कहानी
प्रो. आनंद प्रकाश त्रिपाठी ‘रत्नेश’
स्वाधीनता विशेषांक
अगस्त, 2026
एक पीढ़ी ने बेटी के जन्म को दुर्भाग्य पूर्ण माना था। आज बेटी अधिक सेवा भावी सिद्ध हो रही है।
उपेक्षिता ने जब मायके के दरवाजे पर दस्तक दी। दरवाजा खुला। सामने अर्चना भाभी अवाक और स्तब्ध खड़ी थी। दोनों निस्तब्ध एक दूसरे को क्षण भर अपलक देखते रहे। अर्चना भाभी को इस दृश्य की कल्पना तक नहीं थी।
‘‘भाभी क्या बात है? अंदर आने को नहीं कहोगी? तैयार तो इस तरह हो, लगता है कहीं जाने की योजना है,’’ उपेक्षिता बोल पड़ी।
‘‘अरे अंदर आओ दीदी। यह आपका ही घर है। अपने घर में हैं इजाजत लेने की जरूरत नहीं होेेती है।’’ यह कहते हुए अर्चना जब उसे घर के अंदर ले आई तो भाई और दादी को भी तैयार देख वह प्रश्न कर बैठी, ‘‘लगता है आप लोगों को कहीं जाना है। मैं जाती हूं, फिर कभी आ जाऊंगी।’’
अब तक भाई रोहित दीदी के आने का कारण सोच रहा था किन्तु जब उसे कुछ याद नहीं आया तो वह बोला, ‘‘दीदी, अचानक कैसे आना हुआ? मुझे बता देती तो मैं तुझे लेने आ जाता।’’
‘‘तुम तो कुछ मत बोलो। दीदी के प्रति ज्यादा प्यार मत दिखाओ। बहुत दूर नहीं हूं। तेरी तीनों बहनों में सबसे नजदीक मैं ही हूं। तीन सालों में राखी तक बंधवाने कभी नहीं आया और कहता है लेने आ जाता। मम्मी पापा की दुर्घटना में मौत के तीन साल हो गए। तब मैं यहां आई थी। उसके बाद किसी ने मेरी खबर ली क्या? दादी की ओर मुखातिब होकर पूछा, ‘‘दादी याद है अपनी उपेक्षिता को कभी-कभी याद कर लिया करो। स्मरण करो दादी यह नाम भी आप का ही दिया हुआ है।’’ यह कहते हुए जब वह दादी के पास गई तो देखा कि दादी की अश्रुधारा बह रही थी। दादी को रोता देख उनके आंचल में मुंह छुपा कर वह भी सुबक पड़ी। दोनों को रोता देख अर्चना भाभी से नहीं रहा गया। उन्होंने दोनों को अलग करते हुए कहा, ‘‘आप दोनों रोते ही रहोगे या मुझे कुछ खाने-पीने की तैयारी करने का आदेश दोगे।’’
‘‘हां बेटा! घर की बेटी तीन साल बाद घर में कदम रखी है। उसका तो स्वागत होना ही चाहिए। ऐसा है तू इसका प्रिय नाश्ता पोहा, प्याज के पकौड़े और अदरक वाली चाय जल्दी तैयार कर लो।’’ दादी ने अपने आंसुओं को नियंत्रित करते हुए कहा।
यह सुनकर उपेक्षिता क्षण भर विस्मित रही और फिर दादी से पूछी, ‘‘दादी! मेरे लिए प्रिय-अप्रिय क्या है, आपको कैसे पता? आपको तो मैं फूटी आंख नहीं सुहाती थी।’’
यह सुनकर दादी चिंतन में डूब उठी। पिछली घटनाएं चलचित्र की तरह उनके सामने आने लगी। जब यह अपनी मां के पेट में आई थी तो मैंने कितने अरमान सजाएं थे। दो बेटियों के बाद मैं पोते का सुख प्राप्त करूंगी। किस तरह मैंने इसकी मां को यह हिदायत दे रखी थी कि मुझे तो हर हालत में पोता ही चाहिए। मैंने तो उसे यहां तक कह रखा था यदि घर में पोती लाई तो मेरा मरा हुआ मुंह देखोगी। यह सब कहते हुए मैं यह नहीं समझ पाई थी कि वह कितने दबाव में थी। मेरे दबाव के कारण ही उसने अपने मायके में संतान को जन्म देना उचित समझा। मेरे बेटे ने भी उसका साथ यह कहते भी दिया कि ‘मां! मैं उस समय बाहर रहूंगा। तू अकेले सब कैसे कर सकेगी?’
जिस दिन पोती होने की खबर मिली उसी दिन उसी समय मेरे भाई के मौत की खबर मिली। मेरा वह भाई जो मेरे लिए सब कुछ करने के लिए तैयार रहता था। उसके मौत की खबर ने मेरे दकियानूसी विचार को और अधिक मजबूत कर दिए। यह बेटी, बेटी नहीं अपशगुन है। इस परिवार के लिए कलंक है और मैंने सदैव इसको तिरस्कृत किया, उपेक्षित किया। यहां तक कि मम्मी-पापा, नाना-नानी के द्वारा दिये गये नाम अपराजिता को उपेक्षिता के रूप में जबरन परिवर्तित कर दिया। इसके होने पर मैंने मातम मनाया था और इसके बाद पोते रोहित के होने पर मैंने बहुत बड़ा जलसा किया था। चारों बच्चों में मैंने इसके प्रति कितना सौतेला व्यवहार किया। हर समय इसे डांटती-मारती और बात-बात पर उलाहना देती। किस तरह इसके बचपन को मैंने नर्क बना दिया था। फिर भी यह बच्ची आज दादी से मिलने आई है और यही नहीं तीन साल पहले मैंने इसके पति को यह कह कर उसे घर से निकाल दिया था कि इस घर की देहरी पर कभी कदम मत रखना।
वह यह यब सोच ही रही थी कि तब तक नाश्ता आ गया। ‘‘दादी कहां खो गई बात करते-करते, किस दुनिया में चली गई।’’ उपेक्षिता के स्वर दादी के कान में गूंजे और वह बोल पड़ी-‘‘कुछ नहीं रे, तेरे बारे में सोचने लगी थी। मैंने बचपन में तुझे कितना सताया था, कितनी यातना दी थी। वही सब सोच रही थी। अच्छा बता तेरे पति कहां हैं, कैसे हैं?’’
‘‘अरे दादी! वह यहीं हैं। मेरे साथ आए हैं।’’
‘‘तेरे साथ आए हैं? पर कहां हैं? तू उन्हें अंदर क्यों नहीं लाई।’’
‘‘दादी अंदर कैसे लाती? आपने तीन साल पहले क्या कहा था?’’
दादी फिर से एक बार अपने आंसुओं को रोकते हुए पोते रोहित से कहा, ‘‘बेटा! जा कुंवर साहब को ससम्मान घर के अंदर ला। आज मैं उनका तिलक करूंगी। स्वागत करूंगी और अपनी गलतियों की माफी मांगूगी।’’ थोड़ी देर बाद उनके घर के अंदर आने पर दादी उनके पैरों पर गिरकर क्षमा मांगना चाहती थी किन्तु उन्होंने दादी के पैरों में नतमस्तक होकर आशीर्वाद मांगा। नाश्ते के बाद उपेक्षिता बोली, ‘‘दादी मेरे घर चलो। हम आपको लेने आए हैं। आपको किसी वृद्धाश्रम में जाने की जरूरत नहीं है। आपकी यह पोती अभी जिंदा है। वह अपनी दादी का अच्छा ख्याल रख सकेगी। आप लोगों ने हमें सूचना तक देना उचित नहीं समझा।’’
‘‘पर बेटी तुझे पता कैसे चला? सचमुच हम सबने तुझे सूचना नहीं दी, तेरी बड़ी दोनों बहनों को बताया था। उन दोनों ने हाथ खडे़ कर दिए। तुझे कैसे पता चला?’’
‘‘दादी! जिस वृद्धाश्रम में आपको जाना था उसके मालिक मेरे पति के मित्र हैं। मेरे पति ही वहां का ऑडिट करते हैं। उन्हें कल शाम को पता लगा और हम सबने रात में विचार किया कि दादी को घर लाना है।’’ यह सुनकर दादी को मानो काटो तो खून नहीं।
घर की ड्योढ़ी के बाहर निकलते हुए वह सोच रही थी कि घर की जिस बेटी को संसार में कदम रखने के पहले मैं मार देना चाहती थी। जिसको मैंने उपेक्षिता जैसा कलंकित नाम दिया। आज वही घर की बेटी मेरा सहारा ———————————-
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