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प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में शिक्षण न होने के दुष्परिणाम

लेख
सरिता गुप्ता
जाह्नवी जून 2026 अंक


—-पर्यावरण विशेषांक—

हम स्वतंत्र भारत में वह कर दिखाये जो
अंग्रेज भी अपने लगभग 200 वर्ष के शासन में नहीं कर पाए। अर्थात् हमने पूरे देश में शिक्षा का माध्यम प्राथमिक कक्षाओं से ही अंग्रेजी में करने की अंधी दौड़ शुरू कर दी।

मानव विकास में शिक्षा की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। शिक्षा सदैव किसी न किसी भाषा के माध्यम से दी जाती है। प्रत्येक मानव स्वाभाविक रूप से अपने संस्कार एवं परिवेश से जिस भाषा को सहज रूप से ग्रहण करता है, उसे ही मातृभाषा कहा जाता है। यही मातृभाषा मौलिक चिंतन, अध्ययन, शोध का सर्वश्रेष्ठ माध्यम होती है, ऐसा विश्व के प्रायः सभी भाषाविद्, बाल मनोवैज्ञानिक एवं शिक्षा शास्त्री एकमत से स्वीकार करते हैं।
भारत विविधताओं का देश है। यहां लगभग 600 भाषाएं एवं सैंकड़ों बोलियां बोली जाती हैं। 22 भाषाओं को भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में मान्यता दी गई है, जिनमें हिंदी को भी शामिल किया गया है। ध्यान देने योग्य बात यह है कि अंग्रेजी इन 22 भारतीय भाषाओं में सम्मिलित नहीं की गई है, फिर भी भारत का यह दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि हमने स्वतंत्रता के सात दशक बीत जाने पर भी अंग्रेजी भाषा और अंग्रेजी माध्यम को नहीं छोड़ा।
सच तो यह है कि हमने तो स्वतंत्र भारत में वह कर दिखाया जो अंग्रेज भी अपने लगभग 200 वर्ष के शासन में नहीं कर पाए। अर्थात् हमने पहली कक्षा से अंग्रेजी पढ़ानी शुरू कर दी और धीरे-धीरे पूरे देश में शिक्षा का माध्यम प्राथमिक कक्षाओं से ही अंग्रेजी करने की अंधी दौड़ भी शुरू कर दी। इसी कारण आज प्राथमिक कक्षाओं में मातृभाषा के स्थान पर अंग्रेजी माध्यम से शिक्षण के दुष्परिणाम सामने आने लगे हैं। आइए इन पर सम्यक रूप से चर्चा करें।
प्राथमिक स्तर पर अंग्रेजी माध्यम से
शिक्षण के कारण

1- आज के दौर में हिंदी भाषा को असभ्य, अशिक्षित और गंवार समझा जाने लगा है, जिसके कारण हर व्यक्ति अंग्रेजी पढ़ना और बोलना चाहता है। अंग्रेजी न बोलने वालों के मन में कुंठा भाव स्थायी रूप से अंगद के पैर की तरह अपना स्थान बना चुका है।
2- उच्च स्तरीय शिक्षा में सभी विषय अंग्रेजी भाषा में पढ़ाए जाते हैं, जिस कारण हिंदी भाषी छात्रें को न तो अच्छी शिक्षा मिल पाती है और न ही अच्छी नौकरी।
3- हर माता-पिता अपने बच्चों को बचपन से ही अंग्रेजी माध्यम स्कूल में पढ़ाने में इसलिए रुचि रखते हैं, ताकि उनके बच्चों को प्रतिस्पर्धा के इस युग में पिछड़ना न पड़े।
मगर उपरलिखित बातों को अपनाकर हम क्या खो रहे हैं, उन पर गंभीरता से चिंतन करने की बहुत अधिक आवश्यकता है। हम सभी जानते हैं कि आज की शिक्षा पद्धति कहीं न कहीं दोषपूर्ण है, परन्तु इस बात को कोई भी खुलकर स्वीकार करने और कहने की पहल नहीं करता। सबसे पहला दोष यह है कि प्राथमिक स्तर की शिक्षा का, मातृभाषा को छोड़कर अंग्रेजी माध्यम में होना। पाठयक्रम कितना बाल मनोविज्ञान के अनुरूप है, इसकी बात तो बाद में आती है। भारत में अधिकतर जगह, जहां सामान्य व्यवहार की भाषा हिंदी है, मातृभाषा हिंदी है वहां छोटे-छोटे बच्चों को अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा देना कहां तक उचित है? आज प्राथमिक स्तर से लेकर उच्च स्तर तक की सारी शिक्षा अंग्रेजी माध्यम से होने में किसी को कोई बुराई नजर नहीं आती। हम क्यों नहीं समझ पा रहे हैं कि आज समाज में बिगड़ती संस्कृति का मूल आधार ही अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा है।
आज इस लेख के माध्यम से हम उन बिन्दुओं पर चर्चा करेंगे कि
प्राथमिक स्तर पर अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा से कौन-कौन से नुकसान हो रहे हैं:-
सबसे बड़ा नुकसान तो यह है कि हमारी संस्कृति का बहुत तेजी से क्षरण हो रहा है। केवल हिंदी ही नहीं, अपितु सभी भारतीय भाषाओं के इर्द-गिर्द भी संकट के काले घने मेघ छाए हुए हैं। आज हर उम्र का व्यक्ति अंग्रेजी बोलने में अपना गौरव समझता है, भले ही टूटी फूटी ही क्यों न बोले। आज के युवा नहीं समझ रहे कि जिस देश की भाषा मरने के कगार पर हो वह देश भी बहुत समय तक आत्मसम्मान के साथ खड़ा नहीं रह सकता। भाषा मरती है, तो साहित्य मरता है, साहित्य मरता है, तो संस्कृति मरती है और जब संस्कृति मरती है, तो धीरे-धीरे देश भी मरने लगता है।
सुधी जनों का मानना है कि छोटी उम्र का बच्चा गीली मिट्टी की तरह होता है, उसे हम जिस आकार में चाहे आसानी से ढाल सकते हैं, इसलिए बचपन से ही विदेशी भाषा की पढ़ाई में कोई बुराई नहीं। यदि हम बाल मनोवैज्ञानिक के मतों पर थोड़ा सा ध्यान दें तो हमें ज्ञात होगा कि बच्चों की गुणवत्ता और विकास की प्रक्रिया में आनुवांशिकी गुणों की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। कच्ची उम्र में अधिक बोझ डालने से विकास की गति अवरुद्ध हो जाती है। इस बात को नकारा नहीं जा सकता कि प्रारंभिक कक्षाओं में बच्चों का मानसिक विकास इतना अधिक भी नहीं होता कि वे हर बात को, हर भाषा को, आसानी से समझ सकें। वे खेल-खेल में जितना कुछ सीख सकते हैं, उतना दबाव में रहकर कभी नहीं। छोटे बच्चे बहुत गंभीरता से पढ़ने में सक्षम नहीं होते। रंग बिरंगी किताबें उन्हें अपनी तरफ आकर्षित तो कर सकती हैं, लेकिन उनके अंदर लिखी वह भाषा जो उनके लिए समझना आसान नहीं, वह उन्हें कम उम्र में ही पढ़ाई से विरक्त भी कर सकती है। बच्चों को एक ही बात बार-बार समझाने पर भी जब समझ नहीं आती, तो वे चिड़चिड़े हो जाते हैं। और उन्हें पढ़ाई बोझ लगने लगती है। इसके अनेक दुष्परिणाम हमारी उच्च आकांक्षाओं के कारण अबोध शिशुओं को भुगतने पड़ते हैं। बच्चे पढ़ाई से दूर भागने लगते हैं। रटा-रटाकर पढ़ाने की प्रक्रिया बालक की स्वाभाविक विकास की गति को बाधिक करती है। साथ ही बच्चे बहुत लंबे समय तक पाठ को स्मृति में भी नहीं रख पाते। बच्चा जो भाषा हर समय सुनता है, उसे सहज ही समझने भी लगता है और उसका शब्दकोश भी बढ़ता जाता है।
उदाहरण स्वरूप 2-3 वर्ष की आयु के एक बालक से कुछ घरेलू वस्तुओं के, खेल खिलौनों के, अपने आसपास रहने वाले जानवरों के नाम पूछे जाते हैं, तो बच्चा तत्काल उत्तर देकर उसकी ध्वनि के साथ-साथ उसकी उपयोगिता को भी उच्चारित करने का प्रयास करता है, जैसे वह जानता है कि कुत्ता भौंकता है और बिल्ली म्याऊं करती है। अब यह बात बच्चा अपनी भाषा में भली-भांति जानता है, लेकिन यही बात विदेशी भाषा में समझाने के लिए शिक्षक और परिवार के सदस्यों को पुरजोर कोशिश करनी पड़ती है। विदेशी भाषा में हम उतना ही कह पाते हैं, जितना हमें सिखाया जाता है और जितना हम याद रख पाते हैं, इस प्रकार प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से मौलिकता का क्षरण होेेेेता है। चिंतन करने की क्षमता कम होती जाती है। जो गुण कुदरत ने वरदान स्वरूप दिए हैं, वे उस बीज की तरह नष्ट हो जाते हैं, जिन्हें शुद्ध वायु और सूरज का प्रकाश नहीं मिलता।
नोबेल पुरस्कार विजेता प्रसिद्ध वैज्ञानिक सी.वी. रमन जी ने कहा था,
‘अगर अपनी मातृभाषा में शिक्षा दी जाती, तो भारत में नोबेल पुरस्कार विजेताओं की गिनती कहीं अधिक होती।
अगर हम चाहते हैं कि बच्चों का शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक अभिव्यक्ति का पूर्ण विकास हो, तो प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में ही जरूरी है। बच्चे अपना अधिक समय खेल में और कम से कम समय पढ़ाई में लगाना उचित समझते हैं। यही कारण है कि वे जिस भाषा में अपनी बात कहते हैं, उसी भाषा में बात करना उन्हें रुचिकर लगता है। हमें अपनी महत्वाकांक्षाओं का चोला उतार कर यह समझना होगा कि बच्चों की शिक्षा जितनी ज्यादा अनौपचारिक रूप से होती है, बच्चे उतने अधिक योग्य, स्वस्थ और हंसमुख होते हैं। इसीलिए अक्सर परिवार के सदस्य बच्चों के साथ जानबूझ कर तोतली बोली बोलते हैं। बच्चों को खेल-खेल में बड़ी-बड़ी बातें, जैसे नैतिकता, उदारता, भाईचारे का भाव, घर के कामों में सहयोग करना, अतिथियों का सत्कार जैसे गुण बाल्यावस्था में ही कूट-कूट कर भर दिए जाते हैं। बच्चे समझते हैं यही सही है, यही जीवन शैली है, वे बिना किसी के समझाए ये समझने लगते हैं कि इसके विपरीत किया गया आचरण अनुचित है, लेकिन यह सब अपनी भाषा में ही संभव हो सकता है। बचपन में ही अगर बच्चे की मातृभाषा पर पकड़ हो जाती है तो वह अन्य भाषाओं का ज्ञान भी आसानी से अर्जित कर सकता है। आज इस प्रतिस्पर्धा के दौर में बच्चों का सर्वांगीण विकास नितांत आवश्यक है। हमारे शास्त्रें में, संस्कृत में पहली पाठशाला परिवार को और पहली शिक्षिका मां को कहा गया है क्योंकि परिवार से ही बच्चों को संस्कारों का ककहरा सिखाया जाता है।
आज सुधीजनों का मानना है प्राथमिक स्तर पर अंग्रेजी भाषा के माध्यम से बच्चों को पढ़ाने से बचपन से ही अंग्रेजी भाषा को भी आसानी से समझने लगते हैं और उन्हें आगे जाकर उच्च स्तरीय शिक्षा के समय कोई दिक्कत नहीं आती। मगर मैं कभी इस कथन का समर्थन नहीं कर सकी। बच्चे भोले और मासूम होते हैं। उन्हें वह नहीं समझ आता, जो उन्हें सिखाया जाता है, बल्कि वे वह सब सीखते हैं, जो वे देखते हैं। हम हिन्दुस्तानी हैं हम उच्च शिक्षा पाकर भी हिंदी या किसी भारतीय भाषा में ही बेहतर तरीके से अपने भावों की अभिव्यक्ति करने में सक्षम हैं। बड़े से बड़े पदाधिकारी अपने घर में अपनी बोली (क्षेत्रीय भाषा) में बोलते हैं और खुद को हल्का महसूस करते हैं। कारण स्पष्ट है कि अपनी भाषा में अपनी बात कहते हुए हमें शब्द ढूंढने नहीं पड़ते। पावन जलधार की तरह स्वतः ही बात बनती चली जाती है।
अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा
बच्चे के दोहरे जीवन की शुरुआत

आज आधुनिकता के दौर में हमें यह स्वीकारना ही होगा कि अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा के साथ बच्चे के दोहरे जीवन की शुरुआत हो जाती है। वह समझ नहीं पाता उसे कब क्या बोलना है? उदाहरण स्वरूप एक पढ़ी लिखी मां अपने बच्चे को गाय के लिए काउ सिखाती है और दादी गैया। गाय को गैया कहे या काउ एक छोटा बच्चा दो भाषाओं के बीच में बचपन से ही उलझ कर रह जाता है।
आज परिवर्तन के इस दौर में माता-पिता और शिक्षक के ऊपर बहुत बड़ी जिम्मेदारी आ गयी है। आज बच्चों को संस्कार भी देने हैं और आधुनिक भी बनाना है। इसलिए कुछ महत्वपूर्ण फैसले हमें आज लेने होंगे, तब लगभग एक पीढ़ी बाद उन फैसलों के सुपरिणाम हमारे सामने आने शुरू होंगे।
समस्या के समाधान
के उपाय

1- हम आज जिस नियमानुसार, विशेष रूप से छोटे बच्चों को शिक्षित कर रहे हैं, उसमें कुछ बदलाव करने होंगे। कम से कम पांचवी कक्षा तक की शिक्षा सरकार द्वारा मातृभाषा में अनिवार्य घोषित कर देनी चाहिए।
2- अंग्रेजी भाषा को एक विषय के रूप में रखा जाए, ताकि आगे जाकर बच्चे अंग्रेजी भाषा भी आसानी से पढ़ सकें, समझ सकें। लेकिन छोटे बच्चों को इंग्लिश स्पीकिंग के लिए बाध्यता किसी भी प्रकार उचित नहीं।
3- प्राथमिक शिक्षा के दौरान बच्चों को अपनी मातृभाषा में ही धर्म-कर्म के नियम, नैतिकता और संस्कृति को अपनाने के लिए प्रेरित किया जाना बहुत जरूरी है। बाल्यावस्था में मन एक कोरे कागज की तरह होता है, उस पर लिखा हुआ अमिट होता है। जब बच्चा अपनी भाषा में अपने विचारों और भावनाओं की अभिव्यक्ति करना सीख जाता है, तो उसकी पढ़ाई-लिखाई में भी रुचि बढ़ती जाती है और कठिन विषयों को भी वह आसानी से समझने लगता है।
4- हमें यह भी समझना होगा कि छोटी उम्र में विदेशी भाषा सिखाने से धन की बर्बादी और बाल मन पर कुठाराघात करने जैसा है। भारत सरकार द्वारा समय समय पर गठित सभी शिक्षा आयोगों जैसे कोठारी आयोग, डॉ. राधाकृष्णन आयोग तथा प्रो. यशपाल समिति ने भी प्राथमिक स्तर पर केवल मातृभाषा सिखाने पर ही बल दिया है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने कड़े शब्दों में कहा था कि ‘‘यदि मैं तानाशाही होता, तो आज ही विदेशी भाषा को शिक्षा से पूरी तरह बहिष्कृत कर देता।’’
5- सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हिंदी को अच्छे रोजगार से जोड़ने के सफल प्रयास होने चाहिए क्योंकि जीवन समर में सबसे बड़ा संघर्ष है, जरूरतों को पूरा करना। जब सारे अच्छे रोजगार के रास्ते खुले होंगे तो व्यक्ति के मन का कुंठा भाव दूर होगा और अपनी मातृभाषा को पढ़ने और बोलने के लिए अंग्रेजी स्कूलों के अधीन नहीं रहेगा। यदि अंग्रेजी माध्यम स्कूलों की मान्यता रद्द कर दी जाए और हर वर्ग के बच्चे सरकारी स्कूलों से ही शिक्षा प्राप्त करने लगें, तो मातृभाषा के ऊपर मंडराते संकट के बादल स्वतः ही छंट जाएंगे।
निष्कर्षतः
मेरा मानना है माता पिता और शिक्षक से बेहतर बाल मनोवैज्ञानिक कोई अन्य नहीं हो सकता। अतः हमें बाल मनोवृत्ति को……………….इस लेख को पूरा पढ़ने के लिए जाह्नवी का जून 2026 अंक देखें

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