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खुला आकाश

कहानी
तरुण कुमार राय

जुलाई, 2025

बुढ़ापे में अकेलापन बोझिल हो जाता है। ज्ञानरंजन ने इसके लिए उपाय खोजा, वह और भारी हो गया। अन्त में उसके संवेदनशील हृदय ने नया हल खोज लिया।

ज्ञानरंजन अन्यमनस्क से अपने कमरे में लौटे थे। मन पर एक उदासी छायी थी। अकेलापन उन्हें अब और बेचैन करने लगा था। कैसी विडम्बना थी। उन्हीं के मकान के एक हिस्सें में जिन्दगी विहंस रही थी। उल्लास, खुशी, चूड़ियों की खनखनाहट और हवा में तैरती मादक हंसी की स्वर लहरियां, सब कुछ कितना जीवन्त था, किन्तु मकान के इस हिस्से में वह जीवन्तम नहीं थी। थी तो बस एक बोझिल खामोशी, गमगीनी। उन्होंने कभी बहुत उत्साह से छह कमरों वाला यह बड़ा सा मकान बनवाया था। तब यह बात उनके जेहन में भूले से भी न आई थी कि अपने ही घर में एक दिन वह निपट अकेले रह जाएंगे। यह घर उनके लिए श्मशान बन जाएगा, जिसमें वह किसी प्रेतात्मा की तरह भटकते फिरेंगे। आज वक्त ने उन्हें उसी हालत में पहुंचा दिया था।
इस अकेलेपन से ही घबरा कर उन्होंने फैसला किया था कि मकान के एक हिस्से को किराए पर उठा देंगे। जब कुछ लोग आकर यहां रहने लगेंगे तब इस श्मशान जैसे घर में कुछ रौनक आ जाएगी। एक नया जोड़ा आया था उनके पास किराए पर रहने के लिए। शायद उसकी नई-नई शादी हुई थी। चेहरे पर छलकती हंसी लिये, उमंग और जोश से भरे दोनों पति-पत्नी बातचीत में भी बहुत भले और मिलनसार लगे थे। उन्होंने फौरन हामी भर दी। किराया भी नहीं पूछा।
दरअसल उन्हें यह जोड़ा पसन्द आ गया था। उन्हें किराए से मतलब नहीं था बल्कि इस बात से था कि सूने घर को फिर से आबाद किया जा सके। नव-दम्पति अपनी जरूरत का सामान लेकर रहने आ गया था। बड़े उत्साह से दोनों पूरे दिन सामान लगाते रहे।
उस दिन ज्ञानरंजन ने अपने पुराने नौकर रामदीन से कह कर नव-दम्पत्ति का खाना भी अपने यहां ही बनवाया था और स्वयं जाकर उन्हें खाने का निमंत्रण भी दे आए थे। इस तरह पहले ही दिन से नया जोड़ा उनके साथ घुल-मिल गया था।
युवक का नाम था ट्टचभ और वह किसी कम्पनी में क्लर्क था। उसकी पत्नी रेखा घर पर रहती थी। अपना कामकाज निपटा कर वह सोती रहती या फिर पढ़ती थी। कभी-कभी वह ज्ञानरंजन के पास भी आकर बैठ जाती थी और बातें करती। वह जब भी अपनी रसोई में कुछ नया बनाती उनके लिये जरूर ले आती।
ज्ञानरंजन को रेखा से बातें करके बहुत अच्छा लगता था। वह जितनी सुन्दर थी उतनी ही सुघड़ थी। उसकी बनाई हुई चीजों में ऐसा स्वाद और सुगंध होता कि वह भूल ही नहीं पाते। वह भी हर तीसरे-चौथे दिन दोनों को अपने यहां खाने पर बुला लेते।
दिन भर का थका-मांदा ट्टचभ जब शाम ढले घर लौटता तो रेखा को दरवाजे पर इंतजार में खड़ा पाता। वह मुस्कुरा कर पति का स्वागत करती और ट्टचभ जैसे अपनी सारी थकान भूल कर उसे बाहों में भर लेता और दोनाें जल्दी से दरवाजे के भीतर हो जाते। चाय-नाश्ते के बीच उनकी मीठी नाेंक-झोंक, मान-मनुहार चलती रहती रेडियो पर संगीत बजता रहता।
धीरे-धीरे शाम की यह मस्ती रात की रंगीनी में बदल जाती। यह समय ट्टचभ और रेखा का अपना होता था। वे एक दूसरी ही दुनिया में पहुंच जाते, उनकी नितांत निजी दुनिया, जहां किसी तीसरे को घुसपैठ की इजाजत नहीं थी।
ज्ञानरंजन के बगल वाला कमरा ही नव-दम्पति का शयन-कक्ष था। बीच में बस एक दीवार थी। रात्रि के सन्नाटे में न चाहते हुए भी कुछ शब्द, मादक हंसी और सरसराहटों की आवाजें इस तरफ चली आतीं। तब एक अजीब सी सनसनी और उत्सुकता ज्ञानरंजन के भीतर समाने लगती। वह उन आहटों को सुनते रहते और अनजाने ही कल्पना करने लगते उस तरफ चलने वाले दृश्य का।
उन्हें इसमें एक विचित्र सुख मिलता। बरसों से मान-प्रतिष्ठा अर्जित करते, व्यस्तता और कर्त्तव्यों की कसौटी पर स्वयं को कसते-साधते हुए वह जैसे इस बात को भूल गये कि इन सबसे परे एक और दुनिया भी है, मन और शरीर की नितांत निजी दुनिया। उन्होंने तो इस विषय में सोचना बहुत पहले ही छोड़ दिया था, तब जबकि युवा शेफाली उनकी गोद में दो नन्हीं जानें डालकर, उन्हें जिन्दगी के सफर में अकेला लड़ने को छोड़ गई थी।
वह शेफाली को बहुत प्यार करते थे। कभी सोचा भी नहीं था कि उसका साथ इतने थोड़े समय का होगा। पाँच वर्ष के भीतर ही वह दो बच्चों की माँ बन गई। बच्चे अभी छोटे ही थे कि शेफाली को कैंसर के खूनी पंजों ने जकड़ लिया। उन्हाेंने बहुत दौड़ धूप की, पानी की तरह पैसा बहाया, मगर —- अदालत में कभी कोई मुकद्मा नहीं हारने वाले ज्ञानरंजन पत्नी का जीवन बचाने की लड़ाई में बुरी तरह हार गये थे। मौत शेफाली को उनकी पहुंच से बहुत दूर ले गई थी।

पैसों का अभाव कभी नहीं था उनके पास। अतः बच्चों की देखभाल में कभी कोई कमी नहीं आने दी। दो अनुभवी और कुशल परिचारिकाएं बच्चों के लिए विशेष रूप में रखी गई। वह स्वयं भी अपने काम में से समय निकाल कर बच्चों को अपना अधिक समय दे सकें, इसके लिए उन्होंने सामाजिक गतिविधियों में हिस्सा लेना छोड़ दिया, पार्टियों और क्लब से मुंह मोड़ लिया। उनकी पूरी दुनिया केवल घर और अदालत तक सिमट कर रह गई।
इन सबके बीच समय तेजी से सरकता गया। दूसरे ब्याह के बारें में उन्होंने कभी सोचा भी नहीं। शेफाली के अतिरिक्त उनके मन में कभी किसी दूसरी स्त्री की इच्छा जागी ही नहीं। तन और मन की भी कुछ जरूरत होती है, इस तरफ उन्होंने कभी ध्यान न दिया। यों भी दिन भर का थका हारा शरीर बिस्तर पर गिरते ही नींद के आगोश में समा जाता था।
दोनों बच्चे युवा हो चले तो ज्ञानरंजन की व्यस्तता और परेशानियां भी घटती गई। अपने वकालत के पेशे से वह खासा धन और यश अर्जित कर चुके थे। अब उनकी इच्छा थी कि बेटा उनके काम को आगे बढ़ाए, लेकिन बेटे की इस पेशे में कोई रुचि न देखकर, उन्होंने उसे अपना मनचाहा क्षेत्र चुनने की छूट दे दी।
बेटा पायलट बनना चाहता था। सो उसने वही लाइन पकड़ ली। कुछ ही समय में वह एक कमर्शियल पायलट बन गया। एक विदेशी एयरलाइंस में नौकरी भी मिल गई। धीरे-धीरे बेटा उनसे, घर से दूर होता चला गया। वह हमेशा विदेश यात्रओं पर रहता, हजारों किलोमीटर की थका देने वाली दूरियां नापता हुआ। अचानक बेटे के जीवन में एक एयर होस्टेस आ गई। दोनों ने एक दूसरे को देखा परखा और शादी का मन बना लिया। ज्ञानरंजन को जब इस बात का पता चला तो उन्होंने बिना कोई पूछताछ किये, बेटे की पसन्द को बस अपनी स्वीकृति दे दी।
बेटी भी विवाह योग्य हो चुकी थी। सोच रहे थे कि कोई अच्छा-सा घर देखकर उसके हाथ पीले कर दें। शेफाली होती तो उन्हें चितिंत नहीं होना पड़ता। वह सब संभाल लेती। पर अब तो इस अंतिम कर्त्तव्य को उन्हें ही पूरा करना था।
बेटी के लिये लड़का ढूंढने में उन्हें अधिक कठिनाई नहीं हुई। अनेक अच्छे घर के रिश्ते तो उनके ऊँचे स्तर को देखकर खुद-ब-खुद आए थे। फिर उनकी बिटिया भी कुछ कम नहीं थी। शेफाली की तरह सुन्दर और उतनी ही गुणी। उसके लिये एक अच्छा आई-ए-एस- वर मिल गया।
शादी के बाद बेटी ससुराल चली गई। घर बिल्कुल सूना हो गया। अकेलापन काटने को दौड़ता। वह जबरदस्ती खुद को कानून की मोटी-मोटी किताबों में उलझाए रखते। पर कब तक ऐसा करते, काम के प्रति अब पहले जैसा उत्साह नहीं रह गया था। कानून की जिन धाराओं, उपधाराओं से पहले वह खेला करते थे, अब उन्हें बड़ी नीरस और उबाऊ लगने लगी थीं।
केस आज भी बड़ी तादाद में उनके पास आते लेकिन वह केवल गिने चुने मुकदमे ही हाथ में लेते थे। आखिर वह क्यों करें काम, किसके लिए कमाएं? जीवन भर कमाते ही तो रहे। बच्चाें के लिये ही करते रहे सब कुछ। उनकी परवरिश की, अच्छा इंसान बनाया। आज दोनों बच्चे अपनी-अपनी दुनिया में व्यस्त थे, प्रसन्न भी। अब कौन सा कर्त्तव्य या उद्देश्य बाकी रह गया था, जिसे पूरा करने के लिये————।
क्या उन्हीं की तरह हर इंसान एक दिन सभी जिम्मेदारियों से मुक्त होकर अपने आपको खाली महसूस करने लगता है, व्यर्थ सा! शेफाली होती तो जिन्दगी इतनी बोझ कभी न लगती। अपना अकेलापन, हर गम और खुशी बांट लेते उसके साथ, पर अब तो—-।
इन्हीं दिनों उनके मन में विचार आया था मकान के एक हिस्से को किराए पर उठा देने का। सोचा था कि इससे उनका अकेलापन दूर होगा और घर में छाया मनहूस सन्नाटा भंग हो जायेगा। एक हद तक उनकी सोची हुई बातें सच हुईं, पर इसके साथ की कुछ ऐसा भी घटित हुआ जिसकी आशा उन्हें कतई नहीं थी।
जब से यह नया जोड़ा उनके घर में रहने आया था, वह अपने आपको भीतर से बहुत अकेला, रीता-सा महसूस करने लगे थे। ट्टचभ और रेखा की प्रसन्नता, उत्साह और एक दूसरे को रिझाना, सब कुछ बिल्कुल सामान्य-सा था, पर वह जाने क्यों उद्विग्न और व्याकुल से हो उठते।
रात घिरने के साथ ही बेचैनी और बढ़ जाती थी। बगल के कमरे की बत्ती आधी-आधी रात तक जलती रहती, टीवी चलता रहता। ट्टचभ और रेखा की फुसफुसाहटें दबी-दबी हंसी के स्वर उनके कानों तक पहुंचते रहते। वह चाह कर भी सो नहीं पाते। मन में ऐसे-ऐसे विचार उठने लगते, जिनके बारे में पहले कभी नहीं सोचा था। वर्षार्ंे तक एकाकी और विधुर जीवन गुजारने के बाद अचानक क्यों उनके भीतर एक तड़प और आग सी भरती जा रही थी? वह स्वयं चकित से थे। अभी कुछ दिन पहले तक सामान्य पुरुष की तरह (अपनी उम्र के हिसाब से) शांत रूप से जीते रहते आए थे। निर्द्वंद्व रहते, न कोई अभिलाषा, न अंतर्दाह, न वेदना। मगर अब?
एक रात छत पर जाने के लिये वह उनके कमरे के आगे से गुजरे तो अनजाने में कुछ खुले रह गये दरवाजे की झीरी से उन्हाेंने भीतर का जो दृश्य देखा तो देखते ही रह गये।
ट्टचभ पत्नी को प्रगाढ़ आलिंगन में लेकर उसके होंठों को चूम रहा था। स्तब्ध से वह कुछ देर तक खडे़ उस दृश्य को देखते रहे, फिर बौखलाए हुए से वापस लौट आए।
प्यार का यह रूप उनके लिये नया नहीं था, न ही वह इससे अनजान थे। लेकिन वह दृश्य उनके लिये इतना दाहक होगा, नहीं जानते थे। वह अपने संदर्भ में उस दृश्य की कल्पना करने लगे। कभी शेफाली को बांहों में भरकर वह भी इसी तरह प्यार किया करतेे थे। कितनी रंगीन और मादक होती थीं वे रातें जब दोनों दिन भर की थकान, ऊब और परेेशानियों को पूरी तरह उतार कर एक दूसरे की बांहाें में समा जाते।
पर उन दोनों का साथ बहुत थोड़ा था, अल्प समय का। बहुत कुछ पाना अभी शेष रह गया था लेकिन शेफाली की मौत उन्हें उन तमाम सुखों वे वंचित कर गई थी। वह विरह की एक ऐसी आग में घिर गये थे, जो बरसों तक उन्हें जलाती रही।
फिर धीरे-धीरे वह इसके आदी होते गये। तमाम व्यस्तताएं इतनी बढ़ गई थीं कि मन उधर-उधर भटकता न था। वह जैसे अपने आपको भूलते गये। मन समय से पहले ही बुढ़ाने लगा था।
पर आज उस बूढे़ मन में यह युवाओं जैसी ललक और बेचैनी-सी क्यों भरने लगी थी? क्यों मृत कामनाएं फिर अपना सिर उठाने लगी थी? वह चिंतित व्याकुल से सोचने लगते, क्या होता जा रहा है उन्हें? क्यों आज ऐसा लग रहा है कि कभी कुछ पाया नहीं।
कभी शेफाली ने उन्हें सब कुछ दिया था, हर सुख पाया था उससे। लेकिन उसके बाद का 20 वर्षों का नीरस, एकाकी और मरुस्थल की तरह उजाड़ जीवन, जब तन और मन की क्यारी में एक बार भी फूल नहीं खिला था। यही वह वजह थी, जो आज अपनी अपूर्णता का एहसास करा रही थी।
फिर वह सोचते कि सब कुछ बीत चुका है। जिन्दगी की किताब से वह पन्ना ही फट चुका है, जिस पर कोई नई इबारत लिखी जा सके। फिर आज उस पर इतना सोच विचार क्यों। जब समय था, तब न सोचा तो आज यह पछतावा क्यों, किसलिये? उन्हें यह सब अब शोभा देता है क्या?
ट्टचभ और रेखा की तो यही उम्र है। उनके तो दिन हैं। उनके साथ यह सब सोहता है, शालीन लगता है पर ज्ञानरंजन के लिये यह अक्षम्य है, गुनाह है। वह बहुत समझाते अपने मन को, क्यों नही रह पाते वह अलग थलग, निर्द्वंद्व, जैसे पहले रहा करते थे।
उस समय भी वह इसी द्वंद्व से घिरे थे कि रेखा ने कमरे में प्रवेश करके उनकी विचार श्रृंखला को भंग कर दिया। वह सतर्क हो गये, कही रेखा उनके भीतर के द्वंद्व को न भांप ले। रेखा का यों जब तब चले आना और अपनेपन से बैठकर बतियाना उन्हें बहुत सुखद लगता, न जाने क्यों उन्हें रेखा में शेफाली की झलक दिखाई देती। शेफाली की बहुत सी आदतें रेखा में भी थी। सूरत में भी खासा साम्य दिखता। छोटा माथा, बड़ी-बड़ी बोलती आँखे, हंसते वक्त गालों में पड़ने वाले भंवर, चलने बोलने का वही अंदाज, पता नहीं यह सब उनका भ्रम था या कोई सच्चाई। कई बार रेखा को सामने देखकर उन्हें लगता जैसे शेफाली ही खड़ी हो। इसी बेख्याली में वह कभी-कभी रेखा को शेफाली कहकर पुकार बैठते।
एक दिन रेखा ने पूछ ही लिया था, ‘‘बाबूजी, यह शेफाली कौन है? क्या मेरी सूरत उससे बहुत मिलती है?’’
इस दिन उन्हाेंने रेखा को शेफाली से अपने रिश्ते तथा स्वयं की गुजारी हुई जिन्दगी के विषय में सब कुछ बता दिया था। सुनकर रेखा को बड़ा दुख हुआ था। साथ ही उनके प्रति मन में गहरी करुणा और सम्मान की भावना जाग्रत हुई थी। सचमुच वह अपनी पत्नी से बहुत प्रेम करते रहे होंगे, तभी तो युवावस्था में ही विधुर हो जाने के बाद भी उन्हाेंने दूसरे विवाह की नहीं सोची। केवल बच्चों के लिये जीते रहे और सारा जीवन उन्हीं की खातिर होम कर दिया। निष्ठावान् प्रेम व त्याग की वह जैसे एक मिसाल थे।
किंतु रेखा को इस बात का इल्म नहीं था कि इधर कुछ समय से ज्ञानरंजन कैसे झंझावात से घिर गये थे। उसके मन में आदर्श पुरुष की छवि बनने वाले इस इंसान के जेहन में किस तरह के शील-अश्लील विचार उठने लगे थे? यहाँ तक कि कभी-कभी तो रेखा को लेकर ज्ञानरंजन ऐसी कल्पनाएं करने लगते, जिस पर उन्हें खुद शर्म आती। मन स्वयं को धिक्कारता था। रेखा उन्हें बाबूजी कहती थी और उम्र में उनकी बेटी से कुछ ही बड़ी रही होगी, उसके बारे में ऐसा सोचना भी महापाप था। रेखा को अगर इस बात का पता चल जाए तो वह उनका मुंह देखना भी पसन्द नहीं करेगी।
वह खिन्न और लज्जित से हो उठते क्या उनका नैतिक पतन हो गया है? जीवन भर का संचित संयम और मर्यादा क्या यों बुढ़ापे में खंडित होगी?
इसकी कल्पना से ही वह सहम जाते। कभी लगता कि वह मानसिक रूप से बीमार हैं, अकेले रहते-रहते अपना दिमागी सन्तुलन खो बैठे हैं? खाली बैठे रहने और जिन्दगी का कोई उद्देश्य न रह जाने के कारण उनके दिमाग में फितूर भरते जा रहे थे।
आज यदि शेफाली जीवित होती, बच्चे उनके साथ रहते तो वह इस तरह विक्षिप्त, असंतुलित कभी न होते, जीवन की परिपूर्णता उन्हें कभी भी अतृप्ति या असंतुष्टि का एहसास न कराती। अपनी इस हालत के लिए वह दोष किसे दें, समझ नहीं पाते।
अब रह-रह कर उन्हें ऐसा लग रहा था कि कमरे किराए पर उठा कर उन्होंने गलती की थी, जाने किस मनहूस घड़ी में यह बात उनके दिमाग में आई थी। इस नये जोड़े ने यहाँ आकर अनजाने ही, पर उन्हें उनकी जिन्दगी के अधूरेपन का एहसास कराया था। मकान किराए पर देने से पूर्व उन्होंने क्या सोचा था, और क्या हो गया था।
ट्टचभ और रेेखा निर्दाेष ही सही, पर ज्ञानरंजन के शांतिपूर्ण जीवन में हलचल मचा देने का गुनाह उनसे हुआ था, अनजाने में ज्ञानरंजन सोचने लगे कि अगर ये दोनाें यहां से चले जाएं तो शायद वह अपनी पहले वाली स्थिति में फिर से लौट आएँ। उन्हें अपनी शांति हर कीमत पर प्रिय थी। मन में यह विचार दृढ़ होते ही उन्होंने निश्चय कर लिया कि साफ-साफ दोनों को कह देंगे कि उनका घर खाली कर दें। उन लोगों के जब तक आने-जाने और देर-सवेर सोने जागने से उनकी शांति भंग होती है।
यही सोचकर एक शाम वह उनके कमरे की तरफ बढ़ गये। मियां बीवी कमरे में मौजूद थे। और किसी विषय पर चर्चा कर रहे थे। द्वार खटखटाने के लिये उठा ज्ञानरंजन का हाथ अचानक रुक गया और भीतर से आती आवाजों को गौर से सुनने लगे।
‘‘देखो ट्टचभ, तुमने मुझ से वादा किया था कि अगले महीने हम घूमने जाएंगे और तुम कह रहे हो—–’’ रेखा का स्वर काफी तीखा था।
बीच में बोल पड़ा था ट्टचभ, ‘‘क्या करूं रेखा, मैंने तो छुटटी के लिये आवेदन भी कर दिया था लेकिन बीच में पिताजी की चिट्ठी आ गई। मां के इलाज और छोटे भाई की पढ़ाई के लिये उन्हाेंने और पैसे मंगवाएं हैं’’ उसका स्वर बेचारगी भरा था।
‘‘हाँ क्यों नहीं, अब जो पैसे हमने घूमने के लिए बचाए थे, उन्हें तुम भेज दोगे’’, रेखा का रोष भरा स्वर उभरा, ‘‘आखिर हमारे साथ ही ऐसा क्यों होता है, क्यों हम अपने लिए कुछ करने की सोचते हैं तो घर से पैसों की मांग की जाने लगती है, क्या हमारी अपनी कोई जिन्दगी नहीं?’’
‘‘रेखा प्लीज, शांत हो जाओ, मुझे समझने की कोशिश करो।’’ पत्नी के अधैर्य पर वह जैसे मन ही मन झुंझलाता हुआ बोला, ‘‘तुम्हारी नाराजगी का कारण समझ रहा हूँ, लेकिन क्या करूं, घर का बड़ा बेटा हूँ, अपने फर्ज से मुख तो नहीं मोड़ सकता। हमारे घूमने से कहीं जरुरी है मां का इलाज और भाई की पढ़ाई। बस इस बार रुक जाओ। अगली बार हम घूमने अवश्य चलेेंगे, जहां तुम कहोगी वहीं।’’
‘‘रहने दो, यह झांसा तुम कितने समय से देते आ रहें हो। लानत है तुम्हारे घूमने पर। तुम वही करो जो तुम्हें करना है, मैं कुछ न कहूंगी।’’
रोज प्यार भरी बातें करने वाले पति पत्नी के बीच यह तीखी नोंक झोंक कैसी! उन्हें जैसे विश्वास नहीं हो रहा………………………………….

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