— पर्यावरण लेख —
—- नमिता वैश्य —-
——- जाह्नवी जून 2026 अंक ——
—– पर्यावरण विशेषांक —–
पर्यावरण असंतुलन का प्रभाव मौसम पर सबसे ज्यादा पड़ रहा है। मौसम अपना रूप बदल रहा है। ग्लोबल वार्मिंग बढ़ रही है तो ग्लेशियरों के पिघलने से नई तरह की समस्याएं सामने आ रही हैं।
पर्यावरण हमारे चारों ओर का वह प्राकृतिक आवरण है जो हमें सरलता पूर्वक जीवन यापन करने में सहायक होता है। पर्यावरण ने हमें वायु, जल, खाद्य पदार्थ, अनुकूल वातावरण आदि उपहार स्वरूप भेंट दिये हैं। हम सभी ने हमेशा से ही पर्यावरण के इन संसाधनों का भरपूर प्रयोग किया है और आज इतना विकास कर पाने में पर्यावरण का एक प्रमुख योगदान रहा है। पृथ्वी पर जीवन बनाए रखने के लिए हमें पर्यावरण की वास्तविकता को बनाए रखना होगा। प्रत्येक वर्ष 5 जून को ‘विश्व पर्यावरण दिवस’ के रूप में लोगों में पर्यावरण स्वच्छता और सुरक्षा के प्रति वैश्विक स्तर पर जागरूकता लाने के लिए मनाया जाता है। इसकी शुरुआत 1972 में 5 जून से 16 जून तक संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा आयोजित विश्व पर्यावरण सम्मेलन से हुई। 5 जून 1973 को पहला विश्व पर्यावरण दिवस मनाया गया। पर्यावरण दिवस मनाने का मुख्य उद्देश्य दुनिया भर के लोगों में पर्यावरण के प्रति जागरूकता फैलाना है। लोगों को पर्यावरण प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन, ग्रीनहाउस गैसों के प्रभाव, ग्लोबल वार्मिंग, ब्लैक होल इफेक्ट आदि ज्वलंत मुद्दों और इनसे होने वाली विभिन्न समस्याओं के प्रति जागरूक करना है।
हमारे चारों ओर पृथ्वी पर फैली प्रत्येक वस्तु हमारे पर्यावरण का हिस्सा है। यह मूलतः जैविक और मौलिक तत्वों के पारस्परिक संबंध से बना है। पर्यावरण के मौलिक तत्वों में स्थान, भू-आकृतियां, जलाशय, जलवायु, जल-अपवाह, शैल, मृदा, खनिज संपत्ति आदि सम्मिलित हैं, जबकि जैविक तत्व में मानव, पशु-पक्षी एवं वनस्पतियां सम्मिलित हैं। मानव और पर्यावरण एक दूसरे पर निर्भर होते हैं। मानव की अच्छी आदतें जैसे वृक्षों को सहेजना, जलवायु प्रदूषण रोकना, स्वच्छता रखना तथा बुरी आदतें जैसे पानी को दूषित करना व व्यर्थ बर्बाद करना, वृक्षों की अत्यधिक मात्र में कटाई करना आदि पर्यावरण को प्रभावित करती है। हमारे यहां लोक पर्वों पर वृक्ष पूजन की परंपरा भी है। इसके बावजूद वनाच्छादित क्षेत्र में कमी ये इंगित करती है कि कहीं न कहीं हम उन दायित्वों से पीछे हटे हैं जो पर्यावरण संरक्षण के लिए आवश्यक है।
मानव ने हमेशा अपने विकास के लिए प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करने का प्रयास किया है। इसके लिए विश्व के सभी देश अपनी प्रगति के लिए प्रकृति के संसाधनों का दोहन कर रहे हैं। जिसका परिणाम है कि प्रदूषण का स्तर काफी तेजी से बढ़ता जा रहा है। हम अपनी सुविधाओं के लिए अधिकाधिक पेट्रोलियम पदार्थ का उपयोग करते हैं। घर को वातानुकूलित रखने के लिए ए-सी- का उपयोग करते हैं तथा साथ ही कारखानों से निकलने वाले जैविक पदार्थ जो सुविधा के अनुसार कहीं भी छोड़ दिए जाते हैं, प्रदूषण को बढ़ावा देने में अपना योगदान दे रहे हैं, जिससे पृथ्वी का तापमान लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में यदि इसे अभी भी कम न किया गया तो मानव सभ्यता को नष्ट होने में अधिक समय नहीं लगेगा। इस प्रदूषण का भयानक परिणाम यह हो सकता है कि इस पृथ्वी पर जीवन की परिकल्पना करना भी असंभव हो जाएगा।
पर्यावरण असंतुलन एक वैश्विक समस्या के रूप में सामने आ रहा है जिसका प्रभाव मौसम पर सबसे ज्यादा पड़ रहा है। मौसम अपना रूप बदल रहा है। ग्लोबल वार्मिंग बढ़ रही है तो ग्लेशियरों के पिघलने से नई तरह की समस्याएं सामने आ रही हैं। पर्यावरण असंतुलन के कारण ही ओजोन परत के क्षीण होने तथा उसमे छेद होने की समस्या भी सामने आई है। यदि यह परत नष्ट हो जाए या कमजोर पड़ जाए तो पराबैंगनी किरणें पृथ्वी की सतह तक पहुंचती है, जो न सिर्फ जीव-जंतुओं के लिए अपितु वनस्पतियों के लिए भी हानिकारक होती है। ओजोन परत क्षरण के लिए भी मानवीय गतिविधियां ही जिम्मेदार हैं। पर्यावरण असंतुलन की वजह से जलवायु परिवर्तन की शुरुआत हो चुकी है।
मौसम का चक्र प्रभावित हो रहा है, बेमौसम की बरसात तथा अधिक बर्फबारी इसी का परिणाम है। ठंडे स्थान और अधिक ठंडे हो रहे हैं जबकि गर्म स्थान और गर्म होते जा रहे हैं। बिगड़ता पर्यावरण कुछ और घातक परिणाम भी दे रहा है। जीवों तथा पौधों की अनेक प्रजातियां जहां विलुप्त हो चुकी हैं, वहीं कुछ विलोपन के मुहाने पर हैं।
जैव विविधता पर प्रतिकूल प्रभाव साफ दिख रहा है। चिकित्सा विज्ञान में प्रगति के बावजूद जानलेवा बीमारियां बढ़ रही हैं। संपूर्ण परिस्थितिकी तंत्र असंतुलन का शिकार हो गया है। जलवायु परिवर्तन से कृषि भी प्रतिकूल रूप से प्रभावित होती है। तापमान की वृद्धि के कारण पौधों में नमी का अभाव हो जाता है जिस कारण से वे नष्ट होने लगते हैं। कृषि पैदावार में कमी से खाद्यान्न संकट बढ़ा है।
शास्त्रें में कहा गया है कि प्रकृति का कोप सारे कोपों से बढ़कर होता है। यदि हमने इस सूत्र वाक्य पर ध्यान दिया होता तो शायद प्रकृति इस तरह कुपित न होती। प्रकृति और पर्यावरण के प्रति अगर हम अपने दायित्वों की अनदेखी इसी तरह करते रहे तो हमें इसके दुष्परिणामों को झेलने के लिए भी तैयार रहना चाहिए या समय रहते अपने आचरण में बदलाव लाकर पर्यावरण से मैत्रीपूर्ण संबंध बनाकर विकास के पद पर आगे बढ़ना चाहिए। यदि अभी भी हम पर्यावरण संतुलन एवं संरक्षण की दिशा में ध्यान देना शुरू कर दें तो भावी विनाश से बच सकते हैं।
हमें सबसे पहले ग्लोबल वार्मिंग को रोकने के प्रयास करने होंगे, इसके लिए ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करना होगा तथा प्रकृति के विनाश से बचाव के लिए अपने दायित्वों को निभाना होगा। इस दिशा में कारगर पहल तथा वृक्षारोपण को बढ़ाया जाना होगा।
ऐसी तकनीकों का विकास करना होगा जिससे कार्बन का उत्सर्जन कम हो। बायोगैस और सौर ऊर्जा के इस्तेमाल को भी बढ़ावा देकर इस समस्या से निपटा जा सकता है। पर्यावरण की समस्या से निपटने के लिए हमारा यह दायित्व बनता है कि हम वह आचरण किसी भी कीमत पर न करें, जिससे पर्यावरण का क्षरण या क्षति हो।
इसके लिए हमें अपनी जीवन शैली में बदलाव लाना होगा। विलासिता और भोगवादी अभिवृत्तियों पर अंकुश लगाना होगा। भौतिक संसाधनों का धड़ल्ले से प्रयोग रोककर हम काफी हद तक पर्यावरण संतुलन में सहायक बन सकते हैं। कम से कम प्राकृतिक संसाधनों का दोहन किया जाए, यदि बहुत आवश्यक हो तो पर्यावरण को होने वाली क्षति की भरपाई की जाए। हमें प्रकृति की ओर लौटकर ही अपना बचाव करना होगा। कुछ छोटे-छोटे प्रयास कर हम पर्यावरण को बचा सकते हैं।
पर्यावरण संरक्षण के
कुछ उपाय
= वर्षा जल संचयन प्रणाली का उपयोग किया जाना चाहिए।
= अपने आसपास के वातावरण को स्वच्छ रखें।
= वायुमंडल में कार्बन की मात्र को कम करने के लिए सौर ऊर्जा का अधिक से अधिक प्रयोग करें।
= प्लास्टिक का उपयोग बिल्कुल न करें।
= आने-जाने के लिए बाइक, स्कूटर या कार का इस्तेमाल करने की बजाय हम साइकिल का प्रयोग करें।
= सार्वजनिक परिवहन के साधनों का प्रयोग करें।
= जैविक खाद का उपयोग किया जाना चाहिए।
= पॉलिथीन की जगह जूट या कपड़े से बने बैग का प्रयोग करें।
= यूज एंड थ्रो की प्रक्रिया को छोड़कर उन पदार्थों का प्रयोग करें जो रिसाईकल हो सकते हैं।
= जल का संतुलित प्रयोग करें तथा व्यर्थ बर्बाद न करें
= बिजली से चलने वाले संसाधनों का कम से कम प्रयोग करें तथा इन उपकरणों को बंद रखकर भी पर्यावरण की क्षति कम की जा सकती है।
= जहां भी संभव हो पेड़ पौधे लगाएं और उनका संरक्षण करें।
इन छोटे-छोटे उपायों को अपनाने के साथ ही वृक्षारोपण पर अधिकाधिक ध्यान दें तथा इसके लिए लोगों को प्रेरित भी करें। वनों व वृक्षों की कटान का पुरजोर विरोध करें। वृक्षों को अपनी संतान की तरह प्यार और परवरिश देकर हमें अपने देश में वृक्ष क्रांति लानी होगी।
यदि हर व्यक्ति जीवन में मात्र एक पेड़ लगाने और अपने जीवनकाल में उसकी देखभाल का संकल्प ले तो …………..इस लेख को पूरा पढ़ने के लिए जाह्नवी का जून 2026 अंक देखें
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