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बदलता समाज और संस्कारों की आवश्यकता


लेख
दीपक कुमार
जाह्नवी जून 2026 अंक
पर्यावरण विशेषांक

आज हर माता-पिता चाहते हैं कि बच्चे ऊंचे पद प्राप्त करें और आर्थिक
रूप से मजबूत बनें। लेकिन इसी दौड़ में कहीं न कहीं एक
महत्वपूर्ण चीज भूलते जा रहे हैं ‘संस्कार’

पिछले कुछ वर्षों में समाज के भीतर एक बड़ा परिवर्तन देखने को मिल रहा है। यह परिवर्तन केवल जीवनशैली, शिक्षा या आर्थिक स्थिति तक सीमित नहीं है, बल्कि परिवार, रिश्तों और सामाजिक मूल्यों को भी प्रभावित कर रहा है। इसी परिवर्तन का एक प्रभाव स्कूलों में बच्चों के घटते एडमिशन के रूप में भी दिखाई दे रहा है।
वर्ष 2021 से 2022 के बीच स्कूल एडमिशन में लगभग 6 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई। इसके बाद 2022 से 2023 में लगभग 7-5 प्रतिशत की गिरावट हुई। वहीं 2023 से 2024 और 2024 से 2025 के बीच भी लगभग 5 प्रतिशत तक एडमिशन कम हुए। यह केवल आंकड़े नहीं हैं, बल्कि समाज में बदलती सोच और जीवनशैली का संकेत है। आज के समय में एक नया टेªंड तेजी से बढ़ रहा है। जिसे DINK (Double Income No Kid) कहा जाता है। इसका अर्थ है पति और पत्नी दोनों कमाते हैं, लेकिन बच्चे नहीं चाहते या बहुत देर से परिवार शुरू करना चाहते हैं। आधुनिक जीवनशैली, कैरियर, आर्थिक स्वतंत्रता और व्यक्तिगत आराम को प्राथमिकता देने के कारण यह सोच समाज में तेजी से बढ़ रही है।
इसके अलावा भी कई कारण हैं जो बच्चों के एडमिशन में कमी के लिए जिम्मेदार माने जा सकते हैं। जैसे-
= शहरी क्षेत्रें में जन्म दर में कमी।
= बच्चों की शिक्षा और पालन पोषण का बढ़ता खर्च।
= देर से विवाह और परिवार नियोजन।
= नौकरी के कारण बड़े शहरों और विदेशों में पलायन।
= छोटे परिवार की सोच।
= कैरियर और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को अधिक महत्व देना आदि।
भूलते जा रहे हैं ‘संस्कार’
आज हर माता-पिता अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देना चाहते हैं। यह समाज के लिए एक सकारात्मक परिवर्तन है कि अब बेटियों को भी उच्च शिक्षा और आत्मनिर्भरता के लिए प्रेरित किया जा रहा है। माता-पिता चाहते हैं कि उनके बच्चे डॉक्टर, इंजीनियर, अधिकारी या बड़े व्यवसायी बनें। वे चाहते हैं कि बच्चे विदेश में जाएं, ऊंचे पद प्राप्त करें और आर्थिक रूप से मजबूत बनें। लेकिन इसी दौड़ में कहीं न कहीं हम एक महत्वपूर्ण चीज भूलते जा रहे हैं ‘संस्कार’।
आज आवश्यकता केवल शिक्षा देने की नहीं है, बल्कि बच्चों के अंदर अच्छे संस्कार भरने की भी है। यदि हम अपने बच्चों को केवल यह सिखाएंगे कि ‘खूब पढ़ो, पैसा कमाओ, विदेश जाओ, बड़े शहरों में बस जाओ’ और उसी बात पर गर्व करते रहेंगे कि हमारा बच्चा विदेश में है, बहुत आगे बढ़ रहा है, तो आने वाला समय समाज और परिवार दोनों के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है। शिक्षा जीवन को सफल बनाती है, लेकिन संस्कार जीवन को सार्थक बनाते हैं। यदि बच्चों को केवल कैरियर, पैसा और व्यक्तिगत सफलता का महत्व बताया जाएगा, परिवार, रिश्तों, माता-पिता के सम्मान और जिम्मेदारी का महत्व नहीं सिखाया जाएगा, तो भविष्य में परिवार कमजोर होते चले जाएंगे।
आज की पीढ़ी धीरे-धीरे परिवार से दूर होती जा रही?
आज की पीढ़ी शिक्षित और आत्मनिर्भर तो बन रही है, लेकिन धीरे-धीरे परिवार से दूर होती जा रही है। कई युवा अकेले रहना, देर रात पार्टी करना और स्वतंत्र जीवन जीना ही उनकी स्वतंत्रता का प्रतीक है। परन्तु हमें यह भी याद रखना चाहिए कि हमारे माता-पिता ने अपने माता-पिता अर्थात हमारे दादा-दादी और नाना-नानी की सेवा की, उनका सहारा बने और बुढ़ापे में उनकी देखभाल की। उन्होंने कठिन परिस्थितियों में भी परिवार को जोड़े रखा। संयुक्त परिवारों में अपनापन, जिम्मेदारी और भावनात्मक जुड़ाव था। हमें विश्वास है कि हम भी अपने माता-पिता की सेवा करने का प्रयास करेंगे, लेकिन यह चिंता लगातार बढ़ रही है कि आने वाली पीढ़ियां शायद ऐसा न कर पाएं। इसका सबसे बड़ा कारण यही है कि हम अपने बच्चों को संस्कार देने में पीछे होते जा रहे हैं। हम उन्हें केवल यही सिखा रहे हैं कि अच्छी पढ़ाई करो, नौकरी करो, बड़े शहरों या विदेशों में जाकर बस जाओ। यदि समय रहते हमने अपने भीतर बदलाव नहीं किया, तो वह दिन दूर नहीं जब बच्चे भावनात्मक रूप से परिवार से दूर हो जाएंगे। आने वाले समय में अकेलापन, टूटते रिश्ते और वृद्धाश्रम जैसी परिस्थितियां सामान्य होती चली जाएंगी। इस स्थिति को बदलने के लिए समाज और परिवार दोनों को मिलकर प्रयास करना होगा।
एक उदाहरण खालीपन का
मैं यहां अपने जीवन का एक वास्तविक उदाहरण साझा करना चाहता हूं। मेरे दो बहुत अच्छे मित्र हैं। पति और पत्नी दोनों एक सरकारी बैंक में उच्च पद पर कार्यरत हैं। वर्तमान में दोनों AGM (Assistant General Manager) के पद पर हैं। दोनों शिक्षित, सफल और आर्थिक रूप से बहुत मजबूत हैं। कुछ समय पहले तक वे मुंबई में कार्यरत थे, लेकिन अब उनका ट्रांसफर दूसरे शहर में हो गया है। वे कई बार मेरे घर आए। जब भी वे मेरे घर आते, तो अक्सर एक बात कहते, ‘‘हमारा घर होटल जैसा लगता है, लेकिन आपका घर सच में घर लगता है।’
एक दिन मैंने उनसे पूछा कि ‘‘आखिर ऐसा क्यों कहते हैं? आपका तो बहुत सुंदर 4BHK घर है, आधुनिक सुविधाओं से भरा हुआ? शानदार इंटीरियर, डिजाइन कमरे, ऊंचा पद और अच्छा जीवन स्तर। फिर भी आपको अपना घर ‘होटल’ क्यों लगता है?’’
तब उन्होंने हल्की उदासी के साथ कहा, ‘‘हमारे घर में बच्चों की आवाज नहीं है। न दीवारों पर बच्चों की पेंटिंग है, न कोई खिलौने बिखरे हैं, न कोई शोर, न कोई उछल कूद। सब कुछ व्यवस्थित हैं, शांत है, लेकिन उस शांति में खालीपन है। लेकिन आपके घर में जैसे ही कदम रखते हैं, वह घर महसूस होता है। बच्चे खेलते हैं, कभी दीवारों पर रंग कर देते हैं, कभी आवाज करते हैं, कभी शरारत करते हैं, लेकिन वही घर की असली खुशी है। उनकी हर बात दिल को छू गई। उस दिन मैंने महसूस किया कि जीवन में केवल कैरियर और पैसा ही सब कुछ नहीं होता। एक परिवार का होना, बच्चों की हंसी, रिश्तों की गर्माहट और साथ बैठकर खुशियां बांटना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यह बदलाव हमें अपने भीतर लाना होगा। और यह बदलाव तभी संभव है जब हम अपने बच्चों को केवल पढ़ाई ही नहीं, बल्कि बड़ों का सम्मान, परिवार का महत्व और जिम्मेदारी भी सिखाएं।
माता-पिता और बच्चों के बीच संवाद और भावनात्मक जुड़ाव मजबूत होना चाहिए। बच्चों को यह समझाना आवश्यक है कि माता-पिता की सेवा केवल कर्तव्य नहीं बल्कि संस्कार है। आधुनिकता और संस्कार में संतुलन रखें। कैरियर और स्वतंत्रता जरूरी है, लेकिन परिवार और रिश्तों का महत्व भी उतना ही आवश्यक है। संयुक्त परिवार की भावना बनाए रखें, चाहे परिवार अलग-अलग शहरों में रहे, लेकिन रिश्तों में अपनापन और जिम्मेदारी बनी रहनी चाहिए। बच्चों को मानवीय मूल्य सिखाएं। दया, सहयोग, त्याग और परिवार के प्रति समर्पण जैसे गुण ही समाज को मजबूत बनाते हैं।
अंततः एक मजबूत समाज केवल शिक्षित लोगों से नहीं बनता, बल्कि संस्कारी और जिम्मेदार लोगों से बनता है। शिक्षा और संस्कार दोनों का संतुलन ही आने वाली पीढ़ियों को सही दिशा दे सकता है। यदि आज हम अपने बच्चों को ……………………...इस लेख को पूरा पढ़ने के लिए जाह्नवी का जून 2026 अंक देखें

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