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कोचिंग का मकड़जाल

कहानी
पूनम पांडे

स्वाधीनता विशेषांक
अगस्त, 2026

शिक्षा क्या है? और अफसर बनने के लिए कोचिंग सेंटर की पढ़ाई क्या है? दोनों के अन्तर बताती एक हृदयस्पर्शी कहानी।

आजादपुर गांव का निखिल जीवन में आगे बढ़ना चाहता था। उसे प्रतिष्ठित कोचिंग संस्थान से पढ़ाई करके आसमान छूना था। निखिल होनहार था। इसलिए माता-पिता अपनी जमा पूंजी गिरवी रखकर उसका हर सपना सच करना चाहते थे।
वहां से एक सौ बीस मील दूर चतुरगंज में एक कोचिंग संस्थान था। निखिल ने पिता से बात की। सहमति मिल गई।
बस अड्डे पर उतरते ही निखिल को लगा, जैसे वह किसी शहर में नहीं, किसी परीक्षा में उतर आया हो।
जहां तक नजर जाती, ऊंची-ऊंची इमारतों पर मुस्कराते चेहरों वाले होर्डिंग लगे थे-‘आल इंडिया रैंक, हमारे संस्थान से, हर तीसरा चयन हमारा, सपनों को पंख दीजिए’, ‘सफलता की गारंटी’। हर पोस्टर पर एक ही मुस्कान थी। सफलता की मुस्कान। मगर उन मुस्कानों के पीछे कितनी अधूरी रातें, कितनी टूटी उम्मीदें और कितने उजड़े घर थे, यह किसी पोस्टर पर नहीं लिखा था।
निखिल के साथ पिता थे। उसने अपने पिता रामदीन की ओर देखा। उनके हाथ में लोहे का पुराना बक्सा था, जिसकी पेंट कई बरस पहले ही उखड़ चुकी थी। कंधे पर एक झोला था, जिसमें दो जोड़ी कपड़े और मां के हाथ की बनी मठरियां रखी थी। माथे पर पसीना था, लेकिन चेहरे पर एक ऐसी चमक थी जो केवल उम्मीद पैदा करती है।
‘यही है वह शहर—-’ रामदीन ने जैसे खुद से कहा।
निखिल ने कुछ नहीं कहा।
गांव से चलते समय मां ने उसकी पेशानी चूमकर कहा था, ‘‘बेटा, पढ़ लिखकर अफसर बन जाना। तेरे बाबूजी की कमर अब खेत में नहीं झुकती।’’
वह वाक्य निखिल के कानों में अभी भी गूंज रहा था।
रामदीन के पास कुल पांच बीघा सूखी जमीन थी। बरसात ठीक हो जाए तो बाजरा निकल आता, नहीं तो खेत हवा चरते रहते। इस बार उन्होंने दो बीघा खेत गिरवी रख दिया था। गांव के महाजन ने पैैसे देते समय मुस्करा कर कहा था- ‘‘लड़का अफसर बन जाए तो मेरा भी नाम रोशन होगा।’’
रामदीन जानते थे कि महाजन की मुस्कान में शुभकामना कम, ब्याज ज्यादा था।
उस कोचिंग संस्थान के बाहर मेला लगा था। सैकड़ों विद्यार्थी। उनके साथ माता-पिता। कोई फीस पूछ रहा था, कोई हॉस्टल, कोई स्कॉलरशिप।
एक लड़का बोला, ‘‘भैया, यहां नहीं पढ़ोगे तो कहीं चयन नहीं होगा।’’
यह वाक्य निखिल के भीतर किसी कील की तरह धंस गया।
रिसेप्शन पर बैठी लड़की ने बिना सिर उठाए पूछा, ‘‘रेगुलर बैच या टार्गेट बैच?’’
रामदीन ने सकुचाकर कहा, ‘‘हमें तो बस पढ़ाना है बिटिया।’’
लड़की मुस्करा दी। वह मुस्कान दया की नहीं, अभ्यास की थी।
कुछ देर बाद एक काउंसलर आया। उसने इतनी तेजी से सफलता के आंकड़े गिनाए कि रामदीन को लगा, बस फीस भरते ही लड़का अफसर बन जाएगा।
‘‘सिर्फ एक लाख पैंतीस हजार। हॉस्टल अलग। टेस्ट सीरिज अलग।’’
रामदीन की उंगलियां कांप गई।
उन्हाेेंने जेब से कपड़े में बंधी नोटों की गठरी निकाली। वह गठरी नहीं थी, कई बरसों की बचत, कई मौसमों की मेहनत और दो बीघा खेत की मिट्टी थी।
निखिल का मन हुआ कि बाबूजी का हाथ पकड़ ले।
उसका दिल कह रहा था। फटाफट से कह दे। ‘चलो पिताजी घर लौट चलते हैं।’ लेकिन पिता की आंखों में जो सपना था, उसके सामने उसकी आवाज बौनी पड़ गई।

हॉस्टल, कमरे से ज्यादा डिब्बा था। आठ बाई दस का कमरा, दो लोहे के पलंग। एक पंखा, जो गर्म हवा को केवल इधर से उधर करता था। खिड़की के बाहर दूसरी इमारत की दीवार।
साथ वाले बिस्तर पर बैठा लड़का बिना देखे बोला। ‘‘कहां से?’’
‘‘आजादपुर के गांव से।’’
‘‘मैं बिहार से हूं। तीसरा साल है।’’
निखिल चौंका।
‘‘तीसरा साल?’’
‘‘हां—हर साल लगता है, बस इस बार हो जाएगा।’’
उसने हंसने की कोशिश की, लेकिन वह हंसी किसी सूखे पत्ते की तरह टूटकर गिर गई। पहली क्लास में पांच सौ विद्यार्थी थे।
शिक्षक मंच पर थे।
पीछे बैठे छात्रें को उनका चेहरा भी ठीक से नहीं दिख रहा था।
माइक पर आवाज आई।
‘‘जो मेहनत करेगा, वही निकलेगा।’’
यह वाक्य सही था।
लेकिन पांच सौं में से कितने निकलेंगे, यह किसी ने नहीं बताया।
क्लास खत्म होते ही बच्चों की भीड़ नोट्स खरीदने दौड़ी। फिर डाउट क्लास। फिर टेस्ट। फिर रैंक। हर दीवार पर रैंक।
हर बातचीत में रैंक।
हर सांस में रैंक।
मानो इंसान नहीं, नंबर जी रहे हों।
एक महीने बाद मां का फोन आया।
‘‘बेटा, खाना समय पर खाता है न?’’
‘‘हां मां’’
‘‘कमजोर लग रहा है आवाज से।’’
‘‘नहीं मां, सब ठीक है।’’
मां ने धीरे से पूछा।
‘‘तेरे बाबूजी कहते थे कि अगर और पैसे लगे तो बता देना।’’
निखिल की आंखें भर आईं।
उसे याद आया। घर में छोटी बहन की फीस भी भरनी थी।
मां के कानों के छोटे से सोने के बूंदे भी अब शायद नहीं रहे होंगे।
उसने झूठ बोला।
‘‘कुछ नहीं चाहिए मां। यहां सब मिल जाता है।’’
मां खुश हो गई।
बेटे का झूठ, मां की राहत बन गया।
दिन बीतते गए।
निखिल अब समझने लगा था कि इस शहर में विद्यार्थी कम, ग्राहक ज्यादा हैं, हर हफ्रते नया बैच। नई किताब।
नई टेस्ट सीरीज। नई फीस।
नया सपना। पुराना तनाव।
उसे पहली बार लगा कि वह पढ़ाई नहीं कर रहा, बल्कि एक ऐसी मशीन का पुर्जा बन गया है, जो हर साल लाखों सपनों को पीसकर कुछ सौ सफलतां बाहर निकालती हैं और बाकी को अगली पारी का टिकट पकड़ा देती है।
रात को उसने हॉस्टल की छत पर जाकर आसमान देखा।
गांव का आसमान कितना बड़ा होता था।
यहां तो इमारतों ने आसमान भी टुकड़ों में बांट दिया था।
उसने जेब से मां की दी हुई छोटी सी तुलसी की पत्ती निकाली, जो अब सूख चुकी थी।
धीरे से बुदबुदाया।
‘‘मां—-मैं सचमुच पढ़ रहा हूं या किसी जाल में फंस गया हूं?’’
हवा चुप रही। शहर चुप रहा।
लेकिन उसी रात निखिल के भीतर एक ऐसी बेचैनी जन्म ले चुकी थी, जो आने वाले दिनों में उसकी नींद, उसका आत्मविश्वास और उसकी पहचान, सब कुछ निगलने वाली थी।
यहां का वातावरण विषैला था। रैंक, रिजल्ट और रट्टेबाजी, इसी के शिकंजे में टूटता हुआ छात्र घुट रहा था। इस कोचिंग में दिन की शुरुआत सूरज से नहीं, टेस्ट से होती थी। सुबह छह बजे तक हर विद्यार्थी अपनी सीट पर बैठ जाता। किसी के हाथ में कॉफी होती, किसी के हाथ में रंग-बिरंगे हाईलाइटर, किसी के चेहरे पर आत्मविश्वास, तो किसी की आंखाें में रात भर की अधूरी नींद। लेकिन एक चीज सब में समान थी डर। निखिल ने धीरे-धीरे समझ लिया था कि इस शहर में डर भी एक पाठ्यक्रम है। पहले डराया जाता है, फिर उसी डर का इलाज बेच दिया जाता है।

हर सोमवार को नोटिस बोर्ड पर रैंक लगती थी। पांच सौ विद्यार्थी में किसकी क्या स्थिति है, यह सबके सामने टांग दिया जाता। ऊपर वालों के चेहरे चमकते, नीचे वालों की गर्दन झुक जाती।
उस सोमवार निखिल की रैंक 327 थी। उसे लगा जैसे किसी ने पूरी कक्षा के सामने उसका परिचय नहीं, उसका मूल्य बता दिया हो।
पीछे खड़े दो लड़के फुसफुसा रहे थे, ‘‘तीन सौ से नीचे वालों का कुछ नहीं हो सकता।’’ दूसरे ने हंसते हुए कहा, ‘‘ये लोग तो बस फीस बढ़ाने के काम आते हैं।’’ निखिल ने अनसुना करने की कोशिश की, पर कुछ वाक्य कानों से नहीं, आत्मा में उतर जाते हैं।
उस शाम उसने पहली बार आईने में खुद को देर तक देखा। वही चेहरा था, जो गांव में पूरे स्कूल का सबसे होनहार छात्र कहलाता था। वही लड़का, जिसकी बारहवीं में तस्वीर प्रधानाचार्य ने सम्मान पट्ट पर लगवाई थी। लेकिन यहां वही लड़का अचानक ‘औसत’ घोषित कर दिया गया था।
उसे लगा जैसे उसकी बुद्धि नहीं, उसका पूरा अस्तित्व छोटा हो गया है। हॉस्टल का उसका साथी समीर रात-रात भर पढ़ता था। किताबें खुली रहतीं, आंखें लाल रहतीं और मेज पर कॉफी के खाली कप जमा होते जाते।
एक रात निखिल ने पूछा, ‘‘सोते नहीं हो?’’
समीर मुस्कराया। वह मुस्कान थकी हुई थी।
‘‘नींद भी अब रैंक देखकर आती है।’’
‘‘घर नहीं जाते?’’
‘‘दो साल से नहीं गया।’’
‘‘क्यों?’’
समीर ने खिड़की से बाहर देखा।
‘‘घर वाले समझते हैं कि मैं अफसर बनने में व्यस्त हूं। उन्हें क्या बताऊं कि मैं धीरे-धीरे आदमी से मशीन बनता जा रहा हूं?’’
कुछ देर बाद उसने धीमे स्वर में कहा-‘‘पिछले महीने पिताजी ने भैंस बेच दी। बोले, बेटा, इस बार आखिरी कोशिश कर ले।’’ वह चुप हो गया।
निखिल ने पहली बार महसूस किया कि इस शहर में हर कमरे के भीतर कोई न कोई किसान, मजदूर या छोटा दुकानदार अपने सपनों की आखिरी पूंजी भेज रहा है।
कोचिंग वालों ने नया कार्यक्रम शुरू किया। ‘टॉपर्स मोटिवेशन सेशन।’ मंच पर पांच सफल विद्यार्थी बैठे थे।
उनसे पूछा गया, ‘‘आपकी सफलता का राज क्या है?’’ एक बोला, ‘‘मैं रोज सोलह घंटे पढ़ता था।’’ दूसरा बोला, ‘‘मैंने मोबाइल को हाथ नहीं लगाया।’’ तीसरा बोला, ‘‘मैंने तीन साल तक कोई त्यौहार नहीं मनाया।’’
पूरा हॉल तालियों से गूंज उठा।
निखिल सोच रहा था, ‘क्या सफलता का अर्थ सचमुच जीवन से सारे रंग छीन लेना है? किसी ने यह नहीं पूछा कि उन पांच के अलावा जो चार सौ पिचानवें विद्यार्थी उसी मेहनत के बाद भी असफल रहे, उनकी कहानी क्या थी?’
‘क्योंकि असफलता कभी मंच पर नहीं बुलाई जाती।’ धीरे-धीरे निखिल के फोन कम होने लगे। मां रोज शाम को प्रतीक्षा करती। आज निखिल का फोन आएगा। लेकिन निखिल बात करने से बचने लगा।
उसे डर था कि मां उसकी आवाज से उसके भीतर की दरारें पढ़ लेगी। एक दिन पिता का फोन आया, ‘‘बेटा, पढ़ाई कैसी चल रही है?’’
‘‘अच्छी है बाबूजी।’’
‘‘इस बार तो हो जाएगा न?’’ यह प्रश्न नहीं था, उम्मीद थी। निखिल के हांठ कांपे। ‘‘जी–कोशिश कर रहा हूं।’’ उधर से हंसने की आवाज आई।
‘‘हमने तो गांव में कह दिया है कि हमारा लड़का अफसर बनकर ही लौटेगा।’’ फोन कट गया।
लेकिन यह वाक्य निखिल के कंधों पर पत्थर की तरह रख गया।
दिसंबर की ठंडी रात थी। हॉस्टल के सामने अचानक भीड़ लग गई।
एक छात्र बेहोश हो गया था। लोग तरह-तरह की बातें कर रहे थे। ‘‘तीन दिन से ठीक से सोया नहीं था।’’ ‘‘लगातार टेस्ट में पीछे आ रहा था।’’ ‘‘घर वाले बहुत दबाव डाल रहे थे।’’
एम्बुलेंस आई और उसे ले गई। अगले दिन कोचिंग सामान्य रूप से खुल गई। पहला पीरियड समय पर शुरू हुआ। ब्लैक-बोर्ड पर शिक्षक ने बड़े अक्षरों में लिखा-श्ैनबबमेे क्मउंदके ैंबतपपिबमण्श्
निखिल उस वाक्य को देर तक देखता रहा। उसे लगा, यहां बलिदान सपनों का नहीं, मासूम इंसानों का हो रहा है।
अब वह पढ़ते समय बार-बार भूलने लगा था। एक ही पृष्ठ तीन-तीन बार पढ़ता, फिर भी याद नहीं रहता। रात को नींद टूट जाती। सपने में नोटिस बोर्ड दिखाई देता, जिस पर उसकी रैंक हर बार और नीचे चली जाती। सुबह उठते ही दिल तेज धड़कने लगता।
उसे समझ नहीं आता था कि वह परीक्षा की तैयारी कर रहा है या धीरे-धीरे अपने भीतर की शांति खो रहा है।

एक रविवार वह बिना बताए शहर के पुराने पार्क में चला गया। वहां कुछ बच्चे क्रिकेट खेल रहे थे।
एक छोटी लड़की तितली के पीछे भाग रही थी। एक बूढ़ा आदमी पेड़ के नीचे बैठकर अखबार पढ़ रहा था। निखिल बहुत देर तक उन्हें देखता रहा। उसे याद आया। वह भी कभी इसी तरह हंसता था। कब उसकी हंसी को रैंक ने निगल लिया, उसे पता ही नहीं चला। तभी उसके मोबाइल पर कोचिंग का संदेश आया।
‘कल ग्रैंड टेस्ट अनिवार्य है। अनुपस्थित रहने पर विशेष बैच से नाम हटाया जा सकता है।’ उसने मोबाइल बंद कर दिया।
पहली बार उसे लगा कि वह पढ़ाई नहीं कर रहा, बल्कि एक ऐसे अदृश्य मकड़जाल में फंस चुका है, जहां हर धागा उसे और कसता जा रहा है।
उसने आसमान की ओर देखा। उसे गांव का खुला आकाश याद आया, मां की रोटी की खुशबू याद आई, पिता की झुर्रियों में छिपा विश्वास याद आया।
और उसी क्षण उसके भीतर एक प्रश्न जन्मा, ‘क्या मैं अपने सपनों के लिए लड़ रहा हूं या दूसरों के सपनों का बोझ ढो रहा हूं?’ यह प्रश्न छोटा था, लेकिन आगे चलकर वही उसके जीवन की सबसे बड़ी लड़ाई बनने वाला था।
इस बार जनवरी की ठंड उस कोचिंग वाले शहर में भी थी। लेकिन निखिल के भीतर जो सर्दी उतर चुकी थी, उसका मौसम अलग था।
अब वह किताबें खोलता तो शब्द दिखाई देते थे, अर्थ नहीं।
पहले जो सूत्र आंखें बंद करते ही याद हो जाते थे, अब वे धुंधले पड़ने लगे थे। वह देर तक किताब के एक ही पन्ने पर निगाह टिकाए रहता, फिर अचानक चौंककर देखता कि आधा घंटा बीत चुका है।
उसे लगने लगा था कि उसका दिमाग पढ़ाई से नहीं, चिंता से भर गया है। चिंता जो धीरे-धीरे स्मृति को खा जाती है। उस दिन हॉस्टल के बाहर डाकिया आया अब चिट्ठियां कौन लिखता है? लेकिन गांवों में कुछ आदतें अभी भी जिंदा थी।
मां का पत्र था। अक्षर टेढ़े-मेढ़े थे। जगह-जगह स्याही फैल गई थी।
‘‘बेटा, तू चिंता मत करना। हम सब अच्छे हैं। तेरी छोटी बहन की फीस भर दी है। इस बार गेहूं ठीक हो जाए तो भगवान की कृपा रहेगी। तू बस मन लगाकर पढ़। तेरे बाबूजी कहते हैं कि हमारा बेटा अफसर बनेगा तो घर के सारे दुख दूर हो जाएंगे।’’
पत्र के साथ एक सौ रुपये का नोट भी रखा था। निखिल देर तक उस नोट को देखता रहा, उसे मालूम था यह सौ रुपये मां ने अपनी जरूरतें काटकर बचाए होंगे। शायद इस महिने उसने अपने लिए नई चप्पल नहीं खरीदी होगी। शायद तेल कम खर्च किया होगा। शायद दवा टाल दी होगी। उसे लगा, वह नोट नहीं, मां की हथेली है, उसकी आंखें भर आई।
उसी शाम पिता का फोन आया। आवाज बुझी-बुझी थी।
बेटा—एक बात बतानी थी।’
‘हां बाबूजी?’
‘‘जो खेत गिरवी रखा था——उसका ब्याज बढ़ गया है। महाजन कह रहा था कि अगर इस साल पैसे नहीं लौटे तो जमीन अपने नाम कर लेगा।’’
कुछ क्षण चुप्पी रही।
फिर पिता ने जैसे अपनी ही बात हल्की करने की कोशिश की।
‘‘तू चिंता मत करना। पढ़ाई छोड़ने की बात मन में मत लाना। खेत फिर आ जाएगा—। लेकिन मौका बार-बार नहीं आता।’’
निखिल के गले में शब्द अटक गए।
उसे पहली बार लगा कि वह अकेला नहीं पढ़ रहा। उसके साथ पिता की जमीन पढ़ रही है। मां के गहने पढ़ रहे हैं। बहन की अधूरी इच्छाएं पढ़ रही हैं। पूरा घर परीक्षा दे रहा है।

फरवरी में पहला बड़ा मॉक टेस्ट हुआ। पांच सौ में निखिल की रैंक इस बार चार सौ बारह थी। वह देर तक नोटिस बोर्ड के सामने खड़ा रहा। ऐसा लगा, जैसे किसी ने उसके माथे पर लिख दिया हो, ‘असफल’।
कोचिंग के एक शिक्षक ने उसे रोक लिया।
‘‘क्या बात है? लगातार नीचे जा रहे हो।’’
निखिल चुप रहा।
शिक्षक ने फाइल पलटी।
‘‘तुम्हारा बेसिक कमजोर है।’’
‘‘सर—कोशिश तो कर रहा हूं।’’
‘‘कोशिश से कुछ नहीं होता। एक्स्ट्रा बैच जॉइन करो।’’
‘‘उसकी फीस?’’
‘‘पैंतीस हजार।’’
निखिल ने सिर झुका लिया।
शिक्षक आगे बढ़ गए।
उन्हें नहीं मालूम था कि उनके लिए यह केवल एक बैच था, लेकिन निखिल के लिए पैंतीस हजार का मतलब शायद घर की बची हुई आधी जमीन थी।
समीर अब पहले जैसा नहीं रहा था।
वह कम बोलता।
कम हंसता।
रात को कई बार नींद में बड़बड़ाता
‘रैंक—रैंक–मेरा नाम ऊपर कर दो–’
एक रात अचानक वह चीखकर उठ बैठा।
सांस तेज चल रही थी।
निखिल ने पानी दिया।
समीर ने कांपते हुए कहा।
‘‘मैंने सपना देखा—पिताजी खेत में खड़े हैं——मैं उनसे कह रहा हूं——बस एक साल और।’’
‘‘लेकिन खेत गायब हो गया—’’
उस रात दोनों देर तक जागते रहे।
कमरे में कोई आवाज नहीं थी।
फिर भी ऐसा लगता था, जैसे चारों ओर असफलताओं की धीमी सिसकियां गूंज रही हों। अब महीना बदला। माहौल भी बदल रहा था। मार्च के दूसरे सप्ताह में होली आई।
हॉस्टल के ज्यादातर लड़के घर नहीं गए।
कोचिंग वालों ने घोषणा कर दी थी। ‘‘त्यौहार बाद में भी आते रहेंगे, परीक्षा नहीं।’’
निखिल छत पर खड़ा था। दूर किसी बस्ती से ढोलक की आवाज आ रही थी। उसे याद आया। गांव में मां गुजिया बनाती थी। बहन जबरदस्ती रंग लगा देती थी। पिता हंसते हुए कहते, ‘‘अब तो अफसर साहब पर रंग डालो।’’
उसकी आंखें नम हो गई।
उसी समय मोबाइल बजा।
वीडियो कॉल थी।
मां ने कैमरा पूरे आंगन में घुमाया।
सूना आंगन।
रंग की खाली थाली। बहन ने मुस्कराकर कहा, ‘‘भैया, इस बार तेरे बिना होली फीकी है।’’
निखिल मुस्करा नहीं पाया।
कॉल कटने के बाद वह फूट-फूटकर रो पड़ा। शायद कई महीनों से जमा आंसू रास्ता ढूंढ रहे थे। कुछ दिनों बाद एक घटना ने पूरे हॉस्टल को हिला दिया। पड़ोस के कमरे में रहने वाला लड़का अपना सामान बांध रहा था।
‘‘घर जा रहे हो?’’ निखिल ने पूछा।
लड़के ने धीमे स्वर में कहा, ‘‘नहीं–घर नहीं।’’
‘‘फिर?’’
‘‘पिताजी को हार्ट अटैक आया है। इलाज के पैसे नहीं हैं। उन्होंने कहा ‘‘बेटा, पढ़ाई छोड़ कर लौट जा। दुकान संभाल लें।’’
उसने सूटकेस बंद किया। मुस्कराने की कोशिश की। ‘‘लगता है—मेरे हिस्से का अफसर किसी और को बनना था।’’
वह चला गया।
निखिल बहुत देर तक खाली बिस्तर को देखता रहा। कोचिंग में अगले दिन किसी ने उसका जिक्र नहीं किया।
जैसे वह कभी था ही नहीं। यहां आदमी नहीं, केवल रोल नंबर दर्ज होते थे। उस रात निखिल को पहली बार लगा कि यह शहर केवल सपने नहीं बेचता, चुप्पियां भी बेचता है।
यहां हर लड़का अपने भीतर टूटता है, लेकिन बाहर मुस्कराता है। क्योंकि सबको यही तो एक डर है। अगर उन्होंने अपनी थकान स्वीकार कर ली, तो लोग उन्हें कमजोर कह देंगे। लेकिन सबसे बड़ी विडंबना यही थी कि इस भीड़ में हर कोई कमजोर हो चुका था। मार्च की यह आखिरी रात थी। अप्रेैल का महीना आने वाला था।
निखिल अपनी मेज पर बैठा था। सामने मां का पत्र खुला था। बगल में पिता की तस्वीर। और किताब के बीच रखा वह पुराना सौ रुपये का नोट।
उसने धीरे से खुद से कहा।
‘‘क्या सचमुच मेरी पढ़ाई मेरे परिवार को बचा रही है—–या मैं अनजाने में उन्हें डुबो रहा हूं?’’
यह प्रश्न अब उसे सोने नहीं देता था। और उसे बिल्कुल पता नहीं था कि आने वाले कुछ दिनों में एक ऐसी घटना घटने वाली है जो उसके जीवन की दिशा ही बदल देगी।

अप्रैल की वह सुबह दूसरी सुबहों जैसी ही थी। वही भागते कदम, वही नोट्स और वही चेहरे, जिन पर सफलता का मेकअप और भय का पसीना एक साथ चिपका हुआ था लेकिन निखिल के भीतर कुछ बदल चुका था।
पिछली रात वह बिल्कुल नहीं सोया था। उसने किताबों से अधिक अपनी जिंदगी पढ़ी थी। मेज पर फैली कॉपियों के बीच उसे मां का पत्र, पिता की धुंधली तस्वीर और बहन की राखी दिखाई देती रही। पहली बार उसे लगा कि वह किताबों से नहीं, अपराधबोध से दबा हुआ है। उसी समय मोबाइल बजा।
गांव से पड़ोसी रामखेलावन चाचा का फोन था। ‘‘बेटा—–घबराना मत—तेरे बाबूजी खेत में बेहोश हो गए थे। डाक्टर कह रहा है कि चिंता बहुत करते हैं। अब ठीक हैं—लेकिन कमजोर हो गए हैं।’’
निखिल के पैरों तले जैसे जमीन खिसक गई। उसने उसी शाम घर जाने का निश्चय कर लिया। कोचिंग के कार्यालय में आवेदन दिया।
गांव में एक सप्ताह बिताते-बिताते निखिल ने खुद को बदलते हुए पाया।
सुबह खेतों में जाता। पेड़ों की छांव में बैठकर किताब पढ़ता।
किसी रैंक की चिंता नहीं।
किसी नोटिस बोर्ड का भय नहीं।
धीरे-धीरे उसे एहसास हुआ कि वह शहर में पढ़ रहा था। भाग रहा था। ज्ञान से नहीं, तुलना से। परीक्षा से नहीं, भय से। वह वापस शहर लौटा, लेकिन इस बार कोचिंग नहीं गया। हॉस्टल का कमरा खाली किया। पास ही एक छोटे से पुस्तकालय में बैठकर स्वाध्याय शुरू कर दिया।
पुरानी किताबें खरीदीं। ऑनलाइन व्याख्यान देखे। पिछले वर्षों के प्रश्नपत्र हल किए। अब उसका लक्ष्य केवल परीक्षा नहीं था। वह समझना चाहता था। ज्ञान को याद नहीं, आत्मसात करना चाहता था। समीर ने आश्चर्य से पूछा ‘‘कोचिंग छोड़ दी?’’
‘‘हां।’’
‘‘डर नहीं लगता?’’
निखिल मुस्कराया।
‘‘डर अब भी लगता है। लेकिन अब मैं डर के लिए फीस नहीं देता।’’ समीर पहली बार खुलकर हंसा। कुछ महीनों बाद परिणाम आया। निखिल का चयन नहीं हुआ। लेकिन इस बार वह टूटा नहीं।
रिसेप्शन पर बैठे कर्मचारी ने बिना उसकी ओर देखे कहा, ‘‘बीच में बैच छोड़ोगे तो फीस वापस नहीं मिलेगी।’’ निखिल मुस्कराया। कितनी अजीब बात थी। जिस संस्था में उसने अपने सपनों का सबसे बड़ा हिस्सा जमा किया था, वहां उसकी चिंता का मूल्य शून्य था, लेकिन फीस का हर रुपया सुरक्षित था।
उसे पहली बार समझ आया। यहां विद्यार्थी नहीं, ग्राहक प्रवेश लेते हैं।
गांव पहुंचा तो पिता चारपाई पर लेटे थे। चेहरे की झुर्रियां और गहरी हो गई थी। मां की चूड़ियां गायब थीं।
आंगन के कोने में खड़ी वह पुरानी भैंस भी नहीं थी। बहन ने धीरे से कहा,
‘‘भैया—–उसे बेच दिया।’’ निखिल के भीतर कुछ भरभरा कर गिर पड़ा। रात को उसने पिता का हाथ पकड़ा।
‘‘बाबूजी—-अगर मैं अफसर नहीं बन पाया तो?’’ रामदीन ने उसकी ओर देखा। बहुत देर तक देखते रहे। फिर धीमे से बोले, ‘‘बेटा———मैंने तुझे अफसर बनने के लिए नहीं पढ़ाया था। मैंने तुझे इसलिए पढ़ाया था कि तू हमसे बेहतर जिंदगी जी सके। पता नहीं कब लोगों की बातों में आकर मैंने अफसर और जिंदगी को एक ही चीज समझ लिया।’’
उनकी आंखें भीग गईं।
‘‘गलती मेरी भी थी। मैंने तेरे कंधों पर अपनी अधूरी इच्छाएं लाद दीं।’’ उस रात पहली बार पिता और बेटे दोनों रोए। लेकिन यह हार का रोना नहीं था। यह वर्षों से भीतर जमा बोझ उतरने का रोना था।
उसने अपनी गलतियां देखीं। उन्हें सुधारा। फिर तैयारी शुरू कर दी। बिना शोर, बिना दिखावे, बिना उस झूठे विश्वास के कि कोई संस्था सफलता बेच सकती है। और फिर अगले वर्ष उसका चयन एक प्रतिष्ठित सरकारी सेवा में हो गया। उसको नौकरी बहुत बड़ी नहीं मिली, लेकिन जो भी थी वह सम्मान जनक थी। गांव में मिठाई बंटी। लोग कहने लगे।
‘‘देखा—–कोचिंग का कमाल।’’
निखिल मुस्कराकर रह गया।
उसे मालूम था कि उसका चयन कोचिंग से नहीं, उस दिन हुआ था जब उसने भय से मुक्त होकर सीखना शुरू किया था।

कुछ वर्षों बाद———वह उसी शहर में फिर आया। चतुरगंज में। जहां कोचिंग के नाम पर खुली लूट चलती थी। वही सड़कें। वही होर्डिंग। वही वादे। वही कपट। बस कुछ चेहरे बदल गए थे। लेकिन सफलता बेचने वालों की भाषा नहीं बदली थी। वह अपने पुराने हॉस्टल भी गया। समीर अब वहां नहीं था। वार्डन ने बताया। वह तैयारी छोड़कर अपने शहर चला गया। अब सरकारी स्कूल में विज्ञान पढ़ाता है। बच्चों में बड़ा लोकप्रिय है।
निखिल के चेहरे पर मुस्कान आ गई। हर सफलता किसी कुर्सी का नाम नहीं होती। कुछ सफलताएं बच्चों की आंखों में चमक बनकर भी जीती है।
कुछ समय बाद निखिल ने अपने जिले में गरीब विद्यार्थियों के लिए एक छोटा सा मुक्त अध्ययन केन्द्र शुरू किया। वहां कोई एयरकंडीशनर नहीं था। दीवारों पर किसी टॉपर की तस्वीर नहीं लगी थी। कोई यह दावा नहीं करता था कि ‘‘हम सौ प्रतिशत चयन दिलाएंगे।’’ दरवाजे पर केवल एक वाक्य लिखा था, ‘‘यहां हम प्रतियोगी नहीं, जिज्ञासु विद्यार्थी तैयार करते हैं।’’ वह हर नए छात्र से एक ही बात कहता, ‘‘कोचिंग करना गलत नहीं है, लेकिन यह मत मान लेना कि तुम्हारी बुद्धि किराए के नोट्स में रहती है। सबसे बड़ा शिक्षक तुम्हारा अनुशासन, तुम्हारी जिज्ञासा और तुम्हारा स्वाध्याय है।’’
बच्चे ध्यान से सुनते। क्योंकि यह कोरा या खोखला उपदेश नहीं था।
एक ऐसे जुझारू युवक का अनुभव था, जिसने इस मकड़जाल में फंसकर बाहर निकलने की कीमत चुकाई थी।
और फिर मेहनत की मेहंदी तो रंग लाती ही है ना। उस वर्ष बरसात अच्छी हुई। रामदीन की गिरवी रखी जमीन वापस आ गई।
मां ने वर्षों बाद फिर वह आत्मविश्वास भरी चूड़ियां पहनीं। अब बहन भी बेखटके और उमंग भरी खुशी से कालेज जाने लगी।
और निखिल जब कभी खेत की मेड पर बैठता, तो उसे लगता। उसकी सफलता का सबसे सुंदर प्रमाणपत्र सरकारी नौकरी नहीं, बल्कि पिता के चेहरे पर लौटी हुई निश्चिंत मुस्कान—————

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