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प्रकृति का विद्रोह-विकास के नाम पर विनाश


पर्यावरण लेख
मंजु कुमारी मिश्रा
जाह्नवी जून 2026 अंक
पर्यावरण विशेषांक


हमारे तीर्थस्थल जिसे हम देवभूमि कहते हैं वह भी कचड़ा, गंदगी और प्रदूषण से मुक्त नहीं है। गंगा, यमुना जैसे पवित्र नदियों के तट पर, कहीं भी प्रकृति प्रेम, शुद्धता और शांति नहीं बचा है। हर तरीके से पर्यावरण को बर्बाद किया जा रहा है।

पर्यावरण यानि हमारे आसपास का परिवेश-प्रकृति, जो मनुष्य, पशु-पक्षी, पेड़-पौधे, हवा, जल, भूमि, पहाड़, पर्वत सभी जैविक और अजैविक घटकों का एक मिश्रण है, जो सीधे तौर पर हमारे जीवन को प्रभावित करती है। आज हम लोग विकास के नाम पर अंधाधुन तरीके से प्रकृति को नष्ट कर विनाश की ओर आगे बढ़ रहे हैं। पर्यावरण की बात कोई नहीं करता है। मीडिया, सोशल मीडिया, समाचार वाले कोई भी इस गंभीर विषय पर बात नहीं करता है या यूं कहें कि जानबूझ कर नजरअंदाज करते हैं। देश के बड़े-बड़े पूंजीपतियों और बड़े लोग मिलकर प्राकृतिक संसाधन को बर्बाद कर रहे हैं। बड़ी-बड़ी कंपनियां पर्यावरण में 50» तक कार्बन डाईऑक्साइड बढ़ाने के लिए जिम्मेदार हैं। जिससे जलवायु परिवर्तन हो रही है, जो वर्तमान और आने वाली पीढ़ियों के लिए विनाशकारी है। तापमान बढ़ चुका है, ग्लेशियर पिघल रही है, जंगलों की लगातार कटाई हो रही है, नदियां सूख रही हैं। बदलते पर्यावरण का प्रभाव फसलों, पशु-पक्षी, पहाड़-पर्वत, मानव (विशेषकर गरीबों) इन सभी पर पड़ रहा है। पर पर्यावरण संरक्षण के लिए कोई कार्य नहीं हो रहा है। किसी को भी प्रकृति से प्रेम नहीं है, पूरी मनुष्यता प्रकृति को लुट रही है।
भारत में तापमान
बड़े-बड़े देशों के बीच हो रहे युद्ध में लड़ाकू विमान, हवाई बम, सैन्य उपकरण, ड्रोन, सैन्य ईंधन, मिसाइल आदि के उपयोग तथा पेट्रोल कार और बाईक के अत्यधिक उपयोग से लगातार पर्यावरण में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्र बढ़ती जा रही है, जिससे पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है। अप्रैल 2006 के रिकॉर्ड में दर्ज किए गए 100 सबसे गर्म शहरों में 95 भारत में है जहां की तापमान 45ंब् तक पहुंच गई है। तापमान में वृद्धि होने पर बहुत सी प्रजातियां विलुप्त होने के कगार पर आ चुकी है, जो हमारे परितंत्र के लिए बहुत ही हानिकारक है। तापमान में वृद्धि होने के कारण ग्लेशियर पिघल रहे हैं और नदियां सूखने के उच्च जोखिम में आ चुकी है। जब ग्लेशियर पिघलता है तो जमी हुई परतें टूटती हैं और इन परतों के नीचे मौजूद मिथेन गैस बाहर निकलकर वातावरण में पहुंच जाते हैं। कार्बन डाईऑक्साइड और मिथेन गैस का बढ़ना जलवायु परिवर्तन के सबसे बड़े कारक हैं।
हर तरीके से पर्यावरण को बर्बाद किया जा रहा है
आज विकास के नाम पर बड़े पैमाने में वनों की कटाई हो रही है, जिससे भूमि की जल धारण करने की क्षमता कम होती जा रही है और गर्मी बढ़ रही है। पहाड़ी क्षेत्रें पर सड़क विस्तार परियोजनाओं के लिए बड़े पैमाने पर पेड़ों और पहाड़ों की कटाई हो रही है, जिससे पहाड़ी परिस्थितियों पर गंभीर प्रभाव पड़ रहा है। पहाड़ी क्षेत्रें जैसे दार्जलिंग, लद्दाख, सिक्किम आदि स्थानों पर लोग घूमने के लिए जाते हैं और उन स्थानों को कचड़ों से भर देते हैं, जो पहाड़ों के लिए अत्यधिक हानिकारक है। उनमें लगभग 70» कचड़ा पुनर्चक्रण योग्य नहीं है। सालों साल लाखों टन कचड़ा समुद्र में पहुंच रहा है जो भारी मात्र में समुद्री जीव-जंतु और वनस्पतियों को नुकसान पहुंचा रहे हैं। यहां तक कि हमारे तीर्थस्थल जिसे हम देवभूमि कहते हैं वह भी कचड़ा, गंदगी और प्रदूषण से मुक्त नहीं है। गंगा, यमुना जैसे पवित्र नदियों के तट पर भी लोग फूहड़ शोर मचाते हैं। कहीं भी प्रकृति प्रेम शुद्धता और शांति नहीं बचा है। हर तरीके से पर्यावरण को बर्बाद किया जा रहा है। जिस कारण प्रकृति विद्रोह कर रही है पर हम इसे देख कर भी अनदेखा कर रहे हैं।
यह कैसा विकास है? जो हमारे ही विनाश का कारण है।
हम विकास और ळक्च् बढ़ाने के नाम पर विरासत में मिली प्राकृतिक संसाधन को लुट रहे हैं। यह कैसा विकास है? जो हमारे ही विनाश का सबसे बड़ा कारण है। हम अपनी जी डी पी बढ़ा रहे हैं-पहाड़ काट कर जंगल बरबाद करके नदियां सुखाकर तापमान बढ़ाकर। हम अपनी आने वाली पीढ़ी को क्या देकर जाएंगे? हम विरासत में मिले संसाधन को तो नष्ट कर ही रहे हैं साथ ही भविष्य के लिए जो संसाधन होने चाहिए उन्हें भी बर्बाद कर रहे हैं। हम अपनी आने वाली पीढ़ी को क्या देकर जाएंगे, हम विरासत में मिले संसाधन को तो नष्ट कर ही रहे हैं साथ ही भविष्य के लिए जो संसाधन होने चाहिए उन्हें भी बर्बाद कर रहे हैं। हम अपनी आने वाली पीढ़ी का भविष्य नष्ट कर रहे हैं। 1992 से 2014 के बीच वैश्विक प्राकृतिक पूंजी प्रति व्यक्ति………………………

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