कहानी
कमलेश शर्मा
स्वाधीनता विशेषांक
अगस्त, 2026
पत्नी के दबाव में बुढ़िया माँ को वृद्ध आश्रम भेज दिया, लेकिन एक दिन एक घटना से हृदय परिवर्तन हो गया।
आज फिर अम्मा को देख बच्चे अंदर भागे, ‘‘पापा। पापा, वह अम्मां फिर आ गई। इन्हें देख हमें डर लगता है पापा।’’ राजकुमार ने जेब से कुछ पैसे निकाल अम्मां को थमाए, कानों में कुछ फुसफुसाया। शायद कह रहे थे, ‘‘यहां मत आया करो अम्मा। बच्चे आपकी भयानक सूरत देख डर जाते हैं। मुझे चिंता है आपकी। तभी तो आपको नजदीक के आश्रम में रखा है। आश्रम में मैंने पंखे कूलर सब लगवा दिए हैं ताकि आपको कोई परेशानी न हो। बस आप वहां के संचालकों को और मेरे बच्चों को कभी अपने और मेरे रिश्ते के बारे में मत बताना। परी के बारे में तो आप जानती ही हैं, वह तो शादी के लिए राजी ही इसी शर्त पर हुई थी, कि वह न तो संयुक्त परिवार में रहेगी, न ही कभी आपको अपने पास रख पाएगी। आपका डरावना चेहरा उसे कभी पसंद नहीं आया। अपनी व अपने परिवार की सुंदरता पर उसे नाज है। आपकी बंद आंख, सांवला रंग, झुर्रियों भरा चेहरा बच्चों को भी नहीं भाएगा।’’
इसीलिए उसने बच्चों को बता रखा है कि उनकी दादी विदेश में रहती है। शुक्र है, मैं पापा पर गया हूं, वर्ना वह मुझसे शादी कभी न करती।
‘‘सच कहते हो बेटा, मैं तुम्हारी मजबूरी समझती हूं। पर बच्चों को देखने की इच्छा होती है तो चली आती हूं। उन्हें भागते-दौड़ते देखती हूं तो तसल्ली होती है कि मेरे पोते-पोतियां स्वस्थ हैं, खुश हैं। हालांकि उनके लिए तो मैं वृद्धा आश्रम में रहने वाली अम्मा हूं। मेरे तेरे और बहू के सिवाय हमारे रिश्ते के बारे में जानता भी कौन है। आश्रम में रहने वाले सभी लोग तुम्हें भगवान से कम नहीं मानते।’’ तभी अंदर से किसी के बड़बड़ाने की आवाज आई ‘‘ओफ्रफो। येेेेे बुढ़िया न जाने कब पीछा छोड़ेगी।’’
‘‘जा रही हूं बेटा, अब नहीं आऊंगी।’’ डंडी के सहारे अपने शरीर को घसीटती, अम्मा भूतकाल के ख्वाबों में खोई, आश्रम की ओर चल दी। अक्सर वह वहां अकेले बैठी रहती। उदास हो जाती आंखों में आंसू लिए कई भावनात्मक दौर से गुजरती। दूसरों के सामने तो शहद में घुली बातें होती, अकेले में उतनी ही कड़वाहट उगली जाती। हर बात में यही बात दुहराई जाती कि मैं बदसूरत हूं। इतनी बदसूरत की किसी को अच्छी लग ही नहीं सकती।
जिस दर्द को जिसने झेला होता है, उस दर्द का अंदाजा कोई और नहीं लगा सकता। 10-15 वर्ष पहले की ही बात है, अम्मा इसी हवेली की मालकिन थी। पति और बेटे के साथ हंसी खुशी समय बीत रहा था। इकलौता बेटा राजकुमार, पिता की तरह ही सुंदर, स्वस्थ, रोबदार, मां का लाडला पूरा दिन मां के आगे पीछे घूमता रहता। पल भर को भी मां की आंखों से ओझल न होता। नाम भी रखा, राजकुमार। सच में वह राजकुमार ही था।
ऐशो-आराम, नौकर-चाकर की कमी नहीं रही थी उसे। आज जैसी वह दिख रही थी, ऐसी कभी न थी। कर्नल साहब तो उसके सांवले रंग पर ही फिदा रहते। उनके अनुसार तो सुंदरता मन की होनी चाहिए तन की नहीं।
उन दिनों इसी हवेली का नाम चल रहा था, जब पति के शहीद होने की खबर आई थी। हवेली का अधूरा काम रुक गया। जगह-जगह लोहे के सरिए निकले हुए थे। मकर संक्रांति के दिन, छत पर बच्चे पतंग उड़ा रहे थे। राजकुमार भी उनमें शामिल था। एक कटी पतंग का पीछा करते-करते वह लोहे की छड़ से टकरा धड़ाम से नीचे आ गिरा। साथी बच्चे इधर-उधर भाग गए। नीचे पड़े सरियों में एक सरिया राजकुमार की आंख में धंस गया। अम्मा ने देखा तो उसके होश उड़ गए। गनीमत है घर का नौकर रामदीन घर पर था, आनन-फानन में उसने राजकुमार को अस्पताल पहुंचा दिया। अब उसकी जान को तो खतरा नहीं था, पर उसकी एक आंख बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुकी थी। एक के बाद एक परेशानी अम्मां का पीछा कर रही थी। पहले पति की शहादत, फिर हवेली का रुका काम, अब राजकुमार के साथ ये हादसा। डाक्टरों ने साफ कह दिया कि उसकी एक आंख की रोशनी जा चुकी है। आगे का जीवन उसे एक आंख से गुजारना होगा।
घर बाहर का दोहरा दायित्व, उस पर बेटे का भविष्य। अम्मा के संघर्षो का दौर खत्म होने का नाम नहीं ले रहा था। आर्थिक परेशानियों से जूझती अम्मा को हल नहीं मिल पा रहा था। मां तो मां थी। कैसे हार मान लेती। उसे उपाय सूझा, अंदर जा उसने डाक्टर से बात की। डाक्टर के समझाने बुझाने पर भी अम्मा नहीं मानी, आखिर बेटे के भविष्य का सवाल था। पिता का साया भी सिर पर नहीं था, वह कैसे उसे उम्र भर संभालेगी, पढ़ाएगी, लिखाएगी।
समाधान मिल चुका था। अम्मा ने तय कर लिया था, वह अपनी एक आंख बेटे को लगवा उसका भविष्य संवारेगी। वह जानती थी कि भावनात्मक जरूरतें, अकेलापन, आर्थिक मुश्किलों का सामना उसे अकेले ही करना है।
उसका फैसला अडिग था। अम्मां के फैसले पर डॉक्टर ने भी अमल किया। अम्मां की एक आंख राजकुमार को लगा दी गई। पति की शहादत से मिले पैसों से उसने हवेली का काम भी पूरा कर लिया था। जीवन फिर से पटरी पर आने लगा था।
अपनी स्कूली शिक्षा पूरी कर राजकुमार उच्च शिक्षा के लिए मुंबई रवाना हो गया। अम्मां सोच रही थी राजकुमार लौट कर आएगा तो उसकी अपनी पसंद की लड़की से शादी कर, बाकी जिंदगी बहू बेटे के साथ सुख से गुजार लेगी। भविष्य के सपने बुनती अम्मा—-
दिन, हफ्रते, महीने, साल बीतने लगे। आखिर एक दिन राजकुमार लौट आया। एक परी को साथ लेकर उसने शादी कर ली थी। पर परी अम्मा को देख नाक-मुंह सिकोड़ने लगी। उसने साफ कह दिया कि वह इस कुरूप सी बुढ़िया के साथ नहीं रह पाएगी। राजकुमार भी उसका कहना मान अम्मा को वृद्धा आश्रम छोड़ आया। उन्हाेंने तय कर लिया था कि हवेली को बेच वह मुंबई में घर खरीद लेंगे।
आज आश्रम में ‘मदर्स डे’ मनाया जा रहा था।
समाज के प्रतिष्ठित लोगों के भाषण हुए। मां के त्याग की खूब चर्चा हुई। सभी माताओं का सम्मान हुआ। किसी ने शाल ओढ़ाई तो किसी ने भेंट दे कर या पैर छू कर आशीर्वाद लिया। परी व राजकुमार भी सामने कुर्सी पर बैठे थे। अम्मा सोच रही थी, क्या बेटा सबके सामने उसे पहचानेगा भी या नहीं। शायद आज उसे अपनी गलती का अहसास हो।
तभी भीड़ में से एक जाना साधारण सा कुर्ता पहने, कंधे पे गमछा डाले आगे आने लगा-‘‘कहां जा रहे हो भाई?’’ संचालक ने पूछा।
‘‘मैं भी कुछ कहना चाहता हूं।’’
‘‘मेरी मां भी इसी आश्रम में है, आज उसे अपने घर ले जाना चाहता हूं।’’
‘‘पर हमने तुम्हें पहले तो कभी नहीं देखा।’’
‘‘देखोगे भी कैसे? पहली बार जो आया हूं।’’ अगली पंक्ति में बैठी अम्मां झटके से उठ खड़ी हुई, ‘‘अरे रामदीन तुम?’’
‘‘हां अम्मा, मैं रामदीन।’’
‘‘आपका रामू। आपकी छत्रछाया में पला बढ़ा। आपके बारे में सुना तो रहा नहीं गया। जन्म देने वाली मां का तो याद नहीं, आपको ही मां के रूप में देखा है। छोटे मालिक तो आपको पहचान भी नहीं रहे। आपने उनके लिए क्या-क्या नहीं किया। यहां तक कि बेटे के लिए, अपनी सुंदरता त्याग दी। अपनी आंख उनको लगवा दी। और उन्हाेंने सुंदर बीवी पाने के लिए आपको त्याग दिया? मुझे भी काम से—————————————-
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