लेख
डॉ. राम बहादुर व्यथित
— जाह्नवी जून 2026 अंक —
—पर्यावरण विशेषांक—
यह एक कटु सत्य है कि मनुष्य स्वयं अपने पर्यावरण में जहर घोल रहा है। सर्वविदित है कि वृक्ष मनुष्य के सबसे बड़े मित्र हैं, फिर भी वृक्षों का अन्धाधुंध कटान हो रहा है।
परि+आवरण=पर्यावरण। पृथ्वी के ‘परितः’ (चारों ओर का वातावरण) पर्यावरण है। पर्यावरण प्रकृति का अक्षय वरदान है, जिसमें हम सांस लेते हैं, जिसकी गोद में हमारी परवरिश होती है और जिसके संस्पर्श से हमें भौतिक एवं आध्यात्मिक शक्तियां प्राप्त होती हैं।
पृथ्वी का अमृत कवच
कौन चाहेगा पृथ्वी का अमृतमय कवच क्षीण हो जाये? हमें सांस लेने में कठिनाई हो? या मनुष्य एक बूंद जल के लिये तरसे? लेकिन यह एक कटु सत्य है कि मनुष्य स्वयं अपने पर्यावरण में जहर घोल रहा है। अपनी तात्कालिक सुख-सुविधाओं एवं अर्थ-प्राप्ति के लिये वह प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन कर रहा है और इस नैतिक -अनैतिक, आवश्यक-अनावश्यक, कानूनी-गैर कानूनी दोहन के कारण हमारे पर्यावरण का अमृत क्षीण हो रहा है और उसके गर्भ में हम विष के बीज बो रहे हैं। यह मानव जगत के भविष्य के लिये घातक सिद्ध होगा।
पावन देवभूमि पर वृक्षों का कटान
सर्वविदित है कि वृक्ष मनुष्य के सबसे बड़े मित्र हैं। वे हमारा पोषण करते हैं, प्राकृतिक विपदाओं से हमारी रक्षा करते हैं। वे जीवनदायी औषधियों के भण्डार हैं। फिर भी वृक्षों का अन्धाधुंध कटान हो रहा है। प्रशासन चुप्पी साधे हुए हैं। केवल नगरों में ही नहीं, तपःपूत पर्वत शृंखलाओं, मनोरम एवं रमणीय स्थलों एवं पवित्र तीर्थ स्थलों के भी वृक्ष काट-काट कर उन्हें नंगा किया जा रहा है। देखकर हृदय विदीर्ण हो गया। ट्टषिकेश एवं हरिद्वार जैसी पावन देवभूमि वृक्षों के कटान से आहत है। वहां की सुरम्य प्राकृतिक आभा नंगे, सपाट, बंजर भूखण्डों का रूप धारण कर रही है। ट्टषिकेश में गंगा के पावन तट जो अमृतमय, उत्ताल तरंगों से आच्छादित रहते थे आज एक-एक बूंद को तरस रहे हैं। मनुष्य की भूख सुरसा की भांति पनप रही है। उसकी तृष्णा ने गंगा की उमड़ती लहरों का गला घोंट कर वहां बांध बना दिये। मंदिरों के गोमुख सघन बाजार में परिणत हो गये। जहां वैदिक मंत्रें का उच्चारण होता था, वे सुरम्य स्थल टेªन एवं असंख्य मोटर वाहनों के घर्घर नाद एवं जहरीले धुएं से विषाक्त हो रहे हैं।
क्लोरो फ्रलोरो गैसों का उत्सर्जन
आज से 20-25 वर्ष पूर्व पैदल यात्र, साईकिल तथा रिक्शा का चलन था। आज एक घर में तीन-तीन वाहन हैं, जिसके प्रयोग से सड़कों पर जहरीले धुएं का साम्राज्य बना रहता है। जहरीली गैसों के उत्सर्जन से फेफड़े प्रभावित हो रहे हैं। मोटर वाहनों एवं बाइक के अनियंत्रित प्रयोग से नगरों का वायुमण्डल विषाक्त हो रहा है। फ्रिज एवं एयरकंडीशन संयंत्रें से असंख्य क्लोरो फ्रलोरो गैसों का उत्सर्जन हो रहा है, जिनसे प्रकृति का दिव्य कवच क्षीण हो रहा है। इसी को वैज्ञानिक भाषा में कहा जाये तो ओजोन की परत में छिद्र हो रहा है। यदि यह छिद्र इसी गति से बढ़ता गया तो सूर्य की तीक्ष्ण किरणें अपने संपूर्ण विषाक्त प्रभाव के साथ पृथ्वी पर पहुंचेगी जिससे हमारी त्वचा झुलस सकती है, नेत्रें की ज्योति क्षीण हो सकती है और ईश्वर प्रदत्त सौम्य, अमृतमय पर्यावरण जहरीला बन सकता है।
जल-प्रदूषण रोकिये
हम नदी को गंगा मां कहकर उसकी अर्चना, अभ्यर्चना करते हैं, लेकिन आचरण इसके विपरीत करते हैं। गंगा के तट पर मल-मूत्र विसर्जन करते हैं। स्नान पर्व का भव्य आयोजन होता है। आयोजन के उपरान्त हम टनों गन्दगी गंगा को सौंप जाते हैं। गंगा जल का अमृत तत्व इस बढ़ रही गन्दगी से समाप्त हो रहा है। अनेक तीर्थ स्थलों पर परीक्षण करने पर विदित हुआ कि गंगा जल प्रदूषित हो चुका है। असंख्य कल कारखानों और फैक्ट्रियों के नालों से बहने वाला अपशिष्ट जहरीला स्त्रव नदियों में प्रवाहित कर दिया जाता है। इसके भयंकर परिणाम सामने आ रहे हैं। यदि फैक्ट्रियों से निकलने वाला अपशिष्ट गंगा यमुना में ही प्रवाहित होता रहा तो ‘गंगा तेरा पानी अमृत’ सूक्ति मिथ्या हो जायेगी। भक्ति, श्रद्धा और विश्वास की त्रिवेणी कुण्ठित हो जायेगी।
जल का अपव्यय
जिन समृद्ध व्यक्तियों की कोठियों में ‘सबमर्सिबल पम्पिंग सेट’ लगे हैं वहां जल का घोर अपव्यय हो रहा है। टनों जल से उनके लॉन सींचे जा रहे हैं। टैंक भर जाने के बाद भी इन कोठियों और बंगलों से शुद्ध जल के परनाले बहते रहते हैं। उनके स्वामी टैंक भर जाने के बाद पम्पिंग सेट बंद नहीं करते। परिणामतः रात भर शुद्ध जल नालियों में बहता है। नगर पालिका की वाटर टैप टूट गई तो नहीं संभल सकती। टूटी टंकियों से निरन्तर जल प्रवाहित होता रहता है। उधर शुष्क मरुस्थलीय अंचलों में मनुष्य पानी को तरस रहा है। यदि शुद्ध जल का अपव्यय नहीं रोका गया तो जल संकट का सामना करना पड़ेगा।
प्रकृति के साथ अनावश्यक छेड़छाड़
प्रकृति के साथ अनावश्यक छेड़छाड़ के भयंकर परिणाम सामने आ चुके हैं। केदारनाथ में आई भयंकर बाढ़ को हम भूले नहीं हैं। इन प्राकृतिक आपदाओं से मनुष्य कोई शिक्षा ग्रहण नहीं करना चाहता। भगवान अमरनाथ की गुफा के ऊपर हैलीकॉप्टर उड़ रहे हैं। पावन तीर्थ स्थलों को पिकनिक स्पॉट ही नहीं मण्डी बनाया जा रहा है। फिर भगवान शिव का तृतीय नेत्र खुलने पर हम त्रहि-त्रहि क्यों करते हैं?
प्रत्येक नागरिक का पुनीत कर्तव्य
पर्यावरण को शुद्ध बनाये रखने का दायित्व प्रत्येक मनुष्य को वहन करना चाहिये। सरकार का दायित्व है कि कल-कारखानों एवं फैक्ट्रियों से निकल रहे जहरीले अपशिष्ट को गंगा में प्रवाहित होने से रोका जाय। समाज सेवी संस्थाएं गंगा तट पर गन्दगी फैलाने पर अंकुश लगवायें। गंगा में शवों को प्रवाहित करने की प्रथा को गैर कानूनी करार दिया जाये। अनुष्ठान एवं पूजा पाठ करने के बाद भक्तगण बची हुई सामग्री एवं विखण्डित मूर्तियां मां गंगा में प्रवाहित करने के स्थान पर विशाल गड्ढा खोद करके उसमें दबाने का कष्ट करें। हम आधुनिकता की होड़ में घर में तुलसी दल लगाना भूल गये। उसके स्थान पर कागज की फूलपत्ती और कैक्टस के पौधे आरोपित करते हैं। हम पुनः तुलसी, अशोक, आम्र और पीप्पल वृक्षों को आरोपित करके अपना पर्यावरण शुद्ध करें। फ्रिज और एयर कन्डीशन संयंत्रें के क्लोरो-फ्रलोरो कार्बन से मुक्ति के उपाय शीघ्र तलाश………
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