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आधुनिकता की दौड़ में खोता अनुशासन

लेख
डॉ. उमेश चन्द्र सिरसवारी

स्वाधीनता विशेषांक
अगस्त, 2026

आज परिस्थितियां पूरी तरह बदल चुकी हैं। देर रात तक मोबाइल स्क्रीन पर आंखें टिकाए रहना आधुनिक जीवन की पहचान बन गया है। सोशल मीडिया, ऑनलाइन निरर्थक आभासी व्यवस्तताओं ने दिनचर्या को अस्त-व्यस्त कर दिया है। रात के दो-दो बजे तक जागना। परिणामस्वरूप शरीर थका, मन चिड़चिड़ा, कार्य में एकाग्रता समाप्त होने लगी है।

मनुष्य का जीवन केवल सांसों का क्रम नहीं, बल्कि संस्कारों, मर्यादाओं और मूल्यों का एक सुव्यवस्थित प्रवाह है। जब यह प्रवाह संतुलित रहता है, तब व्यक्ति का जीवन भी सुंदर और सार्थक बनता है। किन्तु जब इसमें अव्यवस्था प्रवेश कर जाती है, तब जीवन की दिशा भटकने लगती है। आज का आधुनिक समाज इसी भटकाव के दौर से गुजर रहा है। विज्ञान, तकनीक और भौतिक सुविधाओं की अभूतपूर्व प्रगति के बीच मनुष्य ने बहुत कुछ प्राप्त किया है, परन्तु उसी अनुपात में उसने अपने भीतर के अनुशासन, संयम और आत्मनियंत्रण को खोना भी शुरू कर दिया है। यही आधुनिक जीवन की सबसे बड़ी विडंबना है।
आज का युवा अत्यंत प्रतिभाशाली, ऊर्जावान और जागरूक है। उसके पास अवसरों की कमी नहीं है। वह विश्व स्तर पर अपनी पहचान बना रहा है। किन्तु इसके साथ एक दूसरी सच्चाई भी उतनी ही तीव्रता से सामने आ रही है कि जीवन की गति जितनी तेज हुई है, मनुष्य का मन उतना ही अस्थिर होता गया है। सुविधाएं बढ़ी हैं, पर संतोष घटा है। संपर्क के साधन बढ़े हैं, पर संबंध कमजोर हुए हैं। ज्ञान के स्रोत विस्तृत हुए हैं, पर विवेक का क्षरण हुआ है। इस परिस्थिति में अनुशासन की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक बढ़ जाती है।
बदलती दिनचर्या और अस्त-व्यस्त जीवन
कुछ दशक पहले तक भारतीय जीवनशैली प्रकृति के निकट थी। लोग सूर्योदय से पहले जागते थे। प्रातःकालीन वातावरण में योग, ध्यान, प्रार्थना और श्रम जीवन का स्वाभाविक हिस्सा हुआ करते थे। भोजन समय पर होता था और रात्रि विश्राम भी निश्चित समय पर। यह अनुशासित जीवन केवल परंपरा नहीं, बल्कि शरीर और मन दोनों के स्वास्थ्य का आधार था।
आज परिस्थितियां पूरी तरह बदल चुकी हैं। देर रात तक मोबाइल स्क्रीन पर आंखें टिकाए रहना आधुनिक जीवन की पहचान बन गया है। सोशल मीडिया, ऑनलाइन गेम, वेब सिरीज और निरर्थक आभासी व्यवस्तताओं ने युवाओं की दिनचर्या को अस्त-व्यस्त कर दिया है। रात के दो-दो बजे तक जागना और सुबह देर तक सोते रहना अब सामान्य माना जाने लगा है। परिणामस्वरूप शरीर थका हुआ रहता है, मन चिड़चिड़ा हो जाता है और पढ़ाई या कार्य में एकाग्रता समाप्त होने लगती है।
मोबाइल और इंटरनेट स्वयं समस्या नहीं है। वे ज्ञान और संवाद के महत्वपूर्ण माध्यम है। समस्या तब उत्पन्न होती है, जब मनुष्य उनका स्वामी बनने के बजाय उनका दास बन जाता है। तकनीक का विवेकपूर्ण उपयोग जीवन को सरल बना सकता है, पर उसका अतिरेक मनुष्य को भीतर से खोखला कर देता है। युवा पीढ़ी को यह समझना होगा कि समय का सदुपयोग ही सफलता की पहली शर्त है। जो व्यक्ति समय को अनुशासित नहीं कर पाता, वह जीवन को भी दिशा नहीं दे पाता।
भोजन संस्कृति का संकट
भारतीय संस्कृति में भोजन को केवल स्वाद का विषय नहीं माना गया बल्कि ‘अन्नपूर्णा का प्रसाद’ कहा गया है। घर की रसोई परिवार को जोड़ने का केन्द्र होती है। माता के हाथों का भोजन केवल शरीर को पोषण नहीं देता, बल्कि उसमें स्नेह, संस्कार और आत्मीयता का स्वाद भी होता है।
आज फास्ट-फूड और जंक-फूड की संस्कृति ने इस परंपरा को गहरा आघात पहुंचाया है। चमकदार विज्ञापनों और तथाकथित आधुनिकता की दौड़ में युवाओं ने प्राकृतिक और संतुलित भोजन से दूरी बना ली है। पिज्जा, बर्गर, कोल्ड-ड्रिंक और पैकेटबंद खाद्य पदार्थ सुविधा का प्रतीक बन गए हैं। परिणाम सामने है-कम उम्र में मोटापा, मधुमेह, रक्तचाप, तनाव और मानसिक अस्थिरता जैसी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं।
भोजन का अनुशासन केवल स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है। यह मनुष्य के विचारों और व्यवहारों को भी प्रभावित करता है। सात्विक और संतुलित भोजन मन को शांत और संयमित बनाता है, जबकि असंयमित खान-पान शरीर के साथ-साथ मन को भी अस्थिर कर देता है। इसलिए आवश्यक है कि युवा पीढ़ी भोजन को फैशन नहीं, बल्कि जीवन का आधार समझें।
बड़ों के प्रति घटता सम्मान
भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता रही है-परिवार और संबंधी का सम्मान। माता-पिता, गुरु और बुजुर्गाों को जीवन का मार्गदर्शक माना गया है तथा उनके अनुभवों को ज्ञान की धरोहर समझा गया है। परिवार केवल आर्थिक इकाई नहीं, बल्कि संस्कारों का विद्यालय है।
आज स्थिति तेजी से बदल रही है। नई पीढ़ी का एक बड़ा वर्ग बड़ों की सलाह को ‘पुरानी सोच’ मानकर उपेक्षित कर देता है। परिवारों में संवाद कम हो रहा है। संयुक्त परिवार टूट रहे हैं और अकेलेपन की समस्या बढ़ती जा रही है। बुजुर्गों का अनुभव अब बोझ समझा जाने लगा है। यह केवल सामाजिक परिवर्तन नहीं बल्कि भावनात्मक विघटन का संकेत है।
युवा पीढ़ी को यह समझना चाहिए कि आधुनिकता का अर्थ संस्कारों से विमुख होना नहीं है। जिस वृक्ष की जड़ें मजबूत नहीं होती, वह आंधी में टिक नहीं सकता। उसी प्रकार जो समाज अपने बुजुर्गों के अनुभव और संस्कृति से कट जाता है, वह धीरे-धीरे भीतर से कमजोर हो जाता है।
नशे की प्रवृत्ति और आत्मविनाश
वर्तमान समय की सबसे गंभीर समस्याओं में एक है-नशे की बढ़ती प्रवृत्ति। शराब, सिगरेट और अन्य मादक पदार्थों को आधुनिक जीवनशैली का प्रतीक मान लिया गया है। दुर्भाग्य यह है कि अब युवतियां भी इसे तथाकथित स्टेट्स और फैशन के रूप में अपनाने लगी हैं।
युवा वर्ग यह नहीं समझ पा रहा कि यह स्वतंत्रता नहीं, बल्कि आत्मविनाश का मार्ग है। नशा मनुष्य की विवेक शक्ति को समाप्त कर देता है। यह केवल शरीर को ही नहीं, परिवार और समाज को भी खोखला कर देता है। अनेक प्रतिभाशाली युवाओं का भविष्य केवल इसलिए अंधकारमय हो जाता है क्योंकि वे क्षणिक आकर्षण के प्रभाव में अपनी दिशा खो बैठते हैं।
सच्ची आधुनिकता आत्मविश्वास, ज्ञान और व्यक्तित्व में होती है, न कि धुएं और नशे में। जो युवा अपने मन और इच्छाओं पर नियंत्रण नहीं रख सकता, वह जीवन की बड़ी चुनौतियों का सामना भी नहीं कर सकता।
पाश्चात्य प्रभाव और सांस्कृतिक असंतुलन
यह सत्य है कि पश्चिमी देशों ने विज्ञान, तकनीक और प्रबंधन के क्षेत्र में अद्भुत प्रगति की है। उनसे बहुत कुछ सीखना आवश्यक भी है। किन्तु समस्या तब उत्पन्न होती है जब हम विवेक खोकर केवल बाहरी चमक-दमक का अनुकरण करने लगते हैं।
आज का समाज उपभोक्तावाद की मानसिकता से ग्रस्त होता जा रहा है। जीवन का मूल्य वस्तुओं और प्रदर्शन से आँका जाने लगा है। व्यक्ति जितना अधिक भौतिक सुखों में डूबता है, उतना ही भीतर से खाली होता जाता है। आधुनिकता और परंपरा के बीच संतुलन का अभाव ही आज की सबसे बड़ी सामाजिक समस्या बन चुका है।
हमें यह समझना होगा कि भारतीय संस्कृति कभी प्रगति िवरोधी नहीं रही। उसने सदैव ज्ञान, विज्ञान और परिवर्तन को स्वीकार किया है, पर साथ ही आत्मसंयम और नैतिकता को भी सर्वोच्च स्थान दिया है। इसलिए आवश्यकता अंधानुकरण की नहीं, बल्कि विवेकपूर्ण चयन की है।
अनुशासन: स्वतंत्रता का आधार
आज बहुत से युवाओं को लगता है कि अनुशासन उनकी स्वतंत्रता को सीमित कर देता है। वे नियमों को बंधन मानते हैं। किन्तु वास्तव में अनुशासन ही सच्ची स्वतंत्रता का आधार है। जिस प्रकार बिना दिशा की नदी बाढ़ बन जाती है, उसी प्रकार बिना अनुशासन का जीवन भी विनाशकारी हो सकता है।
अनुशासन मनुष्य को समय का मूल्य सिखाता है। यह उसे अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित बनाता है। खिलाड़ी, वैज्ञानिक, लेखक, कलाकार या सैनिक हर क्षेत्र में सफलता उन्हीं को मिलती है, जिन्होंने स्वयं को अनुशासित किया है। बिना अनुशासन के प्रतिभा भी बिखर जाती है।
समय पर उठना, नियमित अध्ययन करना, सीमित साधनों में संतोष रखना, संयमित व्यवहार कराना और दूसरों का सम्मान करना, ये छोटे-छोटे अभ्यास ही महान व्यक्तित्व की नींव बनते हैं।
युवाओं की भूमिका और जिम्मेदारी
आज का युवा केवल देश का भविष्य नहीं, वर्तमान की सबसे बड़ी शक्ति भी है। यदि युवा पीढ़ी सही दिशा में आगे बढ़े तो समाज का स्वरूप बदल सकता है। इसलिए आवश्यक है कि युवाओं को केवल डिग्रियों की शिक्षा न दी जाए, बल्कि जीवन मूल्यों की शिक्षा भी दी जाए।
विद्यालयाें और महाविद्यालयों में योग, ध्यान, नैतिक शिक्षा, सामूहिक सेवा और सांस्कृतिक गतिविधियों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। परिवारों को भी बच्चों के सामने अनुशासित जीवन का उदाहरण प्रस्तुत करना होगा। बच्चे उपदेशों से अधिक व्यवहार से सीखते हैं।
माता-पिता यदि स्वयं मोबाइल और टीवी में डूबे रहेंगे तो बच्चों से संयम की अपेक्षा करना कठिन होगा। इसलिए अनुशासन का वातावरण घर से ……………….

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