर जल निकासी को चोक कर देती है, जिससे बरसात में जलभराव की समस्या सामने आती है, जिसके कारण सड़कों, यहां तक कि कभी-कभी घरों में भी पानी भरने लगता है। जल भराव से आवागमन बाधित होने के साथ ही सामान्य जीवन की गतिविधियां भी प्रभावित होती हैं। जल भराव पेयजल को भी दूषित कर देता है और इससे जलजनित रोग फैलने लगते हैं। भूमि पर फैला प्लास्टिक कचरा पृथ्वी की जल शोषण की स्वाभाविक प्रक्रिया को बाधित कर देता है। यह भूतल की उर्वरा शक्ति को क्षीण करके धरती को बंजर बनाता है। प्लास्टिक के सूक्ष्म कण मृदा के साथ मिलकर खाद्य श्रृंखला को दूषित करते हैं।
यह खतरा हमारे सामने कब का आ चुका है। पिछले दशकों के बीच माइक्रो प्लास्टिक भोजन की राह से हमारे खून और मस्तिष्क तक पहुंच चुका है। हमारे शहरों के आसपास प्लास्टिक कचरों के पहाड़ खड़े हैं। इसके निपटान के लिए सरकार के स्तर पर भी प्रयास जारी है। कारखानों में प्लास्टिक अपशिष्ट को सुरक्षा के मानकों के अनुरूप वैकल्पिक ईंधन के रूप में उपयोग करके इसके निष्पादन का सिलसिला आरंभ हो चुका है। सड़क निर्माण और टाइल्स जैसी चीजों में भी प्लास्टिक का उपयोग होने लगा है। दूरवर्ती निर्जन स्थानों में गड्ढा खोदकर प्लास्टिक कचरे को दफनाने का विकल्प भी आजमाया जा रहा है।
सबसे अधिक दिक्कत 120 माइक्रोन से कम बारीक प्लास्टिक से है इसलिए देश में इसे सबसे पहले सन् 1999 में प्रतिबंधित किया गया था, तब से कई प्रयास हो चुके हैं।
1 जुलाई 2022 को 19 प्लास्टिक वस्तुओं पर प्रतिबंध लगाया गया है। इसमें मुख्यतया कप, प्लेट, गिलास, मिठाई के डिब्बों पर लपेटी जाने वाली पन्नी, झंडे, आइसक्रीम स्टिक, कंडी स्टिक आदि हैं। इसके साथ चिप्स, शैंपू, गुटखे के पाउच और पैकेट, पतली पन्नियाें पर भी रोक लगनी ही चाहिए क्योंकि इन्हें रीसाइक्लिंग के लिए एकत्र नहीं किया जा सकता है।
प्लास्टिक ने जिन परम्परागत संसाधनों दोना, पत्तल, मिट्टी के कुल्हड़, अखबार के ठोंगे, जूट के थैलों को चलन से……………………
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