कहानी
डा. अशोक रस्तोगी
जुलाई, 2025 अंक
नारी की संपूर्णता मातृत्व में है, उसके बिना वह कैसे भटक सकती है, उसके हृदय के अन्तःभावों को स्पर्श करती कहानी।
उद्घोषक ने मंच से घोषणा की-‘अब आपके समक्ष हमारे आज के इस ‘विलक्षण प्रतिभा अभिनंदन समारोह’ की मुख्य अतिथि ज्ञानोदय महाविद्यालय की प्राचार्या आदरणीया वसुंधरा भारद्वाज एक ऐसे छात्र को सम्मानित करेंगी जिसने अल्पवयस में ही असाधारण प्रतिभा का परिचय देकर पूरे राज्य में हमारे विद्यालय को गौरवान्वित किया है——और इस होनहार प्रतिभाशाली छात्र जिसे देखते ही हृदय में प्यार का झरना झर्र-झर्र बहने लगता है का नाम है ‘अंकुर गुप्ता’—-जिसके पिता हैं इस महानगर के प्रख्यात वास्तुविद अभिलाष गुप्ता—-।’
यह नाम सुनते ही मंचासीन विद्वज्जनों के मध्य प्राचार्या वसुंधरा भारद्वाज के मस्तिष्क में कुछ टकराया सा——स्मृति की जंग लगी सांकलों को बहुत तेजी से खड़खड़ाने लगी वह।
उधर मृदुल मुस्कान विकीर्ण करता अंकुर स्फूर्ति से जब मंच की ओर बढ़ा तो उस विशाल सभागार में उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति की दृष्टि उसी पर केन्द्रित होकर रह गई। मात्र बारह वर्ष की अल्पायु में ही विज्ञान क्षेत्र में अप्रतिम सफलता अर्जित कर लेने वाले उस छात्र को देखकर सभी की आंखों में विस्मय के डोरे उभर आए। जबकि दर्शक दीर्घा की अग्रिम पंक्ति में बैठा अभिलाष दर्शकों की उन विस्मय भरी दृष्टियों को देख-देखकर आल्हादित और भाव विह्वल हुआ जा रहा था।
वसुंधरा ने तो समीप आते ही स्नेहातिरेक में उसे अपने वक्ष से लगा उसके कपोलों पर चुंबनों की झड़ी लगा दी-‘कितना प्यारा और होनहार बच्चा है।’
फिर उसके सिर पर वात्सल्य पूरित हाथ फिराते हुए उत्सुकता भरे स्वर में बोली-‘धन्य हैं वे माता-पिता जिन्होंने इस अतुल्य दीप जो जहां भी जाएगा अपनी प्रतिभा का प्रकाश फैलाएगा, को जन्म दिया। मैं उन सौभाग्यशाली माता-पिता के दर्शन करना चाहूंगी।’’
अभिलाष ने वह स्वर सुना तो जाना पहचाना सा लगा। चश्मा ऊपर नीचे कर उसने अपने अनुमान को निश्चित रूप देने का प्रयास किया——कभी अपनी अगाध रूपराशि से उसके हृदय में उतर जाने वाली उस नारी के मुख पर भले ही कालरथ के चिह्नों ने अपना बसेरा कर लिया था तब भी वह पहचानने में भूल नहीं कर सका—निश्चित रूप से वही थी उसकी परित्यक्ता पत्नी वसुंधरा भारद्वाज जिसे वह प्रेमातिरेक में ‘वसु’ कहकर संबोधित किया करता था। जिसने कभी अपनी सुगंध सौरभ से उसके गृहांगन को सुवासित कर रखा था। और अतीत की मधुर, तिक्त व कसैली सी स्मृतियां उसके समक्ष चन्द्रमा की ज्योत्सना के समान बिखरती चली गई।
लोहपथ पर रेलगाड़ी छुक-छुक करती द्रुतगति से दौड़ती जा रही थी। चन्द्रमा की शीतल धवल चंद्रिका खेतों, वृक्षों और निर्जन अरण्य में ऐसे बिखरी पड़ी थी मानो संपूर्ण सृष्टि ने आभामयी श्वेत चांदनी का आंचल ओढ़ लिया हो। अधिकांश यात्री अपनी-अपनी आरक्षित शायिकाओं पर निद्रालीन हुए पड़े थे। लेकिन अभिलाष लेटा कोई साहित्य पढ़ने में लीन था। यदा-कदा वह वातायन में से बाहर प्रवाहित दुग्ध धवल चंद्रिका का विलक्षण सौंदर्य आंखों की राह पीने लगता था। बीच-बीच में उसकी सरसरी दृष्टि उस युवती पर भी चली जाती थी जो उसके सामने वाली शायिका पर नेत्रेन्मीलित लेटी थी, पर थी वह भी उन्निद्र ही। बार-बार नेत्रें की झिर्रिया हल्की सी खोलकर अभिलाष को निहारने लग जाती। कभी कुछ पलों के लिए उठकर बैठती और पुनः लेट जाती। मानो सोने का प्रयास कर रही हो परन्तु सो न पा रही हो।
सहसा रेलगाड़ी उस भयावह अरण्य में अचकचाकर रुक गई। शायद लोहपथ पर किन्हीं अराजक तत्वों ने बड़े-बड़े पत्थर डाल दिए थे जिससे रेलगाड़ी को वहां काफी समय तक रुकना पड़ा। सारे यात्रियों की आंखों में त्रस की काली छाया कुण्डली मारकर जम गई—निर्जन भयावह एकांत में दस्युओं और चोर उचक्कों का हृदय की धड़कनें बढ़ा देने वाला भय। यात्री कई समूहों में बंटकर परस्पर बतियाने लगे थे।
भयातुर युवती भी अभिलाष के समीप आकर बैठ गई। वार्ताक्रम आकस्मिक विपत्ति से फिसलकर परिचय पर आ गया। अभिलाष ने अपना परिचय देते हुए बताया कि वह भवन वास्तुविद है और इसी सिलसिले में देश-विदेशों में प्रवास करता रहता है। तब युवती ने भी अपने परिचय के अंतर्गत कहा-मेरा नाम डॉ- वसुंधरा है। इलाहाबाद में भौतिकी की प्रोफेसर हूं।’
‘‘अरे वाह! आपने तो इस छोटी सी उम्र में ही गगन स्पर्श कर लिया।’ अभिलाष के मुंह से अनायास निकल गया। विस्फारित नेत्रें से उसे निहारते हुए पुनः बोला-‘‘कितनी प्रशंसा करूं आपकी प्रतिभा की—सचमुच मुझे तो विश्वास नहीं हो पा रहा।’’
परिचय प्रगाढ़ता में परिवर्तित हुआ तो आत्मीयता भी बढ़ती चली गई। और कालचक्र की गति के साथ-साथ वह रेलयात्र दोनों की जीवन यात्र बन गई। पहले पत्रें का आदान-प्रदान हुआ, फिर मिलने मिलाने का सिलसिला प्रारंभ हुआ। और फिर साथ-साथ जीवन मरण की सौगंध भी खाई गई।
परिजनों के पुरजोर विरोध पर भी दोनों एक सूत्र में आबद्ध हुए तो जीवनरथ प्रेम रथ पर पूर्ण वेग से दौड़ने लगा। सागर की गहराई जैसे और नील गगन की ऊंचाई जैसे प्रेम का आवेग था दोनों में। बाह्य संसार से बिल्कुल अलग- थलग। न अभिलाष को अपने परिजनों से कोई प्रयोजन था और न ही वसुंधरा को।
एक दिन वसुंधरा अभिलाष के बाहुपाश में लिपटी भावनाओं में बह गई ‘‘अभिलाष! कभी-कभी यह एहसास मेरे हृदय को कचोटने लगता है कि हमारे विजातीय होने के कारण हम दोनों के ही परिवार हमें आत्मसात नहीं कर पाए।’’
अभिलाष ने अपनी अंगुली उसके गुलाबी पंखुड़ियों जैसे रसीले अधरों पर रख दी-‘‘क्या सारे संबंध रक्त की डोर से ही बंधे होते हैं वसु? संबंध प्रगाढ़ बनाए रखने के लिए आवश्यकता होती है प्रेम की, विश्वास की और संवेदनाओं की। और मैं महसूस कर रहा हूं कि ये सभी तत्व तुम्हारे व्यक्तित्व में समाहित हैं। संबंधों की ऊंच-नीच, जाति-पाति, गरीबी-अमीरी के कांटों की चुभन का एहसास न कभी तुम्हें होना चाहिए और न ही मुझे।’’
‘‘अभिलाष! कितनी प्रारब्धमयी हूं मैं जो तुम जैसा प्यार का झरना बरसाने वाला सुंदर और महान पति पा सकी।’’ वसुंधरा उससे वल्लरी की भांति लिपट गई-‘‘लेकिन अपने परिवार जनों के बहाव में आकर कभी मुझे अपने से दूर मत होने देना, यह मेरी तुमसे करबद्ध विनती है।’’
और प्रेम ने वसुंधरा के जीवन को प्रदीप्त कर दिया। उसके एक-एक अंग में प्रेम की ज्योति प्रस्फुटित होने लगी। झील सी गहरी और स्वच्छ पारदर्शी आंखों में एक अलौकिक प्रकाश हर समय समाया रहता, मानो जीवन लक्ष्य का चरम प्राप्त कर लिया हो। अभिलाष ही उसका सर्वस्व था, वही उसका स्वर्ग था, वही आनंद था, वही सुख था, वही संसार था। उसके बिना एक-एक पल असह्य हो उठता था। जल बिन मछली की तरह तड़प उठती थी वह उससे दूर होकर।
पुरुष और नारी की प्रकृति में सबसे बड़ा अंतर यही है कि नारी संवेदनशील अधिक होती है, उसमें भावनाओं का ज्वार बहुत जल्दी ऊपर चढ़ जाता है। किन्तु जितने वेग से ऊपर चढ़ता है उससे अधिक वेग से नीचे भी उतर आता है। जबकि पुरुष में भावनाओं के संवेग को संतुलित करने की शक्ति प्रचुरता में होती है। जहां वसुंधरा अभिलाष को लेकर कल्पनाओं की उड़ान भरती रहती थी वहीं अभिलाष यथार्थ के कठाेर धरातल पर चलने का अभ्यस्त था। कुशल भवन वास्तुविद होने के कारण उसकी मांग विदेशों में भी बहुत थी। अतएव वह समय-समय पर विदेश प्रवास करता रहता था। जबकि वसुंधरा उसके विदेश प्रवास के विरुद्ध थी। उसका कहना था कि वह उसके बिना एक पल भी नहीं रह सकती, अर्थात यदि वह विदेश जाए तो उसे भी साथ ले जाए। अभिलाष ने उसकी जिद पूर्ण भी की। वह उसे पेरिस, स्विट्जरलैंड, जर्मनी आदि देशों में अपने साथ ले भी गया, किन्तु हर कहीं तो उसे साथ ले जाना संभव नहीं था।
एक बार एक भवन निर्माण कंपनी ने उसे शिकागो भेजा तो वहां उसे दो माह तक रहने को बाध्य होना पड़ गया। और जब वह वहां से स्वदेश लौटा तो उसका संसार ही बदल गया था। दूरभाष पर सूचना देने के उपरांत भी वसुंधरा उसे पूर्व की भांति न तो वायुयान स्टेशन पर लेने के लिए आई और न ही घर के दीवार पर उसके स्वागत को आतुर थी। वह घर के भीतर प्रविष्ट हुआ तो वह यह कहते हुए स्फूर्ति से बाहर निकल गई कि कालेज जाने की जल्दी है, रसोई में दूध, मक्खन और ब्रेड रखी है लेकर खा लेना।
सन्न रह गया अभिलाष! उसके मस्तिष्क में शंकाओं के कृमि कुलबुलाने लगे—-वह तो कभी ऐसी न थी। पाषाण सा हो गया वह, जैसे हाड़ मांस का शरीर न होकर निर्जीव आकृति हो—स्पंदन विहीन सा। विश्वास नहीं कर पा रहा था वह कि यह वही पहले वाली वसु है जो कहती थी कि कालेज पति से ज्यादा जरूरी थोड़े ही है।
अस्थिर मन बेलगाव घोड़ों की तरह इधर-उधर दौड़ने लगा था। उसने रसोई में जाकर स्वयं चाय बनाकर पी और निष्प्राण सा पलंग पर गिर पड़ा जैसे कोई पथिक आंधी तूफान में दौड़ता भागता आए और परिक्लांत सा होकर यकायक गिर पड़े——लेटे-लेटे कब उसकी आंखें मुंद गई उसे कुछ भी तो आभास नहीं हो पाया।
‘अरे! तुम अभी तक सोए पड़े हो? खाना खाने का भी होश नहीं रहा?’ वसुंधरा का स्वर सुनकर वह चैतन्य होकर उठ बैठा। खिड़की से बाहर झांककर देखा——रजनी धरा पर अपने पांव पसार चुकी थी।
रात्रि को भोजन तो दोनों ने साथ-साथ किया। किन्तु दोनों के मध्य ऐसी खामोशी पसरी रही जैसे दो अजनबी किसी होटल में खाना खा रहे हों। विश्राम के समय अभिलाष ने अपनी ओर से वार्ताक्रम प्रारंभ करना चाहा तो उसने यह कहते हुए करवट बदल ली कि कालेज में कार्याधिकता होने के कारण थक गई हूं सिर में दर्द भी हो रहा है, सुबह बात होगी।
अभिलाष के हृदय में उत्पन्न हुई शंकाएं पल्लवित होकर उथल-पुथल मचाने लगीं। दोनों के मध्य एक आदिम और अपरिचित सी नदी बहने लगी थी। और नदी का बहाव क्रमशः तेज होने लगा था। दोनों अंचलों की दूरियां बढ़ने लगी थीं। वसुंधरा ने अपनी ओर से उस दूरी को पाटने का कोई प्रयास नहीं किया।
एक रात्रि को अभिलाष ने बड़े दयनीय स्वर में उससे कहा-‘‘रिश्ते बहुत कोमल होते हैं वसु, विश्वास की नींव पर टिके। लेकिन यदि विश्वास का आधार खिसक जाए तो रिश्तों का विशाल भवन भी भरभराकर ढह जाता है। फिर अथक प्रयास करने पर भी हम उसके मलबे से नया भवन तैयार नहीं कर सकते। मैं महसूस कर रहा हूं वसु कि हमारे मध्य में उपजी खाई निरंतर चौड़ी होती जा रही है।’’
‘‘यह तुम कैसी बहकी-बहकी बातें कर रहे हो अभिलाष?’’ वसुंधरा ने सपाट स्वर में कहा-‘‘तुम्हें हो क्या गया है?’’
‘‘तुम मेरी खुशियों की छांव हो वसु!’’ अभिलाष ने अपना सिर किसी अबोध शिशु की भांति उसके वक्ष पर रख दिया-‘‘तुम्हारी छाया में मैं अपने सारे दुःख भूल जाता हूं। बस तुम मेरे पास बनी रहो। मुझसे दूर मत जाओ।’’
‘‘यह सब व्यर्थ की बातें हैं, कल्पना के संसार से निकलकर यथार्थ के धरातल पर चलना सीखो अभिलाष।’’ वसुंधरा ने उपेक्षा भाव से कहा और अपने वक्षस्थल से उसका सिर हटाकर दूसरी ओर करवट बदलकर निद्रा के आगोश में समा गई।
जलधारा से सहज और सरल अभिलाष का अन्तःकरण निराशा और दुःख से विदीर्ण हो गया। हृदय कांच पात्र की तरह खंड-खंड होकर बिखर गया। कलेजे में हाहाकर मचने लगा जिसने उसके अस्तित्व को झकझोर कर रख दिया। क्षणिक दृष्टिपात उसने निद्रालीन वसु पर किया—कैसा शुभानन कोमल मुख, चम्पा पुष्प की भांति खिलखिलाता हुआ पतली पंखुड़ियों से गुलाबी अधर कितने मोहक लग रहे थे। उस कंचन मुखारविंद को देखकर कौन कह सकता था कि उसका हृदय कितनी सघन कालिमा से परिपूरित होगा?
रात भर उसकी आंखों बरसती रही। निशा के अंतिम प्रहर में जाकर कहीं आंखें मुंद पाई। और जब तक उसकी आंखें खुली तब तक वसुंधरा गाड़ी लेकर जा चुकी थी। अन्यमनस्क सा वह पुनः नेत्रेन्मीलित होकर लेटा रहा।
सायं को वह उदर क्षुधा शांत करने के लिए एक रेस्तरां में कोने की सीट पर जाकर बैठ गया। वेटर को भोजन का आदेश देकर वह सरसरा सा दृष्टिपात वहां बैठे लोगों पर करने लगा। यकायक एक दृश्य देखकर वह स्तब्ध रह गया। लगा जैसे शरीर का सारा रक्त विपरीत दिशा में बहने लगा हो, मस्तिष्क की नसें झनझना उठीं।
सामने वाले कोने में एक मेज के आमने-सामने बैठ वसुंधरा और उसी के कालेज का एक प्रोफेसर परस्पर ऐसे घुल मिलकर वार्तालीन थे मानो कितना सामीप्य हो और कितनी घनिष्ठता हो। दोनों एक दूसरे में खोए हुए से। कभी किसी बात पर वसुंधरा खिलखिला उठती तो कभी प्रोफेसर उसके दोनों हाथ अपने हाथों में लेकर मुस्कुरा पड़ता।
उनके क्रियाकलाप जब अभिलाष के लिए असहय हो गए तो वह बिना भोजन किए ही रेस्तरां से बाहर निकल आया और घर आकर एक निद्रालु वटी एक घूंट पानी से निगलकर सोने का प्रयास करने लगा।
रात्रि के किसी समय उसकी नींद टूटी तो वसुंधरा को बड़ी प्रगाढ़ निद्रा में लीन पाया, जैसे कोई मादक पेय लेकर सोई हो।
निशावसान में वह उसके उठने से पूर्व ही नहा-धोकर बाहर जाने के लिए तैयार हुआ तो आंखें मसलती हुई वसुंधरा भी उठ बैठी। जम्हाई लेते हुए पूछा उसने-‘‘इतनी सुबह-सुबह तैयार होकर आज साहब कहां जा रहे हैं?’’
‘‘सप्ताह भर के लिए मारीशस जाना है मुझे, इसी सिलसिले में कार्यालय जा रहा हूं।’’ उसने संक्षिप्त सा उत्तर दिया।
‘‘मुझे तुमसे कुछ बात करनी है।’’ पैर के अंगूठे से फर्श पर अदृश्य लकीर बनाते हुए दृष्टिनत किए कहा वसुंधरा ने।
‘‘कहो!’’
‘‘मैं संबंध विच्छेद चाहती हूं।’’
‘‘क्या मतलब?’’
‘‘इस छत के नीचे अब मैं तुम्हारे साथ नहीं रह सकती।’’
सर्वांग सिहर उठा अभिलाष का। उसकी श्वास ऊपर नीचे होने लगी। बड़ी कठिनाई से स्वयं को संयम कर वह पूछ पाया-‘‘क्यों? क्या अभाव है तुम्हें यहां? धन ऐश्वर्य, सुख सुविधाएं, गाड़ी बंगला सभी कुछ तो है यहां, फिर और क्या चाहिए?’’
‘‘एक औरत की संतृप्ति के लिए क्या यही सब कुछ पर्याप्त है?’’ वह ज्वालामुखी की तरह फट पड़ी-‘‘एक औरत तब तक अधूरी रहती है अभिलाष! जब तक कि वह मातृत्व सुख नहीं भोग लेती। विवाह के इन छः वर्षो में तुम एक बार भी मुझे मां नहीं बना सके। कभी की तुमने परवाह मेरे अरमानों की? बस तुम्हें तो परदेश का ही सुख भाता है।’’
‘‘इतनी छोटी सी बात पर इतना बड़ा विवेक विहीन निर्णय?’’ अभिलाष चौंक पड़ा-‘‘पहले कभी क्यों नहीं बताया? मैंने तो कभी इस पर विचार ही नहीं किया। खैर, अब तुम अपना निर्णय बदल डालो। मैं इस विषय में डाक्टरों से परामर्श लूंगा। आजकल तो विज्ञान इतना उन्नत हो गया है कि कुछ भी असंभव नहीं। और वैसे भी ऐसे आवेशित निर्णय भविष्य के लिए दुखदाई होते हैं।’’
‘‘मैंने जो निर्णय लिया है सोच- समझकर ही लिया है। इसे मैं किसी भी तरह बदल नहीं सकती।’’
‘‘क्या कोई भी राह नहीं? अपने इस विवेकहीन निर्णय पर पुनर्विचार करो वसु! क्यों इतनी कठोर हृदयी बनती हो?’’
‘‘मेरा निर्णय वह पाषाण रेखा है अभिलाष, जो किसी भी प्रकार नहीं काटी जा सकती।’’ उसने एक-एक शब्द पर जोर देते हुए कहा।
‘‘तो फिर ठीक है आज ही कोर्ट चलते हैं। तुम्हारी हर इच्छा का सम्मान किया जाएगा।’’ अभिलाष का स्वर बुझने लगा था।
और फिर दोनों ने कोर्ट जाकर संबंध विच्छेद की कार्यवाही प्रारंभ कर दी।
कोर्ट से लौटते समय वसुंधरा ने उससे कहा-‘‘अभिलाष क्या आज अंतिम बार मुझे किसी रेस्तरां में नहीं ले चलोगे? साथ-साथ खाएंगे-पिएंगे और इस शाम को एक अविस्मरणीय शाम बनाएंगे।’’ उसके अधरों पर छाया उल्लास बता रहा था कि वह भीतर से कितनी प्रसन्न है।
‘‘क्यों नहीं? तुम्हारी खुशी के लिए यह भी स्वीकार।’’ उसका स्वर भीग उठा और उसकी आंखों की कोरों से दो अक्षुकण छलक पड़े। जिन्हें उसने बड़ी स्फूर्ति से पोंछ लिया।
वसुंधरा उसे उसी रेस्तरां में ले गई जहां उसका नवल प्रेमी प्रोफेसर पहले से ही उपस्थित था। तीनों ने साथ-साथ खाया पिया। वहां से वसुंधरा तो प्रोफेसर का हाथ थामकर उसके साथ चली गई। और लुटा-पिटा सा, बिखरा हुआ सा अभिलाष एकाकी अपने घर लौट आया।
पल भर पूर्व के बसंत का अनायास पतझड़ में बदल जाना अभिलाष के हृदय मे तीव्र वेदना उपजा गया। सदैव गुलाब पुष्प सा खिला रहने वाला चेहरा मुरझाकर कांतिविहीन सा हो गया। जिसमे न कोई खुशी थी, न उमंग थी न तरंग और न ही जीने की ललक। सूनी सूनी निर्जीव सी हर समय बरस पड़ने को आतुर आंखें, होठों पर पाषाणी जड़ता और अन्तर्मन में सूनेपन का अंधकार, कभी शांति से न बैठने देने वाली सुलगती वितृष्णा लगता था कि जीवन में अब कभी खुशियां लौटकर नहीं आने वाली।
सप्ताह भर बाद वह मारीशस के लिए उड़ा तो वसुंधरा और प्रोफेसर उसे विदा करने के लिए एयरपोर्ट पर उपस्थित थे। मारीशस प्रवास काल में भी एकाकी भाव व स्मृति शूल उसके हृदय को कृमियों की तरह कचोटते रहे, आहत करते रहे।
और कालचक्र अपने पथ पर परिक्रमा करता रहा——
उसकी कंपनी में ही कार्यरत प्रवासी भारतीय एक युवती शालिनी रूसी हिन्दी भाषा रूपांतरकार के पद पर कार्यरत थी। वह उसके संपर्क में आई तो दोनों की घनिष्ठता बढ़ती चली गई। और शीघ्र ही दोनों वैवाहिक बंधन में बंध गए।
तीन वर्ष उपरांत जब वे भारत लौटे तब तक एक शिशु उनके आगोश में आ चुका था। अभिलाष का जीवन रथ एक बार पुनः दाम्पत्य पथ पर नव उल्लास के साथ दौड़ने लगा। उसे एहसास होने लगा कि उसके जीवन के बसंत पर पुनः हरी-भरी कौंपलें छाने लगी हैं। स्वयं को स्वर्गिक आनंदलिप्त पाने लगा था वह। मानो पत्नी और पुत्र तक ही उसकी दुनिया सीमित हो, जिसमें हर्ष, उमंग, उल्लास, सुख, खुशियां और आनंद सभी की वर्षा हो रही थी।
पुत्र के जन्मदिवस को उसने बहुत धूमधाम से भव्य समारोह के रूप में मनाया। परिवार जनों व सभी संबंधियों के साथ-साथ प्रोफेसर व वसुंधरा को भी आमंत्रित किया था। किन्तु आया अकेला प्रोफेसर था। वसुंधरा दूर-दूर तक भी कहीं दिखाई नहीं दी तो अभिलाष ने प्रोफेसर से इसका कारण पूछ लिया।
प्रोफेसर ने बड़े सहज भाव से कहा-‘‘अब वह मेरे साथ कभी आएगी भी नहीं।’’
‘‘क्यों?’’ हैरत से उसका मुंह खुला का खुला रह गया।
‘‘विवाह के इतने वर्षों उपरांत भी वह…………………………
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