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चार कन्धों की कीमत


लघु कथा
उमेश कुमार सक्सेना
जाह्नवी जून 2026 अंक
पर्यावरण विशेषांक

शिवदयाल जी-एक शासकीय प्रशासनिक अधिकारी, जो अपने सेवाकाल में सैकड़ों अधीनस्थ कर्मचारियों और अधिकारियों पर रौब झाड़ने के लिए जाने जाते थे। रिटायरमेंट के बाद उन्होंने एक बड़े शहर के आलीशान अपार्टमेंट में फ्रलैट लिया।
घर में दो जवान बेटियां-आशा और तृषा और एक बूढ़े बीमार पिता थे। पत्नी तो वर्षों पहले ही साथ छोड़ चुकी थी।
अब उनका जीवन सीमित हो गया था-बस बेटियाँ और बूढ़े पिता तक। हर शाम जब वे अपार्टमेंट के पास टहलने जाते तो मन ही मन उम्मीद करते-कि लोग मुझे पहचानें, अभिवादन करें आखिर मैं कोई साधारण आदमी नहीं हूं।
लेकिन जमाना बदल चुका था। अब कोई किसी को यूं ही झुककर सलाम नहीं करता था। अड़ोसी-पड़ोसी तो उन्हें देखकर रास्ता तक बदल लेते।
न कोई नमस्ते——न कोई बातचीत
रिश्तेदार भी उनके व्यवहार के कारण दूर हो चुके थे। और फिर एक रात वह हुआ, जिसने उनकी पूरी दुनिया हिला दी। उनके बूढ़े पिता चल बसे।
आशा व तृषा रो-रोकर बेहाल थीं।
शिवदयाल जी ने एक-एक कर सभी रिश्तेदारों और जान-पहचान वालों को फोन लगाया-पर किसी ने फोन उठाया तक नहीं। किसी ने संवेदना जताने तक की जरूरत नहीं समझी। अब सबसे बड़ी समस्या सामने थी।
चार कंधे भी नसीब नहीं हो रहे थे, सुबह होने पर आशा ने हिम्मत जुटाई और पड़ोसी के दरवाजे पर गई।
‘‘अंकल–आज रात को मेरे बाबा–’’
वह अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाई थी कि पड़ोसी बोल पड़ा-‘‘मैं लेट हो रहा है, शाम को बात करते हैं—’’
और दरवाजा बंद कर लिया।
आशा दूसरे पड़ोसी के पास गई-
‘‘अंकल प्लीज—————’’
उन्होंने बिना सुने ही कहा-‘‘मुझे डाक्टर के पास जाना है, अभी वक्त नहीं है—’’ और चले गए।
एक-एक कर कई दरवाजे खटखटाए गए, पर हर जगह से निराशा ही मिली। एक सज्जन ने तो साफ कह दिया-‘‘मैं आपको जानता तक नहीं हूं’’ आशा ने खिड़की से देखा-एक अंकल स्कूटर स्टार्ट कर रहे थे। वह पापा के पास भागकर गई और बोली, ‘‘पापा, उनसे कहिए—’’
लेकिन शिवदयाल जी कुछ कहते, उससे पहले ही वह अंकल स्कूटर पर बैठकर चले गए।
अब घर में सिर्फ सन्नाटा था—और उस सन्नाटे में गूंजती सिसकियां। शिवदयाल जी ने अपने पिता के चेहरे को देखा और पहली बार उनके भीतर कुछ टूट गया।
‘‘मैंने क्या खो दिया——–’’ उनकी आवाज कांप रही थी। उन्हें याद आने लगा—–कैसे उन्होंने लोगों को अपमानित किया। कैसे कभी किसी से अपनापन नहीं रखा।
आज वही दुनिया उन्हें आईना दिखा रही थी। तभी दरवाजे पर हल्की दस्तक हुई। अपार्टमेंट का सिक्योरिटी गार्ड खड़ा था। ‘‘साहब—–सुना आपके पिताजी—’’ वह रूक गया—-‘‘अगर आप अनुमति दें—–तो मैं मदद कर सकता हूं।’’ उसने अपने दो साथियों को बुलाया। बिना किसी पहचान, बिना किसी स्वार्थ के उन्हाेंने पूरे सम्मान के साथ अंतिम यात्र की तैयारी की। जब अर्थी उठी तो चार कंधों में तीन गार्ड और चौथे खुद शिवदयाल जी थे।
अर्थी उठाते समय उनकी आंखों से आंसू रुक नहीं रहे थे-क्योंकि उन्हें समझ आ गया था-‘‘पद से नहीं—–व्यवहार से रिश्ते बनते हैं—–’’ श्मशान की आग में सिर्फ एक शरीर नहीं जला——बल्कि उनका घमंड भी राख हो गया।
वापस लौटते समय उन्होंने गार्ड का हाथ पकड़ लिया-‘‘आज तुमने वह किया—जो अपने भी नहीं कर पाए’’ गार्ड मुस्कुराया-‘‘साहब—इंसान को इंसान बनकर ही जीना चाहिए।’’
अगले दिन शिवदयाल खुद पड़ोसियों के दरवाजे पर गए। इस बार उनके चेहरे पर रौब नहीं नम्रता थी। ‘‘मुझे माफ कर दीजिए। मैंने कभी किसी से अच्छा व्यवहार नहीं किया।’’ धीरे-धीरे लोग…………………………….

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