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राखी का तोहफा

कहानी
श्याम कुमार पोकरा

स्वाधीनता विशेषांक
अगस्त, 2026

भाई बहिन के स्नेह बंधन को मूर्त्त रूप देती एक भावपूर्ण कहानी

आज रक्षाबंधन है, हिन्दुस्तान का एक बड़ा त्यौहार। भाई बहन के पवित्र रिश्ते का पर्व। इस दिन बहनें भाइयों की कलाइयों पर राखियां बांधती हैं, मस्तक पर तिलक लगाती हैं, मिठाई खिलाती हैं, आरती उतारती हैं और उनके लम्बे व खुशहाल जीवन की मंगल-कामनाएं करती हैं। बदले में भाई-बहनों को आशीर्वाद देते हैं, राखी का तोहफा देते हैं और हर प्रकार से उनकी रक्षा करने का वचन देते हैं। घरों में पकवान बनते हैं, खाते हैं खिलाते हैं। सुबह से शाम तक चारों तरफ हर्षोल्लास छाया रहता है।
परन्तु आज मोरगंज कस्बे के एक कोने में बसे हुए इस छोटे से घर में मायूसी पसरी हुई है। शयनकक्ष में पलंग पर लेटा हुआ बूढ़ा व बीमार पिता शिवलाल रह-रह कर खांस रहा है, रसोई में मां पार्वती बर्तनों की साफ-सफाई में लगी है और बाहर बैठक में एक कुर्सी पर बेटी मीनू गहरी निराशा में डूबी हुई बैठी है। पिछले दिनों नीट की परीक्षा में लगातार तीसरे साल मिली असफलता की काली छाया अभी तक उसके चेहरे पर छाई हुई है। गहरी हताशा ने उसे चहूं ओर से जकड़ लिया है। अतीत की स्मृतियां बार-बार मस्तिष्क में उमड़-घुमड़ रही हैं और आंसू बनकर उसकी आंखों में छलछला रही हैं।

लगभग दो दशक पहले इसी घर में उसका जन्म हुआ था। जब उसने होश संभाला तब इस घर में उसके अलावा तीन सदस्य और थे, मम्मी, पापा और बड़ा भाई। जो उम्र में उससे पूरे आठ साल बड़ा था। जब उसने पहली कक्षा में एडमिशन लिया तब मोनू भैया आठवीं कक्षा पास कर चुका था। वह अपनी छोटी बहन से अत्यधिक स्नेह करता था। बचपन में मम्मी घर का काम करती थी और मोनू भैया उसे गोद में उठाये इधर-उधर घुमाता था। उसी ने उसे अंगुली पकड़कर चलना सिखाया था। मोनू भैया ने ही उसे पढ़ना-लिखना सिखाया था, साईकिल चलाना सिखाया था और पानी में तैरना सिखाया था। वह उसे भैया कहकर पुकारने लगी थी। मम्मी-पापा जब भी उसे डांटते डपटते वह दौड़कर भैया की शरण में जा दुबकती थी। मोनू भैया स्नेह से इसे गले लगा लेता था।
उम्र के साथ उन दोनों भाई-बहन के बीच का स्नेह बढ़ता गया था। उस वर्ष जब मोनू भैया ने बारहवीं की बोर्ड की परीक्षा 89 प्रतिशत अंकों से पास की तो पूरे मोरगंज में उसका नाम हो गया था। इस घर में उसे बधाइयां देने वालों का तांता लग गया था। मोरगंज के स्कूल में वह प्रथम स्थान पर रहा था और बोर्ड की मेरिट में उसने सातवां स्थान प्राप्त किया था। ‘शिव लाल कारीगर के बेटे ने मोरगंज का नाम रोशन कर दिया है।’ मोनू भैया की इस सफलता से पूरे कस्बे में उसके गरीब माता-पिता की भी पहचान बन गई थी। उसके भैया का नाम बोर्ड की मेरिट लिस्ट में आया है यह देखकर वह स्वयं को गौरवान्वित महसूस करने लगी थी। और मन ही मन उसने भी दृढ़ निश्चय कर लिया था कि पढ़ लिख कर वह भी अपने माता-पिता का नाम रोशन करेगी।
उसी वर्ष मोनू भैया को एक और बड़ी सफलता मिली थी। आई-आई-टी- की प्रवेश परीक्षा में उसका नाम मेरिट में आ गया था। और उसका एडमिशन आई-आई-टी- मुंबई में हो गया था। पापा ने बड़ी कठिनाई से मुंबई में उसके रहने, खाने-पीने व कालेज की फीस की व्यवस्था की थी।
अब मोनू भैया मुंबई में पढ़ने लगा था। वह घर से बहुत दूर चला गया था, परन्तु अपनी छोटी बहन के प्रति उसका स्नेह और बढ़ गया था। वह मोबाइल पर रोज उससे बात करता था, उसके हालचाल पूछता था और उसे पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करता था। जब भी कालेज की छुट्टियां होती, वह दौड़कर घर चला आता था। घर में कदम रखते ही सबसे पहले वह अपनी छोटी बहन को गले लगाता था, फिर मम्मी-पापा के चरण स्पर्श करता था। रक्षाबंधन के दिन किसी भी हालत में वह घर अवश्य आता था। शाम के समय वह मोनू भैया के हाथ में राखी बांधती थी, मस्तक पर तिलक लगाती थी और आरती उतारकर भैया को मिठाई खिलाती थी। इसके बाद मोनू भैया उसे राखी का कोई न कोई तोहफा अवश्य देता था। कभी वह छोटी बहन के लिए कपड़े लेकर आता था और कभी मोबाइल या घड़ी जैसी कोई वस्तु लेकर आता था।
मोनू भैया को इंजीनियरिंग करवाने में पापा ने अपनी पूरी शक्ति लगा दी थी। अपने जीवन भर की बचत उन्होंने बेटे की पढ़ाई में खर्च कर दी थी। पापा बचपन से ही मोरगंज में लकड़ी का काम करके अपनी आजीविका चला रहे थे। महात्मा गांधी चौराहे पर उनकी एक छोटी सी दुकान है जहां बैठकर वे दिनभर लकड़ी की खिड़कियां दरवाजे कुर्सियां व पलंग बनाते हैं। इस छोटी सी दुकान में ही उन्होंने कई बड़े कार्यो को अंजाम दिया है। लम्बे समय तक उन्होंने अपनी बीमार माता-पिता का इलाज करवाया था। उनके अन्तिम क्रिया कर्म किये थे। इस कस्बे में रहने के लिए यह छोटा सा मकान बनवाया था। और किसी तरह उन दोनों भाई बहन को पढ़ा रहे थे।
इंजीनियरिंग पास होते ही मोनू भैया की नौकरी मुंबई में ही टी-सी-एस- कंपनी में लग गई। जॉब में आकर मोनू भैया और अधिक समझदार व जिम्मेदार हो गया था। पहले ही महीने के वेतन से वह पापा के सिर पर चढ़ा हुआ कर्जा उतारने लगा था। मुंबई में अपने जीवन स्तर को उसने सामान्य बनाये रखा था। आर्थिक रूप से वह मम्मी-पापा की हर संभव मदद करने लगा था। छोटी बहन की पढ़ाई पर अब अधिक ध्यान देने लगा था। दसवीं कक्षा का उसका परिणाम देखकर वह अत्यधिक प्रसन्न हो गया था। नब्बे प्रतिशत अंक प्राप्त करके वह मोरगंज के स्कूल में प्रथम स्थान पर रही थी। विज्ञान विषय में उसे सबसे अधिक अंक प्राप्त हुए थे। जिसे देखकर मोनू भैया ने घोषणा कर दी थी-‘‘इसी तरह मेहनत करो, एक दिन तुम डॉक्टर बनोगी मीनू।’’
मोनू भैया की भविष्यवाणी को सुनकर उसे अपना लक्ष्य मिल गया था। आगे पढ़ने के लिए उसने जीव विज्ञान को चुन लिया था और पढ़ाई में जुट गई थी। मोनू भैया ने उसके पढ़ने के लिए कापी किताबें, टेबल चेयर, कूलर पंखा व चौबीस घंटे बिजली के लिए घर में इनवर्टर लगवा दिया था। मम्मी ने पढ़ने के लिए उसे घर के कामों से मुक्त कर दिया था। वह उसके खाने पीने का विशेष ख्याल रखने लगी थी। पापा भी अपनी मीनू बेटी को अधिक स्नेह करने लगे थे। समय-समय पर वे भी उसे पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करने लगे थे। दो साल का समय तेजी से गुजर गया था। उसकी मेहनत रंग लाई थी। बारहवीं की परीक्षा में उसे चौरासी प्रतिशत अंक प्राप्त हुए थे। मोरगंज के स्कूल में प्रथम स्थान पर रही थी, परन्तु नीट में उसे सफलता नहीं मिल सकी थी। कुछ ही नंबरों से वह मेरिट में आने से वंचित रह गई थी। यह खबर सुनकर मोनू भैया मुंबई से दौड़ा चला आया था। निराशा में डूबी हुई छोटी बहन को उसने हिम्मत बंधाई थी-‘‘तू बिल्कुल निराश मत हो मीनू। पी एम टी में सफलता प्राप्त करने में बच्चों को कई साल तक लग जाते हैं। एक साल तू नीट की कोचिंग कर ले, अगले वर्ष तुझे अवश्य सफलता मिल जायेगी।’’
दूसरे ही दिन मोनू भैया उसे कोटा ले गया था और भारी फीस देकर उसका एडमिशन स्टार कोचिंग इंस्टीट्यूट में करवा दिया था। उसके खाने पीने व रहने की व्यवस्था करके वह वापिस मुंबई लौट गया था। कोटा में उसे पढ़ने का वातावरण मिल गया था। चारों तरफ उसे जैसे पढ़ने वाले बच्चें की भीड़ थी, कई कोचिंग इंस्टीट्यूट थे, लड़के-लड़कियों के हॉस्टल थे, कॉपी किताबों की दुकानें थी। नई शान्ति के साथ वह फिर मन लगाकर पढ़ने लगी थी।
मुंबई से मोनू भैया मोबाइल पर रोज उससे बात करता था। वह उसके हालचाल पूछता था और उसे पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करता था। मोरगंज में वह अपने कमजोर व बूढ़े मम्मी-पापा का भी पूरा ख्याल रखता था। थोड़े ही समय में उसने पापा के सिर का कर्जा चुका दिया था। मुंबई में रहने के लिए फ्रलैट खरीद लिया था। मम्मी-पापा अब मोनू भैया का रिश्ता करने के लिए लड़की देखने लगे थे। हर वर्ष रक्षाबंधन के दिन मोनू भैया घर अवश्य आता था। वह अपनी छोटी बहन से राखी बंधवाता था, और बदले में उसे अच्छी सी गिफ्रट देता था।
लगातार दो साल तक मोनू भैया ने उसे स्टार कोचिंग सेंटर में पढ़ाया था। परन्तु दोनों ही वर्ष वह नीट में सफलता प्राप्त नहीं कर सकी थी। पिछले वर्ष वह सिर्फ एक प्रतिशत नंबरों से मेरिट में आने से वंचित रह गई थी। मुंबई से आकर मोनू भैया ने उसे फिर निराशा से उबारा था। उसने हिम्मत बंधाई थी और उसे एक साल और प्रयास करने के लिए तैयार कर लिया था। वह और अधिक शक्ति के साथ फिर पढ़ाई में जुट गई थी। लेकिन इस बार भी वह सिर्फ तीन नंबर से मेरिट में आने से वंचित रह गई थी। यह देखकर उसे गहरा सदमा लगा था, मन अवसाद ग्रस्त हो गया था। हीन भावना के कारण मोनू भैया से उसने बात करना बंद कर दिया था। मम्मी-पापा से अब और पढ़ने के लिए साफ इंकार कर दिया था। उसने हंसना-बोलना छोड़ दिया था। दिन भर वह एक स्थान पर बैठी रहती थी और निर्वात में ताकती रहती थी।

उन्हीं परिस्थितियों में कई दिन गुजर गये थे, और आज रक्षाबंधन का दिन आ गया था। आज मोनू भैया उससे राखी बंधवाने घर आयेगा। गहरी निराशा में जकड़े हुए उसके मन में कई दिनों के बाद थोड़े से उत्साह का संचरण हुआ। सुबह नहा धोकर वह जल्दी तैयार हो गई और राखियों की थाली सजाकर ड्राइंग रूम में सोफे पर आ बैठी। गहरी खामोशी के बीच मन ही मन वह मोनू भैया की प्रतीक्षा करने लगी थी। अनायास ही आज उसे भैया की यादें बहुत अधिक सताने लगी थी। भैया ही तो हैं जिसने विपत्ति में सदैव उसे संबल दिया था, साथ दिया था। नीट में उसे सफलता नहीं मिल सकी है तो इसमें मोनू भैया का क्या दोष है, उसने तो हमेशा उसका भला चाहा था। सुबह से शाम हो गई थी। परन्तु मोनू भैया अभी तक नहीं आया था। हताशा और निराशा के साथ अंधेरा उसे चारों तरफ से घेरने लगा था। सहसा मम्मी ने आकर कमरे की लाइट जलाई तो डूबे हुए स्वर में वह बोली,
‘‘लगता है मेरी किस्मत के साथ ही मोनू भैया भी मुझसे रूठ गया है मम्मी। आज वह भी मुझ अभागी से राखी बंधवाने नहीं आया है।’’
‘‘ऐसे मत बोल बेटी। तेरा बड़ा भाई ऐसा नहीं है। वह कभी तुझसे नाराज नहीं हो सकता है। तुझसे राखी बंधवाने वह जरूर आयेगा।’’
मम्मी ने स्नेह से उसके सिर पर हाथ रखा तो ममता के आंचल में मुंह छिपाकर वह फफक-फफक रो पड़ी। उसके रुदन को सुनकर पापा भी बाहर आ गये और उसके सिर पर हाथ रखकर अपनी मीनू बेटी को ढाढ़स बंधाने लगे। इसी समय द्वार पर घंटी बज उठी-‘टिंग-टोंग’। पापा ने आगे बढ़कर द्वार खोला और सामने मोनू को खड़ा देखकर सब प्रसन्न हो गये। मोनू भैया ने आगे बढ़कर उसे गले लगा लिया। फिर वह मम्मी पापा के चरण छूकर बोला,
‘‘सॉरी मीनू, टेªन लेट हो गई इसलिए मैं देर से पहुंचा हूं।’’
‘‘अब तुम जल्दी राखी बांध दो।’’
बहुत दिनों के बाद वह मुस्काई। उसने टेबल पर राखी राखियों की थाली उठा ली। मम्मी ने फर्श पर दरी बिछा दी। कंधे पर टंगे हुए बैग को एक तरफ पटककर मोनू भैया दरी पर पालथी मारकर बैठ गया। उसने भैया के मस्तक पर तिलक लगाया, उसकी दांई कलाई पर राखी बांधी और स्नेह से उसकी आरती उतारी। मुस्काते हुए मोनू भैया ने शर्ट की जेब में से एक कागज निकाला और थाली में रखकर बोला,
‘‘लो मीनू, यह रहा तुम्हारा राखी का तोहफा।’’
उसने भैया को ढोक लगाया और थाली में पड़ा कागज का टुकड़ा उठाकर सिर से लगा लिया। जैसे ही उसने कागज को खोलकर देखा वह चौंक पड़ी। यह महात्मा गांधी मेडिकल कालेज मुंबई में उसके नाम का सीट एलॉटमेंट लेटर था। विस्फारित नेत्रें से उसने मोनू भैया की ओर देखा तो तपाक से वह बोल पड़ा,
‘‘मैंने कहा था न मीनू कि एक दिन तुम डाक्टर बनोगी। महात्मा गांधी मेडिकल कालेज मुंबई में मैंने तुम्हारे लिए एम-बी-बी-एस- की सीट बुक करा दी है मीनू।’’
‘‘लेकिन वह तो एक प्राइवेट मेडिकल कालेज है बेटा। डोनेशन के बिना वहां मीनू का एडमिशन कैसे हो सकता है?’’
‘‘आप सच कह रहे हैं पापा। मीनू के एडमिशन के लिए मैंने कालेज को पूरे पचास लाख रुपयाें की डोनेशन दिया है। रुपयों के लिए मैंने अपना————-

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