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सास और बहू

कहानी
नीलम गोयल

नवम्बर, 2025 अंक

सास और बहू की नोकझोंक तो जगत प्रसिद्ध है परन्तु यह कहानी एक ऐसी सास बहू की है जो आपस में बहुत प्यार करती थी परन्तु फिर भी रोती रहती थी दोनों ही। सास को बहू का नये ढंग के जीन्स पैन्ट, आधुनिक कपड़े पहनने पसंद नहीं थे। न ही उससे बहू का मोबाइल देखना, सहेलियों को बुलाना, उनके घर जाना, ऐसी हजार बातें जो उसने अपने जमाने में नहीं की थी, बिल्कुल पसंद नहीं थी। आजकल के खाने भी सास को नहीं भाते थे।
अतः बात-बात पर वह बहू को टोक देती थी और बहू रोने लगती थी।
एक दिन बहू का खाना खाने का बिल्कुल मन नहीं था। उसने नूडल्स बनाए सोचा अपना मनपसंद सीरियल ‘पृथ्वी राज चौहान’ आयेगा तो बैठ कर खाऊंगी। बस सासू मां ने देख लिया। हो गया भाषण शुरू। बहू ने कहा-मां कभी-कभी खाने से कुछ नहीं होता। पर भाषण तो शुरू था, ‘‘कभी-कभी से आदत पड़ जाती है। शराबी भी तो एक बार पीता, फिर शराबी बन जाता है। मुझसे कहती मैं एक और सब्जी बना देती। अभी मेरे जीते जी यह हाल है तो मरने के बाद तो घर में यह ही चीजें बनेगी।’’ अपनी सास की तरह इस सास को भी बड़बड़ाने की ज्यादा आदत थी।
बहू अपने कमरे में आई और सोचने लगी-कहने को तो यह घर मेरा है। परन्तु मैं अपने मन से कुछ बना-खा नहीं सकती। जरा सी बात मरने तक पहुंच गई। उसे जवाब देना आता नहीं था, बस उसे रोना आ गया। उसने खाना भी उठाकर रख दिया। उसका मन सीरियल देखने का भी नहीं हुआ। लेटे-लेटे वह सो गई।
सास ने थोड़ी देर में देखा नूडल्स ऐसे ही रखे हैं। तो उसे भी रोना आ गया। ऐसी प्यारी बहू जो मेरे बेटे को कुछ बताती नहीं, न ही कभी पलट कर जवाब देती है, पराई लड़की भूखी सो रही है। उसके अपनी कोई लड़की नहीं थी, बहू में ही बेटी का रूप देखती थी। रह-रह कर अपने ऊपर क्रोध आ रहा था। खाना उससे भी खाया नहीं गया। डर भी लगता था, बेटा यदि छोड़ गया तो क्या होगा।
बहू सो के उठी तो देखा सास ने भी खाना नहीं खाया। तो सोचने लगी मुझे रोना नहीं चाहिए था। बुजुर्ग हैं बिना खाये कुछ हो गया तो? दवाईयां भी तो खानी होती हैं। वह खाना गर्म करके लाती, सास को प्यार से खिलाती, खुद भी अपने नूडलस खाती। दोनों ही अपने मन-मन अपनी गलती मानती।
परन्तु यह बात रोज की थी। सास अपनी आदत से मजबूर थी। कभी मोबाइल पर, कभी पिक्चर जाने पर, कभी सहेलियों के आने पर, वह भाषण शुरू कर देती। बाद में दोनों ही रोते। पुरुषों तक बात नहीं पहुंचती थी परन्तु धीरे-धीरे वे भी इन बातों से अनभिज्ञ नहीं रहे। बेटा अपनी पत्नी का दुःख नहीं संभाल पा रहा था। पिता का भी धैर्य अब जवाब दे रहा था। न अलग हो सकते थे न साथ रह सकते थे।
ऐसे में बेटे ने फेमिली मनोवैज्ञानिक की सलाह लेनी चाहिए।

मनोवैज्ञानिक ने सबसे पहले सास की बात सुनी उसने कहा, ‘‘समस्या तो मैं हल कर दूंगी पर मेरी बात माननी पड़ेगी।’’
डाक्टर ने अगली बार अकेले सास को बुलाया, बिना किसी सहारे के वह मेरे पास अकेली किसी भी वाहन से आएं। बेटे ने विरोध किया, मां तो कभी अकेले कहीं गई ही नहीं, कोई पुरुष तो चाहिए कार चलाने को। पर डाक्टर नहीं मानी……………………………..

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