कहानी
सर्वेश वार्ष्णेय
माता-पिता के सद्प्रयासों एवं अच्छे आचरण से ही बालक एक अच्छा नागरिक बनता है। कुश के बिगड़ने पर माता-पिता को अपनी गलती का एहसास हुआ। एक भावपूर्ण कहानी।
मैं स्कूल से दीपिका के साथ घर लौटी, तो लोगों की भीड़ व पुलिस की गाड़ी ने चौंका दिया। कुछ ऐसा-वैसा तो नहीं हो गया, सशंकित मन से, भीड़ को चीरकर, हम दोनों अंदर पहुंचीं।
कुश, पुलिस वालों से घिरा पसीने से तर-ब-तर हो रहा था, हमें कातरता से देखकर उसने सिर झुका लिया।
मैं कुश की तरफ झपटी ‘‘क्या हुआ मेरे बेटे को।’’
पुलिस इंस्पेक्टर रौब से दहाड़ा ‘‘इसने अन्य लड़कों के साथ एक सर्राफ के घर डकैती डाली है, गृहस्वामिनी को छुरे के घातक प्रहार से जख्मी कर डाला है।’’
‘‘मेरा कुश चोर डकैत नहीं है।’’ मैं संयम गंवा कर चिल्लायी, ‘‘कुश तू कहता क्यों नहीं तूने कहीं डाका नहीं डाला।’’
वह खामोश बैठा रहा।
इंस्पेक्टर के चेहरे पर व्यंग्य उभर आया, ‘‘यह क्या बोलेगा, सभी के सामने तो इकबाल कर चुका है।’’
उपस्थित लोगों ने उसका समर्थन किया।
मेरे हाथ-पैर फूल गए। लगा पुलिस वालों की पिटाई के डर से ही कुश ने यह गंदा आरोप स्वीकार किया है। यह दोषी नहीं हो सकता।
‘‘ताला खोलो, हमें घर की तलाशी लेनी है।’’
कांपते हाथों से मैंने ताला खोला, रही ‘‘आपको निराश होना पड़ेगा इंस्पेक्टर, गरीब इंसानों को तंग करना अच्छा नहीं।’’
मैं सोचती रही, इंस्पेक्टर को अभी-अभी गलती का आभास हो जाएगा, पर पुलिस वाले ने अजूबे की भांति आनन-फानन में, अल्मारियों के पीछे, नाली के अंदर से, गेहूं के बोरे में से सोने के आभूषण, नोटों की गड्डियों व खून-सना चाकू बरामद करके सभी को हैरान कर दिया।
मेरे व मेरे बेटे के प्रति जन समूह में नाराजगी व आक्रोश का उबाल फूट पड़ा, लोग हमें बुरा-भला कहने लगे थे।
पुलिस वालों ने हथकड़ी पहनाकर गाड़ी में बैठाया तो मैं चेतना-शून्य होकर दीपिका की बांहों में झूल गयी।
होश आया तब तक पुलिस की गाड़ी कलेजे के टुकड़े को लेकर जा चुकी थी। गिरती-पड़ती मैं मकान के आधे भाग में रहने वाले भैया-भाभी के नजदीक जाकर उनसे कुश को छुड़वाने की विनती करने लगी।
लेकिन पूर्व दुश्मनी होने के कारण उन लोगों ने स्पष्ट इंकार कर दिया व व्यंग्य कस कर मुझे और अधिक अपमानित करने लगे तो दीपिका मुझे मेरे कमरे में ले आयी।
फिर दीपिका ने मुझे सांत्वना प्रदान करके चाय बनाकर पिलायी व भोजन खाने हेतु मजबूर करने लगी, पर रोटी का टुकड़ा मेरे गले में ही फंसकर रह गया। कुश के बगैर मैं अपने आपको बेहद कमजोर व लाचार अनुभव कर रही थी। उस बेचारे ने भी कहां रोटी खायी थी।
मेरे एकाकी जीवन की हमसफर दीपिका ही थी। मेरे दुख की घड़ी व भैया-भाभी का अलगाव भांपकर, उसने मेरे साथ खुद भी स्कूल से दो दिन की छुट्टी ले ली और कुश को छुड़ाने हेतु इधर-उधर भाग दौड़ करती रही।
परन्तु हमारे सभी प्रयास विफल सिद्ध हुए व कुश को जेल भेज दिया गया।
हम दोनों उसकी जमानत हेतु अथक प्रयास कर ही रही थीं। सर्राफ की जख्मी पत्नी ने दम तोड़ दिया, अब कुश पर दफा 302 भी लग गया, नन्हीं सी आयु व लूट के साथ-साथ खून का भी आरोप, जज ने जमानत स्वीकार करने से इंकार कर दिया तो मैं सैंकड़ों गमों के बोझ से पिस गयी।
मन में अनेक दुश्चिंताएं पनपने लगीं। पता नहीं मैं अपने बेटे को कभी पुलिस के शिंकजे से छुड़ा भी पाऊंगी या नहीं, पता नहीं पुलिस वाले उस पर कितने भारी अत्याचार कर रहे होंगे, शायद ही कभी भरपेट रोटी मिल पा रही होगी।
बेटे की चिंता के साथ सामाजिक अपमान भी सहन करना पड़ा रहा था। जहां जाती, लोगों की नफरत भरी निगाहें मुझे भेदने लगतीं। लोग मुझे सुनाकर, चोर, लुटेरे व हत्यारे की मां कह उठते।
भैया-भाभी मेरे जख्मों पर नमक छिड़कते। कहते ‘‘जैसा बाप वैसा बेटा, बाप से अलग होकर भी खून का असर तो नहीं गया, बाप तो सिर्फ जुआरी, शराबी ही था, पर बेटा दस कदम और आगे बढ़कर खून भी करने लगा।’’
जिस कलंक को मिटाने की खातिर मैंने वर्षों पूर्व ससुराल छोड़ी, अब वही कलंक जहरीले नाग की भांति फिर से फुफकार उठा था।
कुश की करतूत से अब नागेश का नाम फिर से लोगों की जुबान पर चढ़ने लगा था। लोग बाप, बेटे के कारनामों को एक-दूसरे से जोड़ने लगे थे।
मैं दुखी होकर रो पड़ती, मेरी वर्षों की तपस्या का यही परिणाम है कि लोग मुझे हत्यारे की मां कहकर पुकारते। कुश को अच्छा इंसान बनाने के लिए मैंने क्या नहीं किया था।
मेरी निगाहों के सामने, वर्षों पूर्व का वह दिन बार-बार घूम जाता, जब मैंने नागेश का घर छोड़ा था।कुश उस वक्त साढे़ चार वर्ष का मासूम बच्चा था, एक दिन मैं बाजार से खरीदारी करके घर लौटी तो कुश को विचित्र अवस्था में घूमते हुए पाया, उसके कदम लड़खड़ा रहे थे, आंखें मुंदी जा रही थीं, जिस्म से अजीब सी गंध आ रही थी।
‘‘इसे क्या हुआ’’ घबराकर मैंने नौकर को डांटा ‘‘मेरे पीछे ठीक से देखभाल नहीं की इसकी।’’
असमंजस में पड़ा नौकर सही उत्तर नहीं दे पाया, वह कमरे में कुश को खिलौनों से खेलता छोड़कर आंगन में कपड़े धोने बैठ गया था।
मैं डॉक्टर को बुलाने हेतु फोन की तरफ लपकी, पर ड्राइंगरूम में कदम रखते ही मुझे कुश की बीमारी का रहस्य समझ में आ गया।
नागेश की शराब की अल्मारी खुली पड़ी थी, कालीन पर शराब की बोतल, गिलास लुढ़के पड़े थे।
‘‘तूने शराब पी’’ क्रोध से भरकर मैंने कई तमाचे कुश के गालों पर जड़ दिए।
भय से कांपते हुए वह बोला, ‘‘उसने पिताजी की ताकत वाली दवा पी थी।’’
‘‘वह दवा नहीं जहर है, जहर’’ मैं गुस्से से पागल बनी उसे देर तक मारती-पीटती रही, यहां तक कि कुश की कोमल काया पर अनेक नील व गूमड़े उभर आए। फिर नशे व पिटाई के कारण वह देर तक मूर्च्छित सा पड़ा रहा।
नागेश के घर लौटने पर मैं आक्रोश प्रकट कर उठी कि उसे कुश के सामने शराब नहीं पीनी चाहिए, न शराब की ताकत की दवा कहना चाहिए।
मैंने उसे पूरी घटना बयान की तो वह चिंतित होने के बजाय लापरवाही से हंस उठा, ‘‘बस, इसी बात से घबरा गयीं, पहली बार पीने पर यही हुआ करता है, धीरे-धीरे आदत पड़ जाएगी।’’
मैं झुंझला उठी ‘‘उसकी आयु शराब पीने की नहीं, पढ़ने-लिखने की है, तुम्हें उसके सामने अपना आचरण सही रखना चाहिए।’’
पर नागेश पर कोई असर नहीं हुआ। वह उसी प्रकार कुश की तरफ से लापरवाह बना, शराब व जुए में डूबा रहा। चापलूस मित्रें की सोहबत में, वह अपने आपको शहंशाह से कम नहीं समझता था, जबकि उसकी माली हालत दिन व दिन कमजोर पड़ती जा रही थी।
स्थिति यहां तक बिगड़ी कि नागेश का एक मात्र वस्त्रें का व्यवसाय ठप्प होकर कर्जे की नौबत आ गयी। लेनदार घर में आकर रुपयों का तकाजा करने लगे।
एक दिन कुश के बस्ते से ताशों की गड्डी निकली तो मैं संयम खोकर नागेश पर बरस पड़ी ‘‘जुए व शराब का पाठ पढ़ाकर बेटे को तुम कौन से रास्ते पर ले जाना चाहते हो।’’
‘‘ताश का जादू बुरा नहीं होता, एक दिन कुश दुनिया का सबसे बड़ा गेम्बलर बनकर, लाखों बटोरेगा।’’ वह लापरवाही से हंसा।
‘‘जुआ, शराब के अलावा तुम कुछ और भी सोचते हो या नहीं। कुश पढ़ता-लिखता नहीं, पूरे दिन आवारा लड़कों में घूमता रहता है, तुम इसे डांट-डपट कर कंट्रोल में रखा करो।’’
नागेश की नजरों में पढ़ाई से अधिक अपने आदेश पालन का महत्व था। जब कुश, उसके मित्रें का नाश्ता व पानी के गिलास लेकर, कमरे में जाने से आनाकानी करने लगता, तो वह बेंत लेकर जल्लाद की भांति उस पर टूट पड़ता।
वार्षिक परीक्षाफल में कुश फेल हो गया तो मेरे संयम का बांध भरभरा कर टूट पड़ा। मैं आगबबूला होकर नागेश पर बरस पड़ी। ‘‘तुम्हें मुझसे संबंध रखना है तो जुए, शराब को हमेशा के लिए तिलांजलि देनी पड़ेगी। इस घर में या तो मैं रहूंगी या तुम्हारी शराब की बोतलें रहेंगी।’’
वह दृढ़ता पूर्वक हुंकारा ‘‘मेरे घर में तुम आदेश चलाने वाली कौन होती हो।’’
‘‘मेरा आदेश तुम्हें मानना पड़ेगा, मैं अपने बच्चे को बिगड़ता हुआ नहीं देख सकती।’’ मैं हार मानने हेतु तैयार नहीं थी।
हम दोनों का झगड़ा बढ़ गया। दोनों ही अपनी-अपनी बात पर अड़ गए थे। विरोध स्वरूप नागेश उसी शाम को एक बाजारू औरत को घर ले आया व शराब पीकर, मेरे सामने ही उससे अश्लील हरकतें करने लगा।
बीच-बीच में मुझे सुनाता जाता ‘‘देख लिया मेरी अवहेलना का दुष्परिणाम, तुम अपनी हरकतों से बाज नहीं आओगी तो तुम्हें प्रतिदिन यही सब देखना पड़ेगा।’’
मैं अंदर ही अंदर प्रतिशोध की ज्वाला से धधकती रही। सुबह नागेश के जाने के पश्चात्, मैं कुश को लेकर मायके चली गयी।
नागेश की करतूत सुनकर मां-पिताजी, भैया-भाभी सभी स्तब्ध रह गए, पिताजी देर तक अपने आपको धिक्कारते रहे कि नागेश को पहचानने में उनसे इतनी बड़ी भूल कैसे हो गयी।
हफ्रते पश्चात् नागेश का पत्र आया। मैं अपनी भूल पर शर्मिंदा हूँ, तुम शीघ्र घर आ जाओ।
मैं नहीं गयी। जानती थी वह इतनी जल्दी बदलने वाला नहीं है। पिताजी ने भी मुझे भेजने में उत्सुकता नहीं दिखायी।
एक दिन नागेश खुद आ धमका व अपनी गलती की माफी मांगकर, जोर जबदस्ती से मुझे व कुश को अपने साथ ले गया।
मैं आश्वस्त थी कि अब वह बदल जाएगा। पर मेरा सोचना भूल थी। दो चार दिन उपरान्त उसका पुनः पुराना रूप उभर आया।
कुश के भविष्य की खातिर मैं हमेशा के लिए मायके चली आयी। फिर मैंने मायके के स्कूल में ही उसका नाम लिखवा दिया।
नागेश फिर मुझे लेने आया, पर मैंने अपने आपको पत्थर बनाकर, उसे कुत्ते की भांति दुत्कार दिया।
पिताजी बीमार रहते थे, उनके जीवन का कुछ भरोसा नहीं था। उन्होंने मेरी असहाय अवस्था का ध्यान करते हुए आधा मकान मेरे नाम कर दिया।
मैं एक स्कूल में अध्यापन कार्य करते हुए जीवन गुजारने लगी। यहीं से मेरे व भैया-भाभी के मध्य में एक गहरी खाई खुदनी शुरू हो गयी। दोनों ही मुझे मकान में हिस्सेदार बनाने के विरुद्ध थे।
बस नहीं चला तो दोनों ने छोटी-छोटी बातों पर लड़ना-झगड़ना शुरू कर दिया, ताकि मैं क्षुब्ध होकर घर छोड़कर ससुराल चली जाऊं। मैं खामोशी से सब कुछ सहन करती रही।
जब दुखों से टूटने लगती तो स्कूल की एक शिक्षिका दीपिका मुझे आश्वस्त करके आत्मीयता प्रदान करती रहती। दीपिका की आत्मीयता पाकर मैंं अपने आपको वज्र के समान मजबूत समझती।
एक दिन पिताजी का साया भी सिर से उठ गया। इस हादसे के गम से मां भी चल बसी तो मैं बिल्कुल एकाकी बनकर रह गयी। असहायावस्था ने मुझे दीपिका के और अधिक नजदीक कर दिया। वह हमारे परिवार का ही एक अंग बनती चली गयी। मोहल्ले में ही उसका घर, पति व बच्चे थे। वे सब भी मुझसे व कुश से हमदर्दी रखते।
मेरे जीवन का एकमात्र लक्ष्य कुश को उत्तम शिक्षा व उत्तम आचरण प्रदान करके, एक सम्मानित नागरिक बनाने का था। मैं जी-जान से अपने लक्ष्य की पूर्ति में जुटी रहती। कुश को भरपूर प्यार स्नेह ममता व सुरक्षा देती।
एक दिन फिर से नागेश का लंबा चौड़ा पत्र आ गया कि वह अपनी भूल समझ चुका है व हमेशा के लिए जुआ शराब छोड़ रहा है।
मैंने लापरवाही से नागेश का पत्र चिंदी, चिंदी करके हवा में उड़ा दिया। मुझे अब उसके सहारे की आवश्यकता नहीं रह गयी थी। मैं सोचती रहती, जब मेरा कुश आई.ए.एस. अफसर बनकर नागेश के सामने जाएगा तभी नागेश को पता लगेगा कि बच्चों के मन पर अच्छे व बुरे वातावरण का कितना बड़ा प्रभाव पड़ता है।
कुश की शिक्षा व आचरण से मैं पूर्ण रूपेण संतुष्ट थी। पर एक दिन मैं उसे चौकीदार के लड़के के साथ छिप-छिपकर बीड़ी पीते देखकर हतप्रभ रह गयी। मुझे देखकर उसने बीड़ी फेंककर भाग जाने का उपक्रम किया। पर मेरी पकड़ सख्त थी, मैंने उसके कान पकड़कर उमेठ दिए, तमाचे मार-मार कर मुंह लाल कर दिया, खाना न देकर पूरे दिन भूखा रखा।
भूख से बिलबिलाकर उसने मुझसे माफी मांग ली। गंदे आवारा बच्चों की सोहबत छोड़ देने का वायदा लिया, तो मैं अपनी जीत पर मुस्कुरा उठी कि मैंने यह मोर्चा भी मार लिया। अब कुश की हिम्मत मेरी मर्जी के विरुद्ध जाने की नहीं हो पाएगी।
पर शीघ्र ही मेरा भ्रम टूट गया। वह मेरे सामने आज्ञाकारी सपूत बना रहता, पर मेरे पीछे मनमानी करता। पढ़ाई-लिखाई से विरक्त होकर, उसे बुरे लड़कों की सोहबत में ही आनंद आता।
दीपिका के पति मुझे समझाते। बच्चे मां से नहीं, पिता के अंकुश से ही डरते हैं। तुम कुश को सुधारने की खातिर नागेश से समझौता कर लो।
पर मैं अडिग थी। नागेश का नाम ही अब मुझे कड़वा लगने लगा था। वह खुद बिगड़ा इंसान बच्चे को कैसे सुधार पाएगा।
धीरे-धीरे कुश ढीट व मुंहफट होता चला गया। वह मेरे दिए पैसे मित्रें में उड़ा देता। कालिज की फीस भी न देता। उसे पढ़ाई में कमजोर देखकर, मैंने उसे दो ट्यूशन लगा दिए। पर परिणाम ढाक के तीन पात। वह हाईस्कूल में फेल हो गया।
मैंने उसका दोबारा से दाखिला करा दिया पर उसकी पढ़ाई में रुचि नहीं हो पायी। उसकी आवारागर्दी बढ़ती रही।
और अब वह एक खूनी मुजरिम था। यह मेरी सबसे बड़ी हार थी। मेरी सभी उम्मीदों पर पानी फिर गया था। बेटे को बड़ा अफसर बनाने के स्वप्न छिन्न-भिन्न हो गए थे।
कमरे में बैठी अपनी बदकिस्मती पर आंसू बहा ही रही थी कि बाहर वाला दरवाजा खड़का। शायद दीपिका होगी। मैंने उठकर दरवाजा खोला तो बाहर पांच, छह गुंडे जैसे व्यक्तियों को खड़ा देखकर मेरी रूह कांप गयी।
वे सब मुझसे अभद्र भाषा का प्रयोग करते हुए कुश के भगोड़े अपराधी साथियों के नाम पते पूछने लगे। मैंने बताने में असमर्थता जतायी, क्योंकि मैं किसी को नहीं जानती थी।
वे लोग मुझे धमकी देकर चले गए कि पुलिस द्वारा कुश को रिमान्ड पर लेकर, उसे भयानक यातनाएं दिलवाकर, उसके साथियों के पते हासिल कर लेंगे। फिर अपनी ऊँची व पहुंच के आधार पर, जीवन भर, कुश को जेल में सड़ाएंगे।
यह सब सर्राफ के आदमी थे। वह सर्राफ पत्नी के मर जाने के कारण बौखला उठा था व हत्यारों को कड़ी सजाएं दिलाने हेतु पानी की भांति पैसा बहा रहा था।
पुलिस द्वारा रिमांड पर लिए अपराधी की कुट-पिटकर कितनी भारी दुर्दशा होती है, मैं भली-भांति परिचित थी। इसलिए मैं घबराकर तुरन्त दीपिका के घर लपकी व उन लोगों से कुश को बचाने की विनती करने लगी।
दीपिका के पति की कहीं पहुंच नहीं थी वे कुछ नहीं कर सकते थे, सिवाय मुझे सांत्वना प्रदान करने के।
फिर मैंने व दीपिका के परिवार ने कुश से मिलने के अनेक प्रयास किए, लेकिन पुलिस की ओर से इजाजत नहीं मिल पायी।
फिर कचहरी से आदेश पाकर, मैं बेटे से मिलने में सफल हुई तो उसका सूजा हुआ चेहरा, टूटा हुआ दांत, नील व गूमड़ देखकर आभास हो गया कि पुलिस ने उसे बेरहमी से मार-पीटकर उससे सब कुछ उगलवा लिया है।
उसको सलाखों के पीछे देखकर, मेरे आंसू आक्रोश में बदल गए। जी चाहा उसकी करतूतों पर उसकी जमकर पिटायी कर दूं। मार-मार कर उसका भुर्ता बना डालूं।
मैं तेज स्वर में उसे लताड़ने लगी कि उसने इतना बड़ा अपराध क्यों किया, मेरा सारा सम्मान मिट्टी में मिला दिया।
उसके चेहरे पर पश्चात्ताप के स्थान पर उत्तेजना फैल गयी। उसने हमारे दिए खाने की वस्तुओं के पैकेट हमारी तरफ वापस फेेंक दिए। मुझे नफरत से घूरकर बोला, ‘‘तुम्हारे कारण——।’’
‘‘मेरे कारण—–’’
‘‘हां, हां तुम्हारे कारण, तुमने कभी सोचा, तुम्हारे दिए थोड़े से पैसों में मेरा गुजारा नहीं चल पाता। मेरेे भी अनेक खर्चे, सैंकड़ों शौक हैं, कहां से पूरा करूंगा। गलती तुम्हारी है, तुमने मुझे मेरे पिता से अलग किया। उनके साथ रहता, तो भरपूर पैसा तो मिल जाता। आज उनके पास क्या नहीं है, कोठी, गाड़ी, लाखों का व्यापार सभी कुछ तो है। पर मैं सबसे वंचित हूँ, क्योंकि तुम मेरे पिता से समझौता नहीं कर सकती, उनके साथ नहीं रह सकतीं।’’
मैं सन्न होकर गश खाने लगी। क्या यह मेरा खून बोल रहा है। नहीं, मैं ही गलती पर थी। मैंने यह क्यों नहीं सोचा कि कुश की रगों में मेरे अतिरिक्त नागेश का भी खून है, कुश बिल्कुल नागेश का प्रतिबिम्ब था।
धराशायी हृदय से मैं घर चली आयी। फिर रो-रोकर पश्चात्ताप करती रही कि मैंने कुश को समझने में भूल क्यों कर दी।
दरवाजा खड़का, मेरा भय जाग उठा, सर्राफ के आदमी फिर से तो नहीं आ गए।
दीपिका थी, उसका गंभीर चेहरा देखकर मैं चिंतित हो उठी, क्या हुआ?
उसने रुक-रुक कर बताया कि मेरा साथ देने के कारण, उसके परिवार की भारी बदनामी हो रही है। उसके पति व बेटे को सब हेय दृष्टि से देखने लगे हैं। मोहल्ले वाले कह रहे हैं कुश के अपराधों में मेरा बेटा भी शामिल है।
मैं सन्न रह गयी। एक दीपिका ही तो अपनी थी, समझदार को इशारा काफी होता है। मैंने दीपिका को आश्वस्त किया, कि अब मैं पुलिस व कचहरी के कामों में उसे न घसीटकर अकेली ही निपटाया करूंगी। कुश से मिलने भी अकेली ही जाऊंगी।
जेल के अंदर कुश ने मुझसे जो अपशब्द कहे थे, उनकी कठोरता दो चार दिनों में ही बर्फ की भांति पिघल गयी।
मुझे फिर से उसके जीवन की चिंता होने लगी। ऐसा न हो वह सर्राफ अपने पैसे व पहुंच के बल पर कुश को मरवा डाले। कुश जैसे बेसहारा, उदंड युवक की जान लेना कठिन नहीं।
मैं अपने कुश को अपनी जान देकर भी बचाना चाहती थी। मैं उसे जेल की सलाखों के पीछे से निकालने हेतु बेहद उतावली हो उठी थी। ऊहापोह के बीच न मालूम कैसे मैंने नागेश को खबर भेज किया, ‘‘कुश संकट में है।’’
उम्मीद नहीं थी वह आएगा व कुश को बचाने की खातिर कुछ करेगा। लेकिन आशा के विपरीत वह तीसरे दिन ही आकर सामने खड़ा हो गया।
मैं भौंचक्की सी शून्य में ताकती खड़ी रह गयी। समझ नहीं पायी अपने जीवन के इस बंद अध्याय को किस प्रकार शुरू करूं।
वही बोला ‘‘मैं वकील से बात करके आ रहा हूँ। कुश की स्थिति का पता मुझे लोगों द्वारा मालूम……………………………..
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