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जीवन की महक


लेख
संदीप पांडे ‘शिष्य’
जाह्नवी जून 2026 अंक
पर्यावरण विशेषांक


जीवन में विरोध, आलोचना और कठिनाइयां हर किसी के लिए हैं,
जो बिना तैयारी के है, वह बुझ जाता है। और जो भीतर से मजबूत है, वही विपरीत परिस्थितियों में दूसरों के लिए प्रकाश बनता है।


हमारा यह जीवन बहुआयामी है। यह महज सुख भोग और सुविधा तक सीमित नहीं है। इस जीवन में मेहनत, संघर्ष और प्रतीक्षा का भी अपना ही सौंदर्य है। जीवन के उन रास्तों की तेज चुनौती तब इतनी भी कठिन नहीं रहती, जब आगे कोई सुंदर सफलता आपके इंतजार में हो। और फिर इतिहास गवाह है कि सतत मेहनत करने वाले पर तो सफलता भी कई रूपों में बरसती है। कभी सुख और सुकून वाली हवा बन कर, कभी संतुष्टि वाली बूंदों के रूप में और कभी उस रूप में भी जिसे आत्मविश्वास और आत्मज्ञान कहते हैं। यानि जीवन की परीक्षा का जो भी परिणाम हो उसको लेकर एक सटीक नजरिया सहज ही विकसित हो जाता है।
इसलिए तो कहते हैं कि हम सभी को धीरज तथा संयम के साथ अपने प्रयास करते हुए जीवन के सभी सबक गहराई से पढ़ने चाहिए।
एक बार एक युवक ने आइंस्टीन से कहा, ‘‘लोग आपको महान कहते हैं और आपकी पूरी दुनिया में प्रसिद्धि है। कृपा कर बताइए सफल बनने का मंत्र क्या है?’’ आइंस्टीन ने संक्षेप में कहा, ‘‘लगन’’।
युुवक ने पूछा, ‘‘कैसे?’’ आइंस्टीन मुस्कुराए और बोले, ‘‘गणित से मुझे बहुत भय लगता था। मैं अक्सर इस विषय में अनुत्तीर्ण हो जाता था और सहपाठी मेरा उपहास करते थे। एक दिन मैंने आत्ममंथन किया और लगन के साथ गणित के सवाल हल करने शुरू किए। धीरे-धीरे सभी सवाल सरल होने लगे और मेरा डर दूर हो गया। लगन का ही परिणाम है कि मेरे सिद्धांत आज भी दुनिया में उपयोग हो रहे हैं और विज्ञान के क्षेत्र में मैंने सफलता प्राप्त की, इसलिए लगन ही सफलता का सबसे बड़ा मंत्र है।’’
एक बार अपने जीवन से जद्दोजहद में परेशान एक युवक एक आश्रम पहुंचा। वह बोला-‘‘मैं बहुत कोशिश करता हूं, पर लोग मुझे पहचानते नहीं।’’ वृद्ध साधु उसे एक पेड़ के नीचे ले गए और जमीन पर गिरे बीज की ओर इशारा किया। बोले-‘‘यह बीज अभी दिखता नहीं, पर क्या इसलिए यह व्यर्थ है?’’ फिर साधु बोले-‘‘जो सच में बढ़ता है, वह पहले भीतर जड़ें फैलाता है। शोर ऊपर होता है, शक्ति नीचे।’’ युवक को बोध हुआ कि उसकी चिंता पहचान की नहीं, तैयारी की होनी चाहिए। साधु ने अंत में कहा-‘‘समय से पहले निकली टहनी टूट जाती है और धैर्य से पली जड़ें तूफान में भी खड़ी रहती हैं। यही कारण है कि प्रकृति कभी जल्दी नहीं करती, फिर भी सब कुछ समय पर हो जाता है।’’
जीवन सभी को कुछ न कुछ देता है। बस देखने की नजर साफ होनी चाहिए। अतः सबसे जरूरी है कि हम पहले मानवीय गुणों को आत्मसात करें। फिर, अपने समाज को देखें।
एक बार प्रसिद्ध दार्शनिक और लेखक मॉन्तेन अपने बगीचे में टहल रहे थे। उन्होंने देखा एक छोटा सा नौकर बहुत घबराकर भाग रहा है। पूछने पर पता चला कि उसने गलती से एक कांच का प्याला तोड़ दिया था और उसे डर था कि मालिक डांटेंगे। मॉन्तेन ने उसे पास बुलाया और बोलेे, ‘‘डर क्यों रहे हो?’’ लड़के ने कहा, ‘‘मैंने गलती कर दी सजा मिलेगी।’’ मॉन्तेन मुस्कुराए और बोले, ‘‘अगर हर गलती पर हम लोगों को इतना डराएं कि वे सच छुपाने लगें, तो गलती से बड़ी सच्चाई की हत्या हो जाएगी। मुझे प्याला नहीं चाहिए, मुझे यह चाहिए कि तुम सच्चाई बोलने में सुरक्षित महसूस करो।’’ उन्होंने नौकर को दंड नहीं दिया बल्कि बाकी लोगों से कहा, ‘‘जहां सच बोलने पर सजा मिलती है, वहां झूठ पनपता है। धीरे-धीरे पूरे घर में यह आदत बन गई कि जब भी कोई गलती हो, लोग खुलकर बताते और उसी से सबक सीखते। इससे एक सकारात्मक वातावरण तैयार होने लगा।
किसी दार्शनिक ने कहा है कि जीवन की एक धुन और एक लय हम सभी को हमारे सत्य की तरफ ले जा रही है। महान योद्धा नेपोलियन ने इस धुन पर संतुलन साधा। नेपोलियन बोनापार्ट अपने विजय अभियानों के दौरान जीते हुए राज्यों को, विजित राजाओं से उनके वफादार रहने का आश्वासन प्राप्त करने के बाद उन्हें पुनः लौटाया करता था। एक बार, ऐसे ही एक हारे हुए राजा को नेपोलियन ने उसका राज्य वापस दे दिया, लेकिन वह शत्रुओं से जा मिला और नेपोलियन के खिलाफ विद्रोह कर दिया। नेपोलियन ने क्रोधित होकर उसकी राजधानी पर आक्रमण कर दिया। नेपोलियन की विशाल सेना से भयभीत होकर राजा अपने परिवार के साथ जंगलों में भाग गया, लेकिन जल्दबाजी में एक बीमार राजकुमार महल में ही छूट गया। नेपोलियन ने राजमहल को तोप से उड़ाने का आदेश दिया। तोपों की गरज के बीच, बीमार राजकुमार इधर-उधर दौड़ने लगा। किसी तरह सिपाहियों ने यह सूचना नेपोलियन तक पहुंचाई। यह सुनते ही नेपोलियन ने तुरंत गोलाबारी रुकवा दी। तोपे शांत होते ही सेनापति नेपोलियन के पास आया और बोला, ‘‘यह आपने क्या किया? सारे सैनिकों का उत्साह भंग हो गया है और सैनिकों के नियमों का भी उल्लंघन हुआ है।’’ यह सुनकर नेपोलियन ने उत्तर दिया, ‘‘मेरे भाई, मैं मानता हूं कि सैनिकों के नियमों का उल्लंघन हुआ है, लेकिन साथ ही मानवता का अपमान भी हुआ होता, और यह हम वीरों को शोभा नहीं देता।’’ नेपोलियन का यह निर्णय आज भी इतिहास में अमर हुआ। इससे उसका पराक्रम कम नहीं हुआ, बढ़कर सौ गुना हुआ। कितनी ही बार लोग असंतोष के जाल में घिर जाते हैं। अपने हालात के बारे में नकारात्मक सोच कर मन को मलिन करते हैं। उनको जरा तसल्ली सीखनी चाहिए।
एक बार इसी संदर्भ में गुरु सत्येन्द्रनाथ अपने शिष्यों को यह बता रहे थे कि जीवन में तीन चीजें बहुत उलझी हुई होती हैं-दिल, दिमाग और किस्मत। दिल कुछ चाहता है, फिर दिमाग उसे पाने के लिए रास्ता तलाश करता है, लेकिन अंत में वही होता है जो तकदीर में लिखा होता है। सुबोध नामक एक युवक को यह बात समझ नहीं आ रही थी। गुरु जी उसे एक बगीचे में लेकर गए। वहां एक बंदर जामुन के पेड़ पर चढ़ाई करना चाहता था, लेकिन बागवान का मोटा डंडा उसे कुछ भी नहीं करने दे रहा था। बंदर ने एक दो बार प्रयास किया, लेकिन वह असफल रहा। भूख बढ़ती जा रही थी। तभी, उस बगीचे में एक बुजुर्ग केले का गुच्छा लेकर आए और वह गुच्छा बंदर के सामने रख दिया। बंदर की खुशी का पारावार न था। उसने खुशी-खुशी हाथ आगे बढ़ाकर केले छीलने शुरू किए और गर्दन हिलाते हुए वह केले खाता रहा। यह दृश्य देखकर सुबोध ने गुरु जी की बात को समझा और स्वीकार किया कि जीवन में जो होता है, वह तकदीर ही तय करती है।
गौतम बुद्ध ने एक उपयोगी सीख सारी मानवता को दी है। वह है स्थिरता की, मौन की, जरा ठहराव की, चंचलता से परे जरा सब्र की। एक प्रतिभाशाली शिष्य था। लेकिन उसके मन में स्थिरता नहीं थी। मन हमेशा असंतुष्ट रहता था। एक दिन उसने बुद्ध से कहा-‘‘गुरुदेव, ज्ञान तो बहुत है, फिर भी भीतर खालीपन क्यों है?’’ बुद्ध उसे आश्रम के पीछे ले गए। वहां पानी से भरा एक घड़ा रखा था, लेकिन नीचे से वह धीरे-धीरे रिस रहा था। बुद्ध ने पूछा-‘‘क्या यह घड़ा भरा है?’’ शिष्य बोला-‘‘अभी तो हां, पर थोड़ी देर में खाली हो जाएगा।’’ बुद्ध बोले-‘‘यही तुम्हारी स्थिति है।’’ उन्होंने कहा-‘‘तुम ज्ञान इकट्ठा करते हो, लेकिन अनुशासन नहीं रखते। विचार रखते हो, पर आचरण में नहीं उतारते। जिस जीवन में संकल्प का आधार नहीं, वह ज्ञान से भरा होकर भी अंदर से खाली रहता है। बुद्ध ने घड़े का छेद बंद किया। कुछ देर बाद घड़े का पानी स्थिर हो गया। बुद्ध बोले-‘‘ज्ञान तभी शक्ति बनता है जब वह चरित्र में ठहरता है। अन्यथा वह सिर्फ बोझ बन जाता है।’’ उस क्षण शिष्य को समझ आया-समस्या ज्ञान की कमी की नहीं थी, समस्या स्थिरता की कमी की थी। हम सभी पंचतत्व के पुतले हैं। कुदरत ने सभी को कोई न कोई खूबी दी ही है। हमें एकाग्रचित होकर इसका चिंतन करते रहना चाहिए।
एक मंदिर में रोज शाम एक छोटा सा दीपक जलाया जाता था। मंदिर ऊंचाई पर था, इसलिए वहां हवा हमेशा तेज चलती थी। एक दिन आंधी आ गई। लोगों ने कहा-‘‘आज दीपक मत जलाइए, हवा बहुत प्रचंड है।’’ लेकिन पुजारी ने दीपक जलाया और उसे एक कांच की छोटी लालटेन में रख दिया। हवा चली और तेज चली, लेकिन दीपक बुझा नहीं। रात में दूर-दूर से आने वाले यात्रियों ने उसी छोटे दीपक की रोशनी देखकर मंदिर का रास्ता पाया। अगली सुबह पुजारी ने कहा-‘‘समस्या हवा नहीं थी, समस्या तैयारी की कमी थी। जब दीपक को सही आवरण मिला, तो वही हवा उसकी रोशनी को दूर तक फैलाने लगी।’’ जीवन में विरोध, आलोचना और कठिनाइयां हवा की तरह हैं-वे हर किसी के लिए चलती हैं, जो बिना तैयारी के हैं, वे बुझ जाते हैं और जो भीतर से मजबूत हैं, वही विपरीत परिस्थितियों में दूसरों के लिए प्रकाश बनते हैं। बल बाहर से नहीं, भीतर की स्थिरता से आता है।
एक युवक बगीचे के बागबान से प्रतिदिन कुछ फूल लेकर मंदिर में अर्पित करता था। एक दिन माली ने पूछा, ‘‘बेटे जानते हो यह फूल एक मौन संवाद है।’’ ‘‘अच्छा! मगर कैसे?’’ युवक ने जानना चाहा। बेटे यह फूल हमको मौन भाषा में यह बताता है कि हमको अगर देवता के समीप जाना है तो अपना मन सुगन्धित करना होगा। फूल जैसी कोमलता और क्षणभंगुरता को सहज स्वीकार करना होगा। खिलना केवल औरों के लिए मगर शालीन बने रहना हमको फूल ही सिखाते हैं। इस तरह हंसकर जीना और देवत्व पर अर्पित हो जाना सीख लिया तो………………………………इस लेख को पूरा पढ़ने के लिए जाह्नवी का जून 2026 अंक देखें

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